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Home » सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: सिविल जज बनने के लिए 3 नहीं, 1 साल की वकालत होगी अनिवार्य

Law & Order

सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: सिविल जज बनने के लिए 3 नहीं, 1 साल की वकालत होगी अनिवार्य

SA News
Last updated: August 22, 2026 11:24 am
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सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: सिविल जज बनने के लिए 3 नहीं, 1 साल की वकालत होगी अनिवार्य
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सिविल जज बनने की तैयारी कर रहे कानून के छात्रों और युवा वकीलों के लिए सुप्रीम कोर्ट का ताजा फैसला काफी अहम है। सर्वोच्च न्यायालय ने सिविल जज (कनिष्ठ प्रभाग) की सीधी भर्ती के लिए पहले लागू तीन साल की कानूनी वकालत की अनिवार्यता में बदलाव किया है। अब सामान्य व्यवस्था के तहत उम्मीदवारों के लिए एक साल की सक्रिय वकालत जरूरी होगी।

Contents
  • सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: मुख्य बिंदु
  • अभी के लिए किसे मिलेगी सबसे बड़ी राहत?
  • 1 अप्रैल 2027 के बाद क्या बदल जाएगा?
  • चयन के बाद भी खत्म नहीं होगी परीक्षा की तैयारी
  • आखिर क्यों हटाई गई तीन साल की वकालत?
  • मई 2025 में क्या हुआ था?
  • नए नियम में वकालत और प्रशिक्षण दोनों पर जोर
  • क्या नए न्यायिक अधिकारियों को मिलेगा सीखने का मौका?
  • युवा कानून स्नातकों के लिए क्या है संदेश?
  • सुप्रीम कोर्ट का फैसला: न्यायिक सेवा के लिए 1 साल की वकालत पर्याप्त, व्यावहारिक प्रशिक्षण अनिवार्य

हालांकि, अदालत ने सिर्फ वकालत की अवधि कम करके व्यवस्था को खत्म नहीं किया है। 

इसके बजाय चयन के बाद उम्मीदवारों को लंबी और व्यवस्थित प्रशिक्षण प्रक्रिया से गुजरना होगा। इसमें एक साल न्यायिक अकादमी में प्रशिक्षण और उसके बाद एक साल की संरचित न्यायिक क्लर्कशिप शामिल होगी।

यह फैसला मई 2025 में दिए गए उस निर्णय पर दाखिल पुनर्विचार याचिकाओं की सुनवाई के दौरान आया, जिसमें सिविल जज की सीधी भर्ती के लिए तीन साल की वकालत को अनिवार्य किया गया था।

सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: मुख्य बिंदु

  1. सिविल जज भर्ती में बड़ी राहत: 2027 तक नए कानून स्नातकों को बिना वकालत के आवेदन का मौका
  2. सिविल जज भर्ती नियम 2027: 1 अप्रैल से एक साल की वकालत अनिवार्य
  3. सिविल जज भर्ती में बड़ा बदलाव: चयनित अभ्यर्थियों को पहले करनी होगी 2 साल की तैयारी
  4. सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, हटाई गई तीन साल की वकालत की अनिवार्यता
  5. मई 2025 का सुप्रीम कोर्ट का फैसला: सिविल जज भर्ती में 3 साल प्रैक्टिस का आया था नियम
  6. सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: 1 साल की वकालत और चयन के बाद न्यायिक प्रशिक्षण पर जोर
  7. नए न्यायिक अधिकारियों को मिलेगा कोर्ट की वास्तविक कार्यप्रणाली का प्रशिक्षण
  8. युवा कानून स्नातकों के लिए बड़ा बदलाव, 31 मार्च 2027 तक बिना वकालत आवेदन का मौका
  9. सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: न्यायिक सेवा के लिए 3 साल की वकालत अब 1 साल, प्रशिक्षण पर जोर

अभी के लिए किसे मिलेगी सबसे बड़ी राहत?

सुप्रीम कोर्ट ने नए नियम के साथ एक संक्रमण अवधि भी रखी है। इसका सीधा फायदा उन कानून स्नातकों को मिलेगा, जिन्होंने अभी वकालत शुरू नहीं की है और न्यायिक सेवा परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं।

20 मई 2025 से 31 मार्च 2027 तक जारी होने वाली न्यायिक सेवा भर्ती अधिसूचनाओं में पात्र कानून स्नातक बिना पहले से वकालत किए भी आवेदन कर सकेंगे। इस अवधि में उनके लिए एक साल की सक्रिय वकालत पूरी मानी जाएगी। यानी आवेदन के समय उन्हें उस एक साल के लिए अलग से वकालत प्रमाण-पत्र देने की जरूरत नहीं होगी।

यह व्यवस्था खास तौर पर उन युवाओं के लिए राहत वाली है, जो कानून की पढ़ाई पूरी करने के तुरंत बाद न्यायिक सेवा में जाना चाहते हैं।

1 अप्रैल 2027 के बाद क्या बदल जाएगा?

1 अप्रैल 2027 या उसके बाद जारी होने वाली भर्ती अधिसूचनाओं में सिविल जज (कनिष्ठ प्रभाग) की सीधी भर्ती के लिए उम्मीदवार को कम से कम एक साल की सक्रिय कानूनी वकालत पूरी करनी होगी। सिर्फ वकालत का प्रमाण-पत्र होना पर्याप्त नहीं माना जाएगा। यह भी देखा जाएगा कि उम्मीदवार वास्तव में न्यायालय की कार्यवाही में उपस्थित रहा है और मामलों में प्रभावी रूप से भाग लिया है।

इसका मतलब यह है कि भविष्य में न्यायिक सेवा में प्रवेश की तैयारी करने वाले कानून स्नातकों को पढ़ाई पूरी करने के बाद कम से कम एक साल अदालत की व्यावहारिक कार्यवाही का अनुभव लेना होगा।

चयन के बाद भी खत्म नहीं होगी परीक्षा की तैयारी

सुप्रीम कोर्ट के फैसले की खास बात यह है कि चयन के बाद उम्मीदवार सीधे नियमित न्यायिक अधिकारी नहीं बन जाएंगे।

चयनित उम्मीदवारों को पहले एक साल तक राज्य न्यायिक अकादमी में गहन प्रशिक्षण लेना होगा। इसके बाद एक साल की संरचित न्यायिक क्लर्कशिप होगी।

क्लर्कशिप के दौरान उम्मीदवार को वास्तविक न्यायिक कामकाज को नजदीक से समझने का अवसर मिलेगा। पहले छह महीने वह प्रधान जिला न्यायाधीश या उच्चतर न्यायिक सेवा के किसी सदस्य की निगरानी में काम करेगा। इसके बाद अगले छह महीने उच्च न्यायालय के किसी कार्यरत न्यायाधीश के मार्गदर्शन में प्रशिक्षण पूरा करना होगा।

इसके बाद प्रशिक्षण और कार्य के दौरान प्रदर्शन का मूल्यांकन किया जाएगा। संतोषजनक प्रदर्शन के बाद ही नियमित न्यायिक अधिकारी के रूप में नियुक्ति का रास्ता खुलेगा।

आखिर क्यों हटाई गई तीन साल की वकालत?

सुप्रीम कोर्ट ने यह नहीं कहा कि न्यायिक सेवा में आने वाले उम्मीदवार के लिए वकालत का अनुभव जरूरी नहीं है। अदालत ने माना कि न्यायाधीश बनने वाले व्यक्ति को अदालत की वास्तविक कार्यवाही की जानकारी होना जरूरी है। लेकिन सवाल यह था कि इसके लिए तीन साल की वकालत अनिवार्य करना कितना उचित है।

मई 2025 के फैसले के बाद सामने आई परेशानियों को देखते हुए अदालत ने इस व्यवस्था पर दोबारा विचार किया। तीन साल की शर्त का मतलब था कि कानून की पढ़ाई पूरी करने वाले युवा को न्यायिक सेवा परीक्षा में बैठने से पहले लंबा इंतजार करना पड़ता।

दूसरी ओर, न्यायिक सेवा में चयन के बाद प्रशिक्षण की व्यवस्था को मजबूत करने की संभावना भी सामने आई। 

इसी आधार पर अदालत ने ऐसी व्यवस्था बनाई जिसमें एक साल की सक्रिय वकालत और चयन के बाद दो साल की संरचित प्रशिक्षण प्रक्रिया को जोड़ा गया है।

मई 2025 में क्या हुआ था?

मई 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने सिविल जज (कनिष्ठ प्रभाग) की सीधी भर्ती के लिए कम से कम तीन साल की कानूनी वकालत अनिवार्य कर दी थी।फैसले के बाद इस व्यवस्था को लेकर कई सवाल उठे। पुनर्विचार याचिकाओं में कहा गया कि नए कानून  स्नातकों को न्यायिक सेवा में प्रवेश के लिए तीन साल तक इंतजार करना पड़ेगा।

याचिकाकर्ताओं की ओर से यह भी चिंता जताई गई कि इस नियम का असर युवा उम्मीदवारों के साथ-साथ महिला और दिव्यांग अभ्यर्थियों पर भी पड़ सकता है। सुनवाई के दौरान इस बात पर भी जोर दिया गया कि यदि उम्मीदवारों को न्यायिक सेवा में चयन के बाद बेहतर संस्थागत प्रशिक्षण दिया जाए, तो उन्हें न्यायिक जिम्मेदारियों के लिए अधिक प्रभावी ढंग से तैयार किया जा सकता है।

नए नियम में वकालत और प्रशिक्षण दोनों पर जोर

सुप्रीम कोर्ट के फैसले को सिर्फ तीन साल की वकालत को घटाकर एक साल करने के रूप में देखना पूरी तस्वीर नहीं होगी।

दरअसल, अदालत ने न्यायिक सेवा में प्रवेश की पूरी प्रक्रिया को दो हिस्सों में बांटने की कोशिश की है।

पहला हिस्सा है- अदालत में काम करने का व्यावहारिक अनुभव।

दूसरा हिस्सा है- चयन के बाद न्यायिक प्रशिक्षण। 

यानी उम्मीदवार को पहले अदालत में वकालत के जरिए न्यायिक प्रक्रिया को समझने का मौका मिलेगा और चयन के बाद उसे न्यायाधीश के रूप में काम करने के लिए अलग से प्रशिक्षित किया जाएगा।

यही इस फैसले की सबसे महत्वपूर्ण बात है।

क्या नए न्यायिक अधिकारियों को मिलेगा सीखने का मौका?

न्यायिक अकादमी और क्लर्कशिप के दौरान उम्मीदवारों को केवल कानून की किताबें नहीं पढ़ाई जाएंगी, बल्कि अदालत में होने वाले वास्तविक कामकाज को समझने का अवसर मिलेगा। इसमें मुकदमों की सुनवाई, मामलों का प्रबंधन, आदेश तैयार करने की प्रक्रिया, कानून के व्यावहारिक इस्तेमाल और न्यायिक कार्यप्रणाली जैसे पहलू शामिल होंगे।

वरिष्ठ न्यायिक अधिकारियों और उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की निगरानी में काम करने से नए अधिकारियों को यह समझने में मदद मिलेगी कि अदालत में कानून को व्यवहार में किस तरह लागू किया जाता है। 

युवा कानून स्नातकों के लिए क्या है संदेश?

न्यायिक सेवा की तैयारी कर रहे युवाओं के लिए फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण तारीख 31 मार्च 2027 है। इस तारीख तक जारी होने वाली संबंधित भर्ती अधिसूचनाओं में पात्र कानून स्नातकों को बिना पूर्व वकालत के आवेदन करने की अनुमति दी जाएगी।

लेकिन 1 अप्रैल 2027 के बाद जारी होने वाली अधिसूचनाओं के लिए एक साल की सक्रिय वकालत जरूरी होगी। इसलिए उम्मीदवारों के लिए यह समझना जरूरी है कि पात्रता का अंतिम निर्धारण संबंधित भर्ती की अधिसूचना में दी गई शर्तों के आधार पर होगा।

सुप्रीम कोर्ट का फैसला: न्यायिक सेवा के लिए 1 साल की वकालत पर्याप्त, व्यावहारिक प्रशिक्षण अनिवार्य

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला न्यायिक सेवा में जाने की तैयारी कर रहे हजारों कानून स्नातकों के लिए महत्वपूर्ण है। तीन साल की वकालत की अनिवार्यता को कम करके एक साल करना निश्चित रूप से प्रवेश की राह को पहले की तुलना में आसान बनाता है, लेकिन अदालत ने साथ ही यह भी स्पष्ट किया है कि न्यायिक अधिकारी बनने के लिए व्यावहारिक प्रशिक्षण से समझौता नहीं किया जाएगा।

नए ढांचे में वकालत का अनुभव और चयन के बाद मिलने वाला न्यायिक प्रशिक्षण, दोनों अपनी-अपनी जगह महत्वपूर्ण होंगे।

इस लिहाज से सुप्रीम कोर्ट ने न्यायिक सेवा में प्रवेश को लेकर एक ऐसा संतुलन बनाने की कोशिश की है, जिसमें युवा कानून स्नातकों के लिए रास्ता बहुत लंबा न हो और न्यायिक पद संभालने से पहले उन्हें अदालत की वास्तविक कार्यप्रणाली का पर्याप्त अनुभव भी मिल सके।

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