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Home » यूक्रेन के बाद आर्कटिक में तनाव: रूस ने परमाणु पनडुब्बी से मिसाइल टेस्ट कर NATO को दिया कड़ा संदेश

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यूक्रेन के बाद आर्कटिक में तनाव: रूस ने परमाणु पनडुब्बी से मिसाइल टेस्ट कर NATO को दिया कड़ा संदेश

SA News
Last updated: September 27, 2025 12:05 pm
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यूक्रेन के बाद आर्कटिक में तनाव: रूस ने परमाणु पनडुब्बी से मिसाइल टेस्ट कर NATO को दिया कड़ा संदेश
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रूस ने इस माह अपनी पैसिफिक फ्लीट की ऑस्कर-II श्रेणी की परमाणु संचालित पनडुब्बी ओम्स्क से P-700 ग्रेनिट सुपरसोनिक एंटी-शिप क्रूज़ मिसाइल का सफल परीक्षण किया है। यह मिसाइल 2.5 मैक की रफ्तार से करीब 250 किलोमीटर दूर स्थित नौसैनिक लक्ष्य पर प्रक्षेपित की गई थी। यह कदम अमेरिका के समक्ष रूस की सामरिक ताकत का प्रदर्शन माना जा रहा है।

Contents
  • मुख्य बिंदु:- 
  • कुर्स्क हादसे से सबक लेकर रूस ने आर्कटिक में दिखाया सैन्य दमखम
  • कुर्स्क त्रासदी के सबक के बाद रूस ने नौसैनिक ताकत को और धार दी
  • आर्कटिक को नया रणक्षेत्र बनाने की तैयारी में पुतिन?
  • आर्कटिक और उत्तरी समुद्री मार्ग क्यों हैं अहम?

मुख्य बिंदु:- 

  1. कुर्स्क हादसे के सबक के बाद रूस ने आर्कटिक में दिखाया नई सैन्य ताकत
  2. कुर्स्क त्रासदी ने रूस की नौसैनिक क्षमता को और मजबूत किया
  3. पुतिन की तैयारी: आर्कटिक बनेगा नया रणक्षेत्र?
  4. आर्कटिक और उत्तरी समुद्री मार्ग: रूस के लिए क्यों हैं रणनीतिक रूप से अहम?

कुर्स्क हादसे से सबक लेकर रूस ने आर्कटिक में दिखाया सैन्य दमखम

मॉस्को: रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने अकेले ही नाटो देशों को कड़ी चुनौती दे रखी है। नाटो गठबंधन यूक्रेन युद्ध में हार के करीब दिखाई दे रहा है, जबकि रूस ने आर्कटिक को नया रणक्षेत्र बनाने का पूरा इरादा जता दिया है। उत्तरी प्रशांत महासागर में रूस ने परमाणु पनडुब्बियों से सुपरसोनिक मिसाइल का सफल प्रक्षेपण कर यह स्पष्ट कर दिया कि उसने 12 अगस्त 2000 की कुर्स्क दुर्घटना से गहरे सबक लिए हैं। वह रूस के लिए एक बेहद दुखद दिन था, जब आर्कटिक सर्कल में नौसैनिक अभ्यास के दौरान परमाणु पनडुब्बी कुर्स्क, अपने पूरे दल के साथ बैरेंट्स सागर में डूब गई थी। ऑस्कर-II श्रेणी की उस पनडुब्बी पर मौजूद सभी 118 क्रू सदस्य मारे गए थे।

कुर्स्क त्रासदी के सबक के बाद रूस ने नौसैनिक ताकत को और धार दी

उस दर्दनाक दुर्घटना ने रूस को अपनी नौसैनिक सुरक्षा प्रणाली, आपदा प्रबंधन और प्रशिक्षण से जुड़ी मानवीय कमियों पर दोबारा विचार करने को विवश कर दिया। इसके बाद बीते कुछ वर्षों में रूस ने ऑस्कर-II पनडुब्बियों की सी-डिनायल (समुद्री अवरोधन) क्षमता को सुदृढ़ करने के साथ-साथ उनके हथियारों और तकनीकी तंत्र को आधुनिक बनाने पर विशेष ध्यान दिया है। यही कारण है कि रूस समय-समय पर अमेरिका और उसके सहयोगी देशों के बेहद करीब पनडुब्बी अभ्यास और मिसाइल परीक्षण करता है तथा अपनी सामरिक शक्ति का परिचय देता है।

आर्कटिक को नया रणक्षेत्र बनाने की तैयारी में पुतिन?

रूस ने हाल ही में अपनी पैसिफिक फ्लीट की ऑस्कर-II श्रेणी की परमाणु पनडुब्बी ओम्स्क से P-700 ग्रेनिट सुपरसोनिक एंटी-शिप क्रूज़ मिसाइल का सफल परीक्षण किया है। यह मिसाइल 2.5 मैक की रफ्तार से लगभग 250 किलोमीटर दूर स्थित नौसैनिक लक्ष्य पर छोड़ी गई थी। इसी दौरान यासेन-एम क्लास की क्रास्नोयार्स्क पनडुब्बी ने दो P-800 ओनिक्स मिसाइलें दागीं, जिन्होंने भी उच्च गति से अपने लक्ष्य को भेद दिया। इस परीक्षण के बाद रूसी नौसेना ने स्पष्ट किया कि ये अभ्यास उत्तरी प्रशांत महासागर और कामचटका-चुकोटका क्षेत्र की सुरक्षा सुनिश्चित करने के उद्देश्य से किए जा रहे हैं।

यूरेशियन टाइम्स में लिखते हुए वरिष्ठ रक्षा विशेषज्ञ प्रकाश नंदा ने उल्लेख किया है कि P-700 ग्रेनिट ऑस्कर-II पनडुब्बियों का मुख्य हथियार है, और बीते वर्षों में राष्ट्रपति पुतिन के नेतृत्व में रूस ने ओनिक्स और जिरकॉन जैसी आधुनिक मिसाइल प्रणालियों को अपने पुराने जहाजों में एकीकृत किया है। इससे रूसी नौसेना की मारक क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।

आर्कटिक और उत्तरी समुद्री मार्ग क्यों हैं अहम?

रिपोर्टों के अनुसार, रूस की रणनीति केवल सैन्य शक्ति को मजबूत करने तक सीमित नहीं है, बल्कि वह पिघलती बर्फ और नए समुद्री मार्गों के उभरते महत्व पर भी बारीकी से नजर रखे हुए है। आर्कटिक क्षेत्र में बर्फ पिघलने से उत्तरी समुद्री मार्ग (Northern Sea Route – NSR) की उपयोगिता तेजी से बढ़ गई है। यह मार्ग एशिया से यूरोप तक की दूरी को लगभग 40% तक घटा देता है। उदाहरणस्वरूप, शंघाई से रॉटरडैम की दूरी पारंपरिक स्वेज नहर के मुकाबले करीब 2,800 नौटिकल मील कम हो जाती है। इसी प्रकार, टोक्यो से हैम्बर्ग तक की यात्रा 48 दिनों की बजाय केवल 35 दिनों में पूरी की जा सकती है।

इसी कारण रूस ने आर्कटिक तटवर्ती क्षेत्रों में बंदरगाह, टर्मिनल और आइसब्रेकर बेड़े का विकास किया है, जिससे तेल, एलएनजी और अन्य संसाधनों का निर्यात सुगम हो सके। यही वजह है कि नाटो देशों के साथ उसका टकराव बढ़ रहा है और भविष्य में यह इलाका नए युद्धक्षेत्र में तब्दील होने की संभावना रखता है।

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