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शब्दों से इमोजी तक: सोशल मीडिया और नई पीढ़ी की भाषा

SA News
Last updated: January 20, 2026 11:04 am
SA News
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शब्दों से इमोजी तक: सोशल मीडिया और नई पीढ़ी की भाषा
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अगर वर्तमान में अपने आसपास देखें, तो महसूस होगा कि हमारी रोज़मर्रा की भाषा पहले जैसी नहीं रही।  परिवार या दोस्तों से बातचीत हो, परिवार का व्हाट्सएप ग्रुप हो या फिर फेसबुक–इंस्टाग्राम की पोस्ट—हर जगह शब्दों का अंदाज़ बदल गया है। ऐसे में मन में एक स्वाभाविक सवाल उठता है कि सोशल मीडिया ने हमारी भाषा को संवारा है या उसे बिगाड़ दिया है?

Contents
  • जब भाषा लोगों के और करीब आई
  • सरलता आई,लेकिन जल्दबाज़ी भी
  • इमोजी ने भाव बताए, शब्द पीछे रह गए
  • बच्चों और युवाओं पर असर
  • सोशल मीडिया: भाषा का दुश्मन या सच्चा आईना?
  • डिजिटल युग में युवाओं के लिए सही दिशा: संत रामपाल जी महाराज का तत्वज्ञान

जब भाषा लोगों के और करीब आई

एक समय वह था जब लिखना-पढ़ना कुछ खास लोगों तक सीमित माना जाता था। लेकिन आज सोशल मीडिया ने यह दीवार तोड़ दी। आज कोई भी व्यक्ति अपनी बात खुलकर लिख सकता है—अपनी भाषा में, अपने अंदाज़ में। गांव का युवक हो या शहर का, सबको अपनी आवाज़ रखने का मंच मिला है।

यह भी पढ़ें: सोशल मीडिया का समाज पर प्रभाव

हिंदी और दूसरी भारतीय  क्षेत्रीय भाषाएं सोशल मीडिया पर खूब इस्तेमाल हो रही हैं। लोग कविता लिख रहे हैं, अपने विचार, अनुभव साझा कर रहे हैं, लोकभाषाओं में वीडियो बना रहे हैं। इससे भाषा सिर्फ किताबों तक सीमित न रहकर ज़िंदगी का हिस्सा बन गई है।

सरलता आई,लेकिन जल्दबाज़ी भी

सोशल मीडिया ने हमें कम शब्दों में ज़्यादा कहने की आदत डाल दी है। अब लंबी-लंबी बातें कम और छोटे वाक्य ज़्यादा दिखते हैं। यह बदलाव कहीं न कहीं भाषा को आसान बनाता है।

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लेकिन इसी जल्दबाज़ी में हम कई बार भाषा की शुद्धता भूल जाते हैं। गलत स्पेलिंग, अधूरे वाक्य और बिना सोचे विचारे लिखा गया कंटेंट आम हो गया है। कोई ना “चल जाएगा” वाली सोच भाषा पर भारी पड़ने लगी है।

इमोजी ने भाव बताए, शब्द पीछे रह गए

आज भावनाएं शब्दों से कम और इमोजी से ज़्यादा जताई जाती हैं। खुशी हो, गुस्सा हो या दुख—सब कुछ एक छोटे से चिन्ह में सिमट गया है। इससे बातचीत आसान तो हुई है, लेकिन शब्दों की गहराई कहीं खोती हुई सी लगती है। जो भाव पहले पंक्तियों में उतरते थे, अब एक  ईमौजी  में निपट जाते हैं।

बच्चों और युवाओं पर असर

सबसे बड़ा असर अब नई पीढ़ी पर दिखता है। बच्चे वही भाषा सीखते हैं जो वे रोज़ देखते हैं। अगर सोशल मीडिया की भाषा अधूरी, अशुद्ध और सतही होगी, तो वही आदतें उनके साथ भी जुड़ जाएंगी। कई बच्चे अब शुद्ध हिंदी लिखने में झिझक महसूस करते हैं, क्योंकि उनकी दुनिया रोमन हिंदी और शॉर्टकट शब्दों तक सिमट गई है।

सोशल मीडिया: भाषा का दुश्मन या सच्चा आईना?

असल में सोशल मीडिया दोषी नहीं है। यह तो एक आईना है, जो हमें वही दिखाता है जो हम खुद उसमें डालते हैं। अगर हम अपनी भाषा को सम्मान देंगे, सही शब्दों का प्रयोग करेंगे, तो सोशल मीडिया भाषा को मजबूत बनाएगा। अगर हम लापरवाही बरतेंगे, तो वही भाषा को कमजोर भी कर देगा।

डिजिटल युग में युवाओं के लिए सही दिशा: संत रामपाल जी महाराज का तत्वज्ञान

आज वर्तमान समय में जब सोशल मीडिया भाषा और विचार दोनों को प्रभावित कर रहा है, ऐसे दौर में संत रामपाल जी महाराज का तत्वज्ञान आज युवाओं के लिए सही दिशा का मार्गदर्शन बनकर सामने आया है। वे युवाओं को अध्यात्म के साथ-साथ  सामाजिक परिपेक्ष्य में सत्य, संयम और शुद्ध विचारों के साथ संवाद करने की प्रेरणा देते हैं। 

सोशल मीडिया पर उनके अनुयायी मर्यादित भाषा, सकारात्मक  संदेश और समाज सुधार से जुड़े विचार साझा कर रहे हैं, जो यह सिद्ध करता है कि डिजिटल माध्यम भी अध्यात्म ज्ञान और जागरूकता का सशक्त साधन बन सकता है। संत रामपाल जी महाराज का संदेश युवाओं को भटकाव रास्तें से निकालकर जिम्मेदार, संवेदनशील और विचारशील अभिव्यक्ति की ओर प्रेरित करता है। अधिक जानकारी के लिए डाउनलोड करें Sant Rampal Ji Maharaj – Google Play 

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