कांग्रेस की वरिष्ठ नेता और मध्य प्रदेश से राज्यसभा उम्मीदवार रहीं मीनाक्षी नटराजन को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका लगा है। राज्यसभा चुनाव के लिए उनका नामांकन रद्द किए जाने के खिलाफ दायर याचिका को सर्वोच्च अदालत ने खारिज कर दिया है। हालांकि अदालत ने यह स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता के लिए चुनाव याचिका दाखिल करने का रास्ता खुला हुआ है।
इस फैसले के बाद राज्यसभा चुनाव को लेकर चल रही राजनीतिक चर्चा और तेज हो गई है। मीनाक्षी नटराजन को उम्मीद थी कि सुप्रीम कोर्ट उनके नामांकन रद्द किए जाने के आदेश पर राहत देगा, लेकिन ऐसा नहीं हो सका।
आखिर क्या है पूरा मामला?
मध्य प्रदेश से राज्यसभा चुनाव के लिए मीनाक्षी नटराजन ने नामांकन दाखिल किया था। लेकिन 9 जून को रिटर्निंग अधिकारी ने उनका नामांकन रद्द कर दिया। रिटर्निंग अधिकारी का कहना था कि उम्मीदवार ने अपने शपथ पत्र में तेलंगाना की एक अदालत में लंबित निजी शिकायत का उल्लेख नहीं किया।
बताया गया कि संबंधित मामले में उन्हें समन प्राप्त हो चुका था, लेकिन इसकी जानकारी चुनावी दस्तावेजों में नहीं दी गई। इसी आधार पर नामांकन खारिज कर दिया गया। इसके बाद उन्होंने इस निर्णय को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस ए.एस. चंदूरकर की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि संविधान का अनुच्छेद 329 चुनावी प्रक्रिया के दौरान न्यायालय के हस्तक्षेप को सीमित करता है।
अदालत ने कहा कि चुनाव प्रक्रिया जारी रहने के दौरान रिट याचिका के माध्यम से हस्तक्षेप करना उचित नहीं होगा। यदि किसी उम्मीदवार को लगता है कि उसका नामांकन गलत तरीके से रद्द किया गया है, तो वह चुनाव याचिका दायर कर सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि उसने मामले के गुण-दोष यानी मेरिट पर कोई टिप्पणी नहीं की है। अदालत ने केवल संवैधानिक प्रक्रिया का पालन करते हुए याचिका को खारिज किया है।
मीनाक्षी नटराजन की ओर से क्या दलील दी गई?
मीनाक्षी नटराजन की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंहवी ने पक्ष रखा। उन्होंने अदालत को बताया कि जन प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 33A के तहत केवल उन्हीं मामलों का खुलासा अनिवार्य है जिनमें आरोप तय हो चुके हों।
उनका तर्क था कि तेलंगाना में दर्ज शिकायत अभी शुरुआती स्तर पर है। अदालत ने अभी तक मामले का संज्ञान भी नहीं लिया है और केवल नोटिस जारी हुआ है। ऐसे में नामांकन रद्द करना अनुचित और अत्यधिक कठोर कदम माना जाना चाहिए।
उन्होंने यह भी कहा कि संबंधित शिकायत मूल रूप से किसी अन्य व्यक्ति के खिलाफ दर्ज हुई थी और बाद में मीनाक्षी नटराजन का नाम जोड़ा गया था। इसलिए इस आधार पर नामांकन खारिज करना न्यायसंगत नहीं कहा जा सकता।
चुनावी प्रक्रिया में अदालत के हस्तक्षेप पर बहस
सुनवाई के दौरान अदालत और याचिकाकर्ता के बीच चुनावी प्रक्रिया में न्यायिक हस्तक्षेप को लेकर भी चर्चा हुई। याचिकाकर्ता पक्ष ने कई पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि यदि कोई स्पष्ट और गंभीर त्रुटि हो तो अदालत हस्तक्षेप कर सकती है।
दूसरी ओर विरोधी पक्ष ने दलील दी कि चुनाव लड़ना मौलिक अधिकार नहीं बल्कि एक वैधानिक अधिकार है। इसलिए चुनाव से जुड़े विवादों के समाधान के लिए चुनाव याचिका ही उपयुक्त माध्यम है।
विरोधी पक्ष ने क्या कहा?
वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने अदालत में कहा कि संविधान का अनुच्छेद 329 चुनाव प्रक्रिया में हस्तक्षेप को प्रतिबंधित करता है। उन्होंने कहा कि यदि किसी उम्मीदवार का नामांकन गलत तरीके से रद्द भी हुआ हो तो उसका समाधान चुनाव याचिका के जरिए ही संभव है।
वहीं सॉलिसिटर जनरल Tushar Mehta ने भी यही पक्ष रखा कि चुनाव संबंधी विवादों का अंतिम निपटारा चुनाव ट्रिब्यूनल अथवा चुनाव याचिका के माध्यम से होना चाहिए।
अब मीनाक्षी नटराजन के सामने क्या विकल्प हैं?
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद मीनाक्षी नटराजन के पास चुनाव याचिका दायर करने का विकल्प बचा है। हालांकि चुनाव याचिकाओं के निपटारे में अक्सर लंबा समय लग जाता है।
राज्यसभा चुनाव की प्रक्रिया आगे बढ़ चुकी है और दूसरे उम्मीदवार को निर्विरोध निर्वाचित घोषित किया जा चुका है। ऐसे में यदि भविष्य में चुनाव याचिका पर कोई फैसला आता भी है, तो उसका प्रभाव अलग परिस्थितियों में देखा जाएगा।
मीनाक्षी नटराजन के मामले ने एक बार फिर चुनावी प्रक्रिया और न्यायिक हस्तक्षेप की सीमाओं को चर्चा के केंद्र में ला दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि चुनाव प्रक्रिया के दौरान अदालत सीधे हस्तक्षेप नहीं करेगी और ऐसे मामलों के लिए चुनाव याचिका ही उचित कानूनी रास्ता है। अब सबकी नजर इस बात पर रहेगी कि कांग्रेस नेता आगे कौन सा कानूनी कदम उठाती हैं और चुनाव याचिका में यह मामला किस दिशा में बढ़ता है।

