कभी सोचा है? आज हमारे मकान तो पक्के हो गए हैं, लेकिन रिश्ते कच्चे होते जा रहे हैं। हमारे पास दुनिया भर की जानकारी तो है, लेकिन खुद को और अपनों को समझने का वक्त नहीं। “बदलती जीवनशैली” ने हमें रफ़्तार तो दी, पर सुकून छीन लिया। क्या हम सच में तरक्की कर रहे हैं, या बस एक अंतहीन दौड़ में भाग रहे हैं? आइए, इस बदलाव के हर पहलू को करीब से समझते हैं।
तकनीकी विकास और डिजिटल जीवनशैली
टेक्नोलॉजी का कमाल देखिए—इसने काम तो चुटकियों में आसान कर दिया है, लेकिन रिश्तों के मायने बदल दिए हैं। सोशल मीडिया ने हमें पूरी दुनिया से तो जोड़ दिया, लेकिन अफसोस कि हम अपने घर-परिवार और समाज से कटते जा रहे हैं। आज हमारे पास जानकारी तो सेकंड्स में आ जाती है, पर एक-दूसरे के लिए वक्त नहीं है। लोग अब चेहरे देखकर नहीं, बल्कि स्क्रीन देखकर ज्यादा वक्त बिताते हैं, जिससे हमारे असली रिश्तों में एक अजीब सी खामोशी और दूरी आ गई है।
पारिवारिक संरचना में बदलाव
पहले हमारे समाज की पहचान बड़े-बड़े संयुक्त परिवार थे, जहाँ हर सुख-दुख साझा होता था। मगर आज की भागदौड़ भरी ज़िंदगी और नौकरियों के चलते परिवार बिखरकर छोटे हो गए हैं। कहने को तो इससे लोगों को अपनी आज़ादी मिली है, लेकिन इसकी एक बड़ी कीमत भी चुकानी पड़ी है। अब न तो बच्चों को दादा-दादी की कहानियों वाले संस्कार मिलते हैं, और न ही बुजुर्गों को अपनों का साथ। वह पुराना “सपोर्ट सिस्टम” अब टूट रहा है और समाज का भावनात्मक जुड़ाव कहीं न कहीं फीका पड़ता जा रहा है।
खान-पान और स्वास्थ्य पर प्रभाव
बदलती जीवनशैली का सबसे बड़ा असर हमारे खान-पान और स्वास्थ्य पर पड़ा है। फास्ट फूड और पैकेज्ड खाने की आदतों ने मोटापा, मधुमेह, हृदय रोग और तनाव जैसी बीमारियों को बढ़ावा दिया है। जहाँ पहले लोग शारीरिक श्रम करते थे, वहीं आज का जीवन अधिक बैठे-बैठे काम करने वाला हो गया है, जिससे स्वास्थ्य समस्याएँ आम हो गई हैं।
सामाजिक मूल्यों और परंपराओं में परिवर्तन
आजकल की मॉडर्न लाइफस्टाइल का असर सिर्फ हमारे रहन-सहन पर नहीं, बल्कि हमारी सोच और संस्कारों पर भी पड़ा है। पहले जहाँ “हम” और “हमारा समाज” मायने रखता था, आज वहाँ सिर्फ “मैं” और “मेरी आज़ादी” हावी हो गई है। दुख की बात यह है कि हमारे त्योहार और परंपराएँ अब “मनाने” से ज्यादा “दिखाने” का जरिया बन गई हैं। त्योहारों की खुशी दिल में कम और सोशल मीडिया की स्टोरीज़ पर ज्यादा दिखती है। इस दिखावे की होड़ में हमारी संस्कृति की असली गहराई और पुराने संस्कार कहीं खोते जा रहे हैं।
संयुक्त परिवार से एकल परिवार तक: संस्कृति और सभ्यता का ह्रास
महिलाओं की भूमिका में बदलाव
बदलते वक्त का सबसे बेहतरीन पहलू यह है कि आज हमारी बेटियाँ और बहनें घर की चारदीवारी से निकलकर आसमान छू रही हैं। शिक्षा हो या नौकरी, आज महिलाएँ हर मोर्चे पर पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल रही हैं और आत्मनिर्भर बन रही हैं। लेकिन इस कामयाबी के पीछे एक कड़वा सच भी है। घर की ज़िम्मेदारी और बाहर का काम—दोनों को एक साथ संभालना तलवार की धार पर चलने जैसा हो गया है। इस संतुलन को बनाने की जद्दोजहद में महिलाओं पर मानसिक दबाव बहुत बढ़ गया है, जिसे अक्सर हम देख नहीं पाते।
युवाओं पर बदलती जीवनशैली का प्रभाव
आज की चकाचौंध भरी दुनिया का सबसे गहरा असर हमारे युवाओं पर पड़ा है। करियर की रेस, फैशन और सोशल मीडिया के दबाव ने उन्हें स्मार्ट और आत्मनिर्भर तो बना दिया, लेकिन अंदर ही अंदर उन्हें खोखला भी कर दिया है। आज का युवा बाहर से भले ही खुश दिखे, पर असल में वह तनाव, डिप्रेशन और अकेलेपन से जूझ रहा है। सबसे बड़ी चिंता यह है कि नैतिक मूल्यों और ज़िम्मेदारियों से दूरी उन्हें भटका रही है, और जब देश का युवा रास्ता भटकता है, तो पूरे समाज का ढाँचा हिल जाता है।
पर्यावरण पर प्रभाव
तरक्की तो हमने खूब कर ली, लेकिन इसकी कीमत हमारे पर्यावरण ने चुकाई है। आज हमारी बदलती लाइफस्टाइल का नतीजा यह है कि शहर कंक्रीट के जंगल बन गए हैं और प्लास्टिक कचरे के पहाड़ खड़े हो गए हैं। अपनी सुविधा के लिए जिस तरह हम गाड़ियों और एसी का इस्तेमाल बढ़ा रहे हैं, उससे धरती का संतुलन बिगड़ रहा है। हमें यह समझना होगा कि अगर पर्यावरण नहीं बचेगा, तो हम भी नहीं बचेंगे। सच्ची तरक्की वही है जो कुदरत के साथ मिलकर चले, न कि उसे खत्म करके।
बदलती जीवनशैली ने समाज को आधुनिक, सुविधाजनक और तेज बनाया है, लेकिन इसके साथ कई सामाजिक, सांस्कृतिक और स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियाँ भी आई हैं। आवश्यकता इस बात की है कि हम आधुनिकता और परंपरा के बीच संतुलन बनाए रखें। यदि हम तकनीक का सही उपयोग करें, पारिवारिक मूल्यों को बनाए रखें और स्वस्थ जीवनशैली अपनाएँ, तो बदलती जीवनशैली समाज के लिए वरदान बन सकती है, अभिशाप नहीं।
समाधान: सही जीवन जीने की कला
दोस्तो, हमने ऊपर देखा कि कैसे आधुनिकता की दौड़ में हमारा मन अशांत और जीवन तनावपूर्ण हो गया है। इस अंधेरे में जगतगुरु तत्वदर्शी संत रामपाल जी महाराज का ज्ञान एक प्रकाश की किरण बनकर उभरा है। संत जी समाज को समझाते हैं कि हमें “सुविधाओं” की नहीं, बल्कि “सत्भक्ति” और “संस्कारों” की ज़रूरत है।
संत रामपाल जी महाराज हमारे धर्मग्रंथों का आँखों देखा हाल (प्रमाण) खोलकर बताते हैं कि हम दुखी क्यों हैं। वे श्रीमद्भगवद गीता के अध्याय 16, श्लोक 23 और 24 का हवाला देते हुए समझाते हैं कि जो मनुष्य शास्त्र विधि को त्यागकर अपनी मनमानी पूजा और जीवनशैली अपनाता है, उसे न तो सुख मिलता है, न सिद्धि और न ही परम गति। यानी हमारी अशांति का कारण यह है कि हम शास्त्रों के विरुद्ध जी रहे हैं।
संत जी ने समाज को “दहेज-मुक्त” और “नशा-मुक्त” भारत का सपना ही नहीं दिया, बल्कि उसे हकीकत बनाया है। उनके लाखों अनुयायी आज बिना किसी दिखावे के सादगी से विवाह करते हैं (रमैनी) और किसी भी प्रकार के नशे को हाथ तक नहीं लगाते। उनका सत्संग सिखाता है कि मानव जीवन अनमोल है—इसे सिर्फ पैसा कमाने और सोशल मीडिया पर बिताने में व्यर्थ न करें। जब परिवार में सत्भक्ति और मर्यादा होगी, तभी नई जीवनशैली हमारे लिए वरदान बन सकती है। यही इस भागदौड़ भरी ज़िंदगी का एकमात्र स्थायी समाधान है। अधिक जानकारी के लिए “Sant Rampal Ji Maharaj App” Play Store से डाउनलोड करें।

