सर्वोच्च न्यायालय ने करूर भगदड़ हादसे के पीड़ित परिवारों को अनुकंपा के आधार पर सरकारी नौकरी देने के विषय में तमिलनाडु सरकार को राहत दी है। SC अदालत ने मद्रास उच्च न्यायलय के उस आदेश पर रोक लगा दी, जिसमें ऐसी नियुक्तियों पर रोक लगाई गई थी।
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने शुक्रवार, 14 अगस्त 2026 को तमिलनाडु सरकार की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह अंतरिम आदेश पारित किया। सरकार ने मद्रास हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था। \
इस आदेश के बाद हादसे में जान गंवाने वाले पीड़ित परिवारों को अनुकंपा के आधार पर नियुक्ति देने की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने का रास्ता खुल गया है। मामले में सुप्रीम कोर्ट के आगे के आदेश पर अब सबकी नजर रहेगी।
तमिलनाडु में करूर हादसा कब हुआ?
तमिलनाडु के करूर में अभिनेता से नेता बन रहे तमिलनाडु के वर्तमान मुख्यमंत्री थलापति सी जोसेफ विजय की TVK पार्टी के रैली में एक्टर विजय को देखने और उनकी भाषण सुनने के लिए जुटे थे इस रैली में भगदड़ मच गई।
भगदड़ की वजह से 27 सितंबर, 2025 को बहुत बड़ा हादसा हुआ इस हादसे में करीब 40 लोग मारे गए थे और लगभग 80 लोगों की जख्मी होने की पुष्टि हुई थी। हादसे के बाद भीड़ प्रबंधन और सुरक्षा इंतजामों को लेकर गंभीर सवाल उठे।
सरकार की नीति पर हाई कोर्ट के हस्तक्षेप पर उठाया सवाल
इस मामले में तमिलनाडु सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी और मुकुल रोहतगी ने सुप्रीम कोर्ट में पक्ष रखा। सुनवाई के दौरान सिंघवी ने सरकार के फैसले का बचाव करते हुए कहा कि यदि राज्य सरकार संविधान के अनुच्छेद 162 के तहत अपनी नीतिगत शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए हादसे के बाद पीड़ित परिवारों को अनुकंपा के आधार पर नौकरी देने का निर्णय लेती है, तो हाई कोर्ट को इसमें हस्तक्षेप क्यों करना चाहिए?
मद्रास हाई कोर्ट ने नियुक्तियों पर क्यों लगाई थी रोक?
दरअसल, 27 जुलाई 2026 को मद्रास हाई कोर्ट की मदुरै बेंच ने करूर भगदड़ हादसे में जान गंवाने वालों के परिजनों को सरकारी नौकरी देने के तमिलनाडु सरकार के फैसले पर रोक लगा दी थी। हाई कोर्ट ने माना था कि इस तरह की नियुक्तियां संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 में निहित समानता के अधिकार के सवाल खड़े करती हैं।
अदालत ने यह भी चिंता जताई कि अगर इस मामले में अनुकंपा के आधार पर नौकरी देने की अनुमति दी जाती है, तो भविष्य में इसी तरह की नियुक्तियों की मांग बढ़ सकती है।
अदालत ने आतिशबाजी और सड़क हादसों का उदाहरण देते हुए कहा था कि ऐसी घटनाओं में भी सरकारी स्तर पर लापरवाही के आरोप लग सकते हैं और लोगों की जान जा सकती है। लेकिन ऐसे मामलों में आमतौर पर प्रभावित परिवारों को राहत या मुआवजा दिया जाता है, सरकारी नौकरी नहीं।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा- मामले में राजनीति को दूर रखें
सुनवाई के दौरान एक राजनीतिक दल की ओर से पेश हुए अधिवक्ता वेलन ने अनुकंपा के आधार पर सरकारी नौकरी देने के फैसले पर सवाल उठाया। उन्होंने दलील दी कि ऐसी नियुक्तियां केवल राज्य सरकार की इच्छा के आधार पर नहीं की जा सकतीं।
वकील ने आगे दावा किया कि जिस राजनीतिक दल पर भगदड़ की घटना के लिए जिम्मेदारी का आरोप लगाया जा रहा है, वही वर्तमान में राज्य की सत्ता में है। उन्होंने इसे संभावित ‘हितों के टकराव’ का मामला बताया। इस पर जस्टिस जेबी पारदीवाला ने उनसे पूछा कि वह किसकी ओर से अदालत में पेश हो रहे हैं।
वकील ने बताया कि वह एक राजनीतिक दल की ओर से उपस्थित हैं। इसके बाद जस्टिस पारदीवाला ने सवाल किया कि इस मामले में किसी राजनीतिक दल की भूमिका क्या है। वहीं, जस्टिस के. विनोद चंद्रन ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि मामले में राजनीति को नहीं लाया जाना चाहिए।

