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Home » सुप्रीम कोर्ट के राष्ट्रपति को निर्देश देने वाले फैसले पर धनखड़ का बयान: सुप्रीम कोर्ट पर सवाल

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सुप्रीम कोर्ट के राष्ट्रपति को निर्देश देने वाले फैसले पर धनखड़ का बयान: सुप्रीम कोर्ट पर सवाल

SA News
Last updated: April 19, 2025 12:37 pm
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सुप्रीम कोर्ट के राष्ट्रपति को निर्देश देने वाले फैसले पर धनखड़ का बयान: सुप्रीम कोर्ट पर सवाल
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धनखड़ बोले: सुप्रीम कोर्ट कैसे दे सकता है राष्ट्रपति को आदेश? संविधान के अनुच्छेद 142 पर खड़ी हुई बहस

Contents
  • अनुच्छेद 142 पर उपराष्ट्रपति की टिप्पणी
  • राष्ट्रपति को आदेश नहीं दिए जा सकते” – धनखड़
  •  कार्यपालिका की भूमिका पर भी सवाल
  • लोकतंत्र में संतुलन ज़रूरी: जनता की चुनी सरकार सर्वोपरि
  • संवैधानिक मर्यादाओं पर बहस तेज

भारत के उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने हाल ही में एक सार्वजनिक मंच से सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले को लेकर गंभीर आपत्ति जताई है। उन्होंने कहा कि अदालतें राष्ट्रपति को निर्देश नहीं दे सकतीं और ऐसा करना संवैधानिक मर्यादाओं का उल्लंघन है।  

धनखड़ का बयान सुप्रीम कोर्ट के उस आदेश के संदर्भ में आया है जिसमें राष्ट्रपति और राज्यपालों को विधेयकों को मंजूरी देने की समयसीमा तय करने को कहा गया था।  

अनुच्छेद 142 पर उपराष्ट्रपति की टिप्पणी

धनखड़ ने कहा कि संविधान का अनुच्छेद 142 अब एक “परमाणु मिसाइल” जैसा बन गया है, जिसे कभी भी लोकतांत्रिक संस्थाओं के खिलाफ उपयोग किया जा सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि इस अनुच्छेद का इस्तेमाल अदालतें उन क्षेत्रों में भी कर रही हैं जहां उनका अधिकार क्षेत्र नहीं है।  

राष्ट्रपति को आदेश नहीं दिए जा सकते” – धनखड़

उपराष्ट्रपति ने स्पष्ट रूप से कहा, “कोई स्थिति ऐसी नहीं हो सकती जहां आप राष्ट्रपति को आदेश दें। सुप्रीम कोर्ट को यह अधिकार किसने दिया?” उन्होंने यह भी जोड़ा कि भारत में राष्ट्रपति का पद सर्वोच्च है और इस पद की गरिमा को बनाये रखना सभी संस्थानों की जिम्मेदारी है।  

 कार्यपालिका की भूमिका पर भी सवाल

धनखड़ ने कहा कि अब न्यायपालिका केवल संविधान की व्याख्या नहीं कर रही, बल्कि कानून बनाने और कार्यपालिका का काम करने लगी है। उन्होंने कहा कि जब न्यायपालिका कार्यपालिका और विधायिका की भूमिका निभाने लगे, तब लोकतांत्रिक संतुलन बिगड़ता है।

लोकतंत्र में संतुलन ज़रूरी: जनता की चुनी सरकार सर्वोपरि

धनखड़ ने कहा कि लोकतंत्र में सबसे बड़ी शक्ति जनता की चुनी हुई सरकार के पास होती है। न्यायपालिका को संविधान की व्याख्या तक सीमित रहना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि हर संस्था को अपनी-अपनी सीमाओं में कार्य करना चाहिए।

संवैधानिक मर्यादाओं पर बहस तेज

उपराष्ट्रपति धनखड़ का यह बयान संवैधानिक संस्थाओं की शक्तियों और सीमाओं को लेकर एक नई बहस छेड़ सकता है। अनुच्छेद 142 के दायरे, न्यायपालिका की भूमिका और राष्ट्रपति जैसे संवैधानिक पदों की गरिमा को लेकर सार्वजनिक विमर्श तेज हो सकता है।

Also Read: दिल्ली हाईकोर्ट के जस्टिस वर्मा के घर से नकदी बरामद ? सुप्रीम कोर्ट ने जांच शुरू की

इस राष्ट्र के संविधान से भी ऊपर एक और संविधान है, और वह है परमात्मा का संविधान।  

पृथ्वी पर मनुष्यों को परमात्मा के वास्तविक संविधान की जानकारी देने के लिए परमात्मा स्वयं हर युग में अवतरित होते हैं।

  • सतयुग में परमात्मा सतसुकृत नाम से पृथ्वी पर आए और अपने संविधान का ज्ञान दिया।  
  • त्रेतायुग में मुनिंद्र ऋषि नाम से अवतरित होकर लोगों को अपने वास्तविक ज्ञान से अवगत कराया।  
  • द्वापर युग में करुणामय नाम से परमात्मा ने अपने संविधान की जानकारी दी।  
  • कलयुग में परमात्मा स्वयं कबीर नाम से प्रकट हुए और सत्य ज्ञान से संसार को परिचित कराया।

परमात्मा चारों युगों में स्वयं प्रकट होकर जीवों को मोक्षमार्ग बताते हैं। वे पृथ्वी पर सतगुरु, कवि या संत के रूप में लीलाएं करते हैं और अपना दिव्य ज्ञान प्रदान करते हैं। 

परमात्मा कभी-कभी जिंदा महात्मा के रूप में या किसी विशेष आत्माओं के शरीर बनाकर भी इस धरती पर लीला करते हैं और सतगुरु की भूमिका निभाते हैं। वे हमें अपना वास्तविक संविधान समझाते हैं, जो संपूर्ण सृष्टि के कल्याण के लिए है।

वर्तमान समय में वही पूर्ण परमात्मा संत रामपाल जी महाराज के रूप में हरियाणा प्रांत में विराजमान हैं, जो हमें अपने अमूल्य संविधान की सम्पूर्ण जानकारी दे रहे हैं। यदि आप परमात्मा के संविधान को जानना चाहते हैं, तो उनकी आधिकारिक वेबसाइट www.jagatgururampalji.org पर अवश्य जाएं!

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