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FCI के 20,000 करोड़ रुपये के साइलो प्रोजेक्ट पर उठे सवाल

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Last updated: June 7, 2026 11:54 am
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FCI के 20,000 करोड़ रुपये के साइलो प्रोजेक्ट पर उठे सवाल
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देश की खाद्य सुरक्षा व्यवस्था को मज़बूत बनाने और अनाज भंडारण प्रणाली को आधुनिक बनाने के उद्देश्य से भारतीय खाद्य निगम (FCI) ने लगभग 20,000 करोड़ रुपये की “हब एंड स्पोक” साइलआधुनिकीकरण योजना शुरू की है। इस महत्वाकांक्षी परियोजना के तहत देशभर में आधुनिक स्टील साइलो विकसित किए जा रहे हैं, जिनमें अनाज वैज्ञानिक तरीके से सुरक्षित रखे जाएंगे। हालांकि, हाल के दिनों में यह योजना विवादों के केंद्र में आ गई है। 

Contents
  • FCI के 20,000 करोड़ रुपये के साइलो प्रोजेक्ट पर विवाद, से जुड़े मुख्य बिंदु 
  • FCI की ‘हब एंड स्पोक’ साइलो योजना क्या है ?
  • दो कंपनियों के पास क्यों केंद्रित हो गए अधिकांश ठेके?
  • भंडारण क्षमता को लेकर क्या हैं दावे?
  • एंटी-मोनोपॉली क्लॉज क्या था और विवाद क्यों हुआ?
  • 2022 की PPPAC बैठक पर क्यों उठ रहे हैं सवाल?
  • किसान संगठनों ने क्यों जताई चिंता?
  • क्या छोटे और मध्यम उद्यमों के लिए प्रतिस्पर्धा कठिन थी?
  • एफसीआई ने आरोपों का क्या जवाब दिया?
  • सबसे कम बोली लगाने वालों को ही मिले ठेके
  • फेज़-1 और फेज़-2 के परिणाम क्या बताते हैं?
  • क्या अन्य कंपनियों ने भी हिस्सा लिया था?
  • विदेशी निवेश और खाद्य सुरक्षा को लेकर क्यों उठे सवाल?
  • किसान संगठनों की प्रमुख मांगें क्या हैं ?
  • विवाद का मूल सवाल क्या है?
  • FCI के 20,000 करोड़ रुपये के साइलो प्रोजेक्ट पर विवाद से जुड़े मुख्य FAQs

न्यूज़लॉन्ड्री की एक जांच रिपोर्ट, अखिल भारतीय किसान सभा (AIKS) के आरोपों और इसके जवाब में एफसीआई व सरकारी पक्ष की सफाई ने इस परियोजना को राष्ट्रीय बहस का विषय बना दिया है। विवाद का मुख्य मुद्दा यह है कि क्या इस परियोजना में कुछ कंपनियों का अत्यधिक दबदबा बन गया है या फिर यह पूरी तरह प्रतिस्पर्धी और पारदर्शी निविदा प्रक्रिया का परिणाम है।

FCI के 20,000 करोड़ रुपये के साइलो प्रोजेक्ट पर विवाद, से जुड़े मुख्य बिंदु 

  • FCI ने 20,000 करोड़ रुपये की “हब एंड स्पोक” साइलो योजना शुरू की है।
  • योजना का उद्देश्य आधुनिक स्टील साइलो के माध्यम से वैज्ञानिक अनाज भंडारण करना है।
  • 134 में से 110 अनुबंध अडाणी एग्री लॉजिस्टिक्स और लीप इंडिया को मिलने का दावा किया गया।
  • इन दोनों कंपनियों के पास लगभग 16,500 करोड़ रुपये के ठेके होने की बात कही गई है।
  • एंटी-मोनोपॉली क्लॉज हटाने के निर्णय पर विवाद खड़ा हुआ है।
  • किसान संगठनों ने JPC जांच और भंडारण क्षमता पर सीमा तय करने की मांग की है।
  • FCI का दावा है कि सभी ठेके पारदर्शी और प्रतिस्पर्धी बोली प्रक्रिया के तहत दिए गए।
  • सरकार का कहना है कि सबसे कम बोली लगाने वाली कंपनियों को अनुबंध मिले हैं।
  • फेज़-1 और फेज़-2 के अलग-अलग परिणामों को सरकार निष्पक्ष प्रक्रिया का प्रमाण मानती है।
  • विवाद खाद्य सुरक्षा, निजी निवेश और बाज़ार प्रतिस्पर्धा से जुड़ा बड़ा नीतिगत मुद्दा बन गया है।

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FCI की ‘हब एंड स्पोक’ साइलो योजना क्या है ?

भारतीय खाद्य निगम देशभर के किसानों से न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर गेहूं और धान की खरीद करता है तथा राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (NFSA) के तहत करोड़ों लोगों तक खाद्यान्न पहुंचाने की जिम्मेदारी निभाता है। वर्षों से अनाज भंडारण के लिए पारंपरिक गोदामों का उपयोग किया जाता रहा है, जहां मौसम, नमी और अन्य कारणों से अनाज के खराब होने की आशंका बनी रहती है।

इसी चुनौती से निपटने के लिए एफसीआई ने आधुनिक साइलो आधारित भंडारण प्रणाली विकसित करने का फैसला किया। “हब एंड स्पोक” मॉडल में बड़े केंद्रीय भंडारण केंद्र (हब) और उनसे जुड़े छोटे वितरण केंद्र (स्पोक) विकसित किए जाते हैं, जिससे अनाज का भंडारण और परिवहन अधिक कुशल बनाया जा सके।

दो कंपनियों के पास क्यों केंद्रित हो गए अधिकांश ठेके?

विवाद की शुरुआत उस समय हुई जब रिपोर्टों में दावा किया गया कि इस परियोजना के तहत जारी 134 साइलो अनुबंधों में से 110 अनुबंध अडाणी एग्री लॉजिस्टिक्स लिमिटेड और लीप इंडिया फूड एंड लॉजिस्टिक्स प्राइवेट लिमिटेड को मिले हैं।

बताया गया कि इन अनुबंधों का कुल मूल्य 16,500 करोड़ रुपये से अधिक है। यदि इन आंकड़ों को देखा जाए तो परियोजना का एक बड़ा हिस्सा केवल दो कंपनियों के नियंत्रण में दिखाई देता है। यही कारण है कि कई संगठनों और विशेषज्ञों ने बाज़ार में अत्यधिक केंद्रीकरण की आशंका जताई है।

भंडारण क्षमता को लेकर क्या हैं दावे?

रिपोर्टों के अनुसार, इस परियोजना के लगभग 60 लाख मीट्रिक टन नई भंडारण क्षमता विकसित की जायेगी। आरोप है कि इसमें से लगभग 46.5 लाख मीट्रिक टन क्षमता अडाणी और लीप इंडिया के साइलो नेटवर्क के पास होगी।

आलोचकों का कहना है कि खाद्य सुरक्षा जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्र में इतनी बड़ी क्षमता का कुछ कंपनियों के पास केंद्रित होना भविष्य में बाज़ार संतुलन और नीति निर्माण पर असर डाल सकता है। हालांकि सरकार और एफसीआई इन आशंकाओं को खारिज करते हैं।

एंटी-मोनोपॉली क्लॉज क्या था और विवाद क्यों हुआ?

इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू तथाकथित “एंटी-मोनोपॉली क्लॉज” है। जानकारी के अनुसार, एफसीआई ने शुरुआत में ऐसी शर्त शामिल करने का प्रस्ताव रखा था, जिससे कोई एक कंपनी या सीमित समूह परियोजना के बहुत बड़े हिस्से पर नियंत्रण न कर सके।

इस प्रावधान का उद्देश्य बाज़ार में स्वस्थ प्रतिस्पर्धा बनाए रखना और विभिन्न कंपनियों को अवसर प्रदान करना था। लेकिन बाद में यह प्रावधान अंतिम निविदा दस्तावेज़ों से हटा दिया गया, जिसके बाद विवाद और गहरा गया।

2022 की PPPAC बैठक पर क्यों उठ रहे हैं सवाल?

न्यूज़लॉन्ड्री की रिपोर्ट और किसान संगठनों के अनुसार, मई 2022 में हुई सार्वजनिक-निजी भागीदारी मूल्यांकन समिति (PPPAC) की बैठक के दौरान एंटी-मोनोपॉली क्लॉज हटाने का निर्णय लिया गया।

आरोप लगाया गया कि नीति आयोग और आर्थिक मामलों के विभाग ने इस प्रावधान का विरोध किया और बाज़ार को खुला रखने की वकालत की। आलोचकों का मानना है कि इस फैसले ने बड़ी कंपनियों को अधिक अवसर प्रदान किए, जबकि सरकारी पक्ष इसे निवेश और प्रतिस्पर्धा बढ़ाने वाला कदम बताता है।

किसान संगठनों ने क्यों जताई चिंता?

अखिल भारतीय किसान सभा (AIKS) ने इस पूरे मामले को खाद्य सुरक्षा व्यवस्था के बढ़ते कॉर्पोरेटकरण का उदाहरण बताया है। संगठन का कहना है कि सार्वजनिक महत्व की खाद्य अवसंरचना पर निजी कंपनियों का बढ़ता प्रभाव भविष्य में नीति निर्धारण और खाद्यान्न प्रबंधन को प्रभावित कर सकता है।

किसान संगठनों का मानना है कि खाद्य सुरक्षा जैसी संवेदनशील व्यवस्था में सरकारी नियंत्रण मज़बूत रहना चाहिए और निजी कंपनियों की भूमिका संतुलित होनी चाहिए।

क्या छोटे और मध्यम उद्यमों के लिए प्रतिस्पर्धा कठिन थी?

किसान सभा का आरोप है कि निविदा की शर्तें इतनी पूंजी-आधारित थीं कि केवल बड़ी वित्तीय क्षमता वाली कंपनियां ही प्रभावी रूप से भाग ले सकती थीं। इससे सहकारी संस्थाओं, छोटे उद्यमों और सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों की भागीदारी सीमित हो गई।

हालांकि इस दावे को लेकर सरकार और एफसीआई का अलग दृष्टिकोण है। उनका कहना है कि परियोजना के पैमाने को देखते हुए तकनीकी और वित्तीय क्षमता आवश्यक थी।

एफसीआई ने आरोपों का क्या जवाब दिया?

एफसीआई ने स्पष्ट रूप से कहा है कि परियोजनाओं के आवंटन में किसी प्रकार का पक्षपात नहीं किया गया। निगम के अनुसार, पूरी प्रक्रिया स्थापित खरीद नियमों के तहत पारदर्शी तरीके से संचालित की गई।

एफसीआई का दावा है कि सभी पात्र कंपनियों को निविदा प्रक्रिया में भाग लेने का समान अवसर दिया गया और किसी विशेष कंपनी को कोई अतिरिक्त लाभ नहीं मिला।

सबसे कम बोली लगाने वालों को ही मिले ठेके

एफसीआई और सरकारी सूत्रों का कहना है कि परियोजनाओं का आवंटन पूरी तरह प्रतिस्पर्धी बोली प्रक्रिया के आधार पर किया गया। जिन कंपनियों ने सबसे कम दरों पर काम करने की पेशकश की, उन्हें अनुबंध दिए गए।

सरकार का तर्क है कि यदि सबसे कम बोली लगाने वाली कंपनियों को ठेका न दिया जाता, तो सार्वजनिक धन के दुरुपयोग और राजकोष को नुकसान पहुंचाने के आरोप लग सकते थे।

फेज़-1 और फेज़-2 के परिणाम क्या बताते हैं?

सरकारी पक्ष का एक प्रमुख तर्क यह है कि यदि किसी कंपनी को विशेष लाभ दिया गया होता, तो दोनों चरणों में वही कंपनी लगातार सफल रहती।

उपलब्ध जानकारी के अनुसार, फेज़-1 में अडाणी एग्री लॉजिस्टिक्स ने महत्वपूर्ण सफलता हासिल की, जबकि फेज़-2 में उसे कोई परियोजना नहीं मिली। दूसरी ओर लीप इंडिया और अन्य कंपनियां सफल रहीं। सरकार इसे निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा का प्रमाण मानती है।

क्या अन्य कंपनियों ने भी हिस्सा लिया था?

सरकारी सूत्रों के अनुसार, परियोजना की निविदा प्रक्रिया में SAR Transport Systems, India Potash, Mapsko Builders, Shree Karni Traders और कई अन्य कंपनियों ने भी भाग लिया।

सरकार का कहना है कि कई परियोजनाओं में तीन से पंद्रह तक बोलीदाता शामिल हुए, जिससे प्रतिस्पर्धा का स्तर पर्याप्त रूप से मज़बूत बना रहा।

विदेशी निवेश और खाद्य सुरक्षा को लेकर क्यों उठे सवाल?

किसान सभा ने यह भी चिंता जताई है कि लीप इंडिया को विदेशी निवेश फंडों का समर्थन प्राप्त है। संगठन का तर्क है कि यदि देश की रणनीतिक खाद्य अवसंरचना में विदेशी पूंजी का प्रभाव बढ़ता है, तो यह भविष्य में नीतिगत और आर्थिक चुनौतियां पैदा कर सकता है।

हालांकि अभी तक इस संबंध में किसी सरकारी एजेंसी द्वारा कोई आपत्ति सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आई है।

किसान संगठनों की प्रमुख मांगें क्या हैं ?

किसान संगठनों ने एंटी-मोनोपॉली प्रावधान को दोबारा लागू करने, किसी एक कंपनी द्वारा नियंत्रित भंडारण क्षमता की अधिकतम सीमा तय करने और पूरे मामले की जांच के लिए संयुक्त संसदीय समिति (JPC) गठित करने की मांग की है।

इसके अलावा, संगठनों का कहना है कि एफसीआई की अपनी भंडारण क्षमता बढ़ाने के लिए सार्वजनिक निवेश को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

विवाद का मूल सवाल क्या है?

एफसीआई की साइलो योजना को लेकर चल रही बहस केवल ठेकों के आवंटन तक सीमित नहीं है। यह मामला खाद्य सुरक्षा, सार्वजनिक अवसंरचना, निजी निवेश, बाजार प्रतिस्पर्धा और सरकारी नीतियों से जुड़ा हुआ है। एक पक्ष इसे पूरी तरह पारदर्शी और प्रतिस्पर्धी प्रक्रिया का परिणाम बता रहा है, जबकि दूसरा पक्ष इसे सार्वजनिक खाद्य सुरक्षा ढांचे में बढ़ते कॉर्पोरेट प्रभाव और बाजार केंद्रीकरण के रूप में देख रहा है। आने वाले समय में इस मुद्दे पर राजनीतिक, आर्थिक और नीतिगत बहस और तेज होने की संभावना है।

News source: Newslaundary

यह भी पढ़ें औद्योगिक क्रांति: विकास की नींव या मजदूरों के शोषण की कहानी

FCI के 20,000 करोड़ रुपये के साइलो प्रोजेक्ट पर विवाद से जुड़े मुख्य FAQs

1. FCI की हब एंड स्पोक साइलो योजना क्या है?

यह आधुनिक अनाज भंडारण प्रणाली है, जिसमें बड़े केंद्रीय साइलो (हब) और छोटे वितरण केंद्र (स्पोक) विकसित किए जाते हैं।

2. इस परियोजना का कुल मूल्य कितना है?

परियोजना की अनुमानित लागत लगभग 20,000 करोड़ रुपये है।

3. एंटी-मोनोपॉली क्लॉज़ क्या है?

यह एक प्रस्तावित प्रावधान है , जिसके उद्देश्य किसी एक कंपनी को परियोजना के बड़े हिस्से पर नियंत्रण  करने से रोकते हैं।

4. किसान संगठनों की क्या मांग है?

वे एंटी-मोनोपॉली क्लॉज़ की वापसी, JPC जांच और भंडारण क्षमता की अधिकतम सीमा तय करने की मांग कर रहे हैं।

5. FCI ने आरोपों पर क्या कहा है?

FCI का कहना है कि सभी अनुबंध पारदर्शी और प्रतिस्पर्धी निविदा प्रक्रिया के आधार पर दिए गए हैं।

6. यह मामला इतना महत्वपूर्ण क्यों है?

क्योंकि यह देश की खाद्य सुरक्षा, सार्वजनिक अवसंरचना, निजी निवेश और बाजार प्रतिस्पर्धा जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों से जुड़ा हुआ है।

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