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Home » कॉलेजियम प्रणाली में पारदर्शिता पर जस्टिस उज्ज्वल भुइयां का बड़ा सवाल: क्या न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया में बदलाव की ज़रूरत है?

Law & Order

कॉलेजियम प्रणाली में पारदर्शिता पर जस्टिस उज्ज्वल भुइयां का बड़ा सवाल: क्या न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया में बदलाव की ज़रूरत है?

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Last updated: August 3, 2026 12:09 pm
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भारत की न्यायपालिका, जिसे लोकतंत्र का सबसे मजबूत स्तंभ माना जाता है, पर लोगों का भरोसा इस बात पर निर्भर करता है कि न्यायाधीश निष्पक्ष होकर फैसला करेंगे। इसलिए न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया उतनी ही महत्वपूर्ण है।

Contents
  •  इस लेख में जानिए 
  • जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने क्या कहा?
  • कॉलेजियम प्रणाली क्या है?
  •  पारदर्शिता पर सवाल क्यों उठ रहे हैं?
  •  न्यायपालिका और लोकतंत्र पर क्या असर पड़ सकता है?
  •  विशेषज्ञों की राय
  • निष्कर्ष
  • अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयां ने कॉलेजियम प्रणाली में बढ़ती गोपनीयता के बारे में चिंता जताई। उन्होंने बताया कि यदि नियुक्ति से जुड़े फैसलों के पीछे के कारण जनता के सामने रखे जाएँ, तो न्यायपालिका की गरिमा कम नहीं होगी; बल्कि भरोसा और गहरा होगा। यह टिप्पणी फिर से कॉलेजियम पर राष्ट्रीय बहस को केंद्र में ले आई।

 इस लेख में जानिए 

– जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने क्या कहा? 

– कॉलेजियम प्रणाली क्या है? 

– पारदर्शिता को लेकर सवाल क्यों उठ रहे हैं? 

– न्यायपालिका और लोकतंत्र पर इसका क्या असर पड़ सकता है? 

– विशेषज्ञ इस मुद्दे पर क्या कहते हैं?

जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने क्या कहा?

नई दिल्ली में एक कानूनी कार्यक्रम के दौरान, जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने कहा कि कुछ वर्ष पहले तक सुप्रीम कोर्ट का कॉलेजियम अपनी सिफ़ारिशों के साथ संक्षिप्त कारण भी सार्वजनिक करता था। इससे लोगों को समझने में मदद मिलती थी कि किसी उम्मीदवार का चयन क्यों हुआ या नाम क्यों वापस लिया गया।

हाल के वर्षों में ऐसे कारण अक्सर सार्वजनिक नहीं हुए। इसका मतलब नियुक्ति प्रक्रिया पहले से ज़्यादा गोपनीय हो रही है, उनका मानना है। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि किसी नियुक्ति के पीछे के कारण बताये जाएँ, तो इससे कोई नुकसान होगा? उनके अनुसार, जानकारी साझा करने से जनता का विश्वास बढ़ेगा।

कॉलेजियम प्रणाली क्या है?

कॉलेजियम वह व्यवस्था है जिसके ज़रिये सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के न्यायाधीशों की नियुक्ति और स्थानांतरण की सिफ़ारिश की जाती है।

मुख्य हैं: 

– भारत के मुख्य न्यायाधीश (Chief Justice of India) 

– सुप्रीम कोर्ट के चार वरिष्ठतम न्यायाधीश

ये मिलकर तय करते हैं कि किसे न्यायाधीश बनाया जाए या किसका स्थानांतरण हो।

कॉलेजियम का उल्लेख संविधान में नहीं है; यह सुप्रीम कोर्ट के कई ऐतिहासिक फैसलों, जिन्हें Three Judges Cases कहा जाता है, के बाद बना।

2015 में सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) को असंवैधानिक घोषित करते हुए कॉलेजियम को बरकरार रखा। साथ ही कहा गया कि इस व्यवस्था में सुधार और अधिक पारदर्शिता की ज़रूरत है।

 पारदर्शिता पर सवाल क्यों उठ रहे हैं?

विशेषज्ञों का मानना है कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता उतनी ही ज़रूरी है जितनी उसकी जवाबदेही।

यदि नियुक्ति के कारण सार्वजनिक नहीं होंगे, तो लोगों के मन में कई सवाल उठ सकते हैं, जैसे: 

– किसी उम्मीदवार का चयन किस आधार पर हुआ? 

– किसी नाम को क्यों हटाया गया? 

– क्या सभी उम्मीदवारों के साथ समान व्यवहार हुआ?

जस्टिस भुइयां का कहना है कि जनता को यह जानने का अधिकार है कि न्यायाधीशों की नियुक्ति किन आधारों पर होती है।

 न्यायपालिका और लोकतंत्र पर क्या असर पड़ सकता है?

भारत में न्यायपालिका संविधान की रक्षक मानी जाती है, और उसके लिए भरोसा बनाए रखना सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी है।

लगातार सवाल उठने से न्यायपालिका की विश्वसनीयता पर असर हो सकता है।

कुछ कानूनी विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि नियुक्ति प्रक्रिया में सीमित गोपनीयता ज़रूरी है, ताकि बाहरी दबाव फैसलों को प्रभावित न कर सके।

यही सबसे बड़ी चुनौती है: न्यायपालिका की स्वतंत्रता और पारदर्शिता – दोनों के बीच सही संतुलन बनाना।

 विशेषज्ञों की राय

कई वरिष्ठ कानून विशेषज्ञ मानते हैं कि कॉलेजियम को खत्म करने की ज़रूरत नहीं है; बल्कि इसे बेहतर बनाना ज़रूरी है।

वे कुछ सुझाव देते हैं: 

– नियुक्ति के कारणों का संक्षिप्त विवरण सार्वजनिक किया जाए। 

– चयन के मानदंड स्पष्ट किए जाएं। 

– नियुक्ति प्रक्रिया समयबद्ध हो। 

– कॉलेजियम की कार्यप्रणाली अधिक पारदर्शी बने।

उनका मानना है कि इससे न्यायपालिका की गरिमा बनी रहेगी और जनता का भरोसा बढ़ेगा।

निष्कर्ष

जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की टिप्पणी ने फिर से कॉलेजियम पर पारदर्शिता पर चर्चा शुरू कर दी है। उनका लक्ष्य व्यवस्था की आलोचना नहीं, बल्कि उसे और भरोसेमंद, जवाबदेह और पारदर्शी बनाना है।

न्यायपालिका पर लोगों का विश्वास लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत है। अगर नियुक्ति प्रक्रिया निष्पक्ष और पारदर्शी होगी, तो यह विश्वास और मजबूत होगा। आने वाले समय में देखना ज़रूरी है कि क्या कॉलेजियम इस दिशा में ठोस कदम उठाता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1.जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने कॉलेजियम प्रणाली पर क्या कहा?

 उन्होंने कहा कि न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया में बढ़ती गोपनीयता चिंता का विषय है और नियुक्ति के कारणों को सार्वजनिक करने से जनता का भरोसा बढ़ेगा।

2.कॉलेजियम प्रणाली क्या है?

 यह सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और चार वरिष्ठतम न्यायाधीशों का समूह है, जो सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के न्यायाधीशों की नियुक्ति और स्थानांतरण की सिफ़ारिश करता है।

3.कॉलेजियम प्रणाली में पारदर्शिता की मांग क्यों उठ रही है?

 क्योंकि कई नियुक्तियों और नाम वापस लेने के कारण सार्वजनिक नहीं किए जाते, जिससे जवाबदेही और पारदर्शिता पर सवाल उठते हैं।

4.NJAC क्या था?

 राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए प्रस्तावित नई व्यवस्था थी। 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने इसे असंवैधानिक घोषित कर दिया था।

5.इस मुद्दे का लोकतंत्र से क्या संबंध है?

 न्यायपालिका लोकतंत्र का एक प्रमुख स्तंभ है। उसकी नियुक्ति प्रक्रिया जितनी निष्पक्ष, पारदर्शी और भरोसेमंद होगी, जनता का लोकतांत्रिक संस्थाओं पर विश्वास उतना ही मजबूत रहेगा।

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