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Home » ​डी-एक्सटिंक्शन साइंस: क्या धरती पर फिर से लौटेंगे मैमथ और डायनासोर?

Science

​डी-एक्सटिंक्शन साइंस: क्या धरती पर फिर से लौटेंगे मैमथ और डायनासोर?

SA News
Last updated: May 13, 2026 11:04 am
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​डी-एक्सटिंक्शन साइंस: क्या धरती पर फिर से लौटेंगे मैमथ और डायनासोर?
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​विज्ञान की दुनिया में ‘डी-एक्सटिंक्शन साइंस’ (De-extinction) एक ऐसा विषय बन चुका है जो कल्पना और वास्तविकता के बीच की लकीर को धुंधला कर रहा है। 2026 तक आते-आते,’कोलोसल बायोसाइंसेज’ जैसी कंपनियों ने मैमथ-जैसे जीव विकसित करने की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति का दावा किया है। हालांकि, डायनासोर को वापस लाना आज भी एक बड़ी चुनौती बना हुआ है। यह रिपोर्ट बताती है कि विज्ञान कहाँ तक पहुँचा है और इसकी सीमाएं क्या हैं।

Contents
  • ​News Highlights
  • ​The Science of Resurrection: विलुप्त जीवों का पुनर्जन्म
  • CRISPR-Cas9: वह “जेनेटिक कैंची” जो मैमथ-जैसे जीव विकसित करने में मदद कर सकती है 
  • आर्कटिक पारिस्थितिकी तंत्र में मैमथ की भूमिका
  • ​डायनासोर और DNA की उम्र की सीमा
  • ​नैतिक चुनौतियाँ और भविष्य का संकट
  • अविनाशी लोक, जहाँ कुछ भी विलुप्त नहीं होता
  • ​FAQs

​News Highlights

  • ​मैमथ की वापसी: वैज्ञानिक एशियाई हाथियों के DNA में मैमथ के जीन डालकर ‘मैमथ-जैसे’ जीव विकसित करने का प्रयास कर रहे हैं।
  • ​DNA की उम्र: डायनासोर 6.6 करोड़ साल पहले विलुप्त हुए थे, और इतने पुराने DNA का सुरक्षित मिलना वैज्ञानिक रूप से लगभग असंभव है।
  • ​CRISPR तकनीक: जीन-एडिटिंग के जरिए विलुप्त जीवों के लक्षणों को जीवित प्रजातियों में डालने का प्रयास जारी।
  • ​पारिस्थितिकी संतुलन: मैमथ को वापस लाने का मुख्य उद्देश्य आर्कटिक टूंड्रा के पर्यावरण को सुधारना और ग्लोबल वार्मिंग से लड़ना है।

​The Science of Resurrection: विलुप्त जीवों का पुनर्जन्म

​मैमथ को दोबारा जिंदा करने की प्रक्रिया ‘क्लोनिंग’ से थोड़ी अलग है। चूंकि मैमथ का पूर्ण DNA पूरी तरह सुरक्षित नहीं है, इसलिए वैज्ञानिक CRISPR नामक जीन-एडिटिंग टूल का उपयोग कर रहे हैं। वे एशियाई हाथी के जीनोम में मैमथ के उन विशिष्ट जीनों को जोड़ रहे हैं जो उन्हें ठंडे वातावरण में रहने, घने बाल और अतिरिक्त वसा (Fat) देने के लिए जिम्मेदार थे।

​लेकिन जब बात डायनासोर की आती है, तो विज्ञान एक दीवार से टकरा जाता है। DNA की एक ‘हाफ-लाइफ’ (अर्ध-आयु) होती है। शोधों के अनुसार आदर्श परिस्थितियों में DNA लगभग 68 लाख वर्षों के भीतर पूरी तरह टूट सकता है। डायनासोर को खत्म हुए 6.6 करोड़ साल बीत चुके हैं, इसलिए उनका वास्तविक जेनेटिक ब्लूप्रिंट मिलना नामुमकिन है।

CRISPR-Cas9: वह “जेनेटिक कैंची” जो मैमथ-जैसे जीव विकसित करने में मदद कर सकती है 

​डी-एक्सटिंक्शन के पीछे की सबसे महत्वपूर्ण तकनीक CRISPR-Cas9 है। इसे आप एक बेहद सटीक जेनेटिक कैंची की तरह समझ सकते हैं। वैज्ञानिक ठंडे इलाकों में दबे मिले मैमथ के अवशेषों से उनके जेनेटिक कोड का अध्ययन करते हैं। चूंकि एक जीवित कोशिका के बिना क्लोनिंग संभव नहीं है, इसलिए वे मैमथ के सबसे करीबी रिश्तेदार, एशियाई हाथी, की कोशिकाओं का उपयोग करते हैं। इस तकनीक के जरिए हाथी के DNA में उन खास जगहों को काटा जाता है जहाँ ठंड से बचने वाले जीन, छोटे कान और घुंघराले बालों वाले कोड मौजूद होते हैं। यह एक हाइब्रिड भ्रूण (Embryo) तैयार करने की प्रक्रिया है, जिसे एक सरोगेट हाथी मां की कोख में विकसित किया जाएगा।

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आर्कटिक पारिस्थितिकी तंत्र में मैमथ की भूमिका

​वैज्ञानिक मैमथ को केवल मनोरंजन के लिए वापस नहीं लाना चाहते, बल्कि इसके पीछे एक ठोस पर्यावरणीय उद्देश्य है। हज़ारों साल पहले, मैमथ आर्कटिक क्षेत्र में बर्फ को दबाकर रखते थे और घास के मैदानों को बनाए रखते थे, जिसे ‘मैमथ स्टेप’ कहा जाता था। उनके विलुप्त होने के बाद, यह घास के मैदान जंगलों और झाड़ियों में बदल गए, जो सूर्य की गर्मी को सोखते हैं। यदि मैमथ वापस आते हैं, तो वे भारी बर्फ को कुचलकर ज़मीन को ठंडा रखने में मदद करेंगे। इससे ‘पर्माफ्रॉस्ट’ (Permafrost) यानी जमी हुई ज़मीन के नीचे दबी मीथेन गैस बाहर नहीं निकलेगी, जो ग्लोबल वार्मिंग के प्रभाव को कम करने में सहायक हो सकता है।

​डायनासोर और DNA की उम्र की सीमा

​जब हम डायनासोर की बात करते हैं, तो विज्ञान एक कठोर प्राकृतिक सीमा का सामना करता है। हॉलीवुड फिल्मों में भले ही दिखाया गया हो कि अंबर (Amber) में फंसे मच्छरों से डायनासोर का रक्त निकाला जा सकता है, लेकिन वास्तविकता अलग है। वर्तमान वैज्ञानिक शोधों के अनुसार DNA का इतने लंबे समय तक सुरक्षित रहना अत्यंत कठिन माना जाता है। डायनासोर 66 मिलियन वर्ष पहले विलुप्त हुए थे, जिसका अर्थ है कि उनका मूल जेनेटिक ब्लूप्रिंट पूरी तरह धूल बन चुका है। हालांकि, वैज्ञानिक अब ‘रिवर्स इवोल्यूशन’ पर विचार कर रहे हैं, जहाँ वे आधुनिक पक्षियों (जो डायनासोर के वंशज हैं) के पूर्वज लक्षणों को फिर से सक्रिय करने की कोशिश कर रहे हैं, जिसे ‘चिकन-ओ-सोरस’ (Chicken-o-saurus) जैसे प्रोजेक्ट्स के नाम से जाना जाता है।

​नैतिक चुनौतियाँ और भविष्य का संकट

​किसी विलुप्त प्रजाति को वापस लाना न केवल एक वैज्ञानिक चुनौती है, बल्कि एक नैतिक दुविधा भी है। आलोचकों का तर्क है कि जिस दुनिया में वर्तमान प्रजातियाँ तेज़ी से विलुप्त हो रही हैं, वहाँ करोड़ों डॉलर खर्च करके पुराने जीवों को वापस लाना कितना सही है? क्या ऐसे पुनर्निर्मित जीव आधुनिक रोगाणुओं और पर्यावरणीय परिस्थितियों में जीवित रह पाएंगे? इसके अलावा, यदि हम किसी लुप्त जीव को वापस लाते हैं, तो क्या उनके पास रहने के लिए वैसा ही प्राकृतिक घर (Habitat) बचा है जैसा हज़ारों साल पहले था? ये ऐसे सवाल हैं जिन पर वैज्ञानिक समुदाय अभी भी गहन मंथन कर रहा है, क्योंकि एक छोटी सी गलती पूरे पारिस्थितिकी तंत्र का संतुलन बिगाड़ सकती है।

अविनाशी लोक, जहाँ कुछ भी विलुप्त नहीं होता

संत रामपाल जी बताते हैं कि प्रत्येक जीव की आत्मा अमर है और वह अपने कर्मों के अनुसार विभिन्न 84 लाख योनियों में भ्रमण करती है। विज्ञान भले ही शरीर (DNA) को लैब में तैयार कर ले, लेकिन उसमें प्राण और चेतना का प्रवेश पूर्ण परमात्मा के विधान के बिना संभव नहीं है। उनके अनुसार, यह सारा ब्रह्मांड और इसमें रहने वाले प्राणी एक निश्चित विधान के तहत चलते हैं।

विज्ञान उन जीवों को वापस लाना चाहता है जो काल (समय) के प्रभाव से नष्ट हो गए। संत रामपाल जी महाराज अपनी शिक्षाओं में ‘सतलोक’ (अमर लोक) का वर्णन करते हैं, जहाँ किसी भी जीव का विनाश नहीं होता। उनके अनुसार, पृथ्वी पर हम जो भी बदलाव देख रहे हैं, वे क्षणिक हैं। वास्तविक ‘डी-एक्सटिंक्शन’ या दुखों से मुक्ति तब संभव है जब जीव सतभक्ति के मार्ग पर चलकर उस अविनाशी लोक को प्राप्त कर ले, जहाँ न जन्म है और न मृत्यु।

संत जी का संदेश है कि वर्तमान में जीवित प्रजातियों की रक्षा करना और शाकाहार अपनाना सबसे बड़ी मानवता है। विलुप्त जीवों को वापस लाने के भारी खर्च और अनिश्चितता के बीच, महाराज जी ‘जीव हत्या’ को सबसे बड़ा पाप बताते हैं और सभी प्राणियों के प्रति दया भाव रखने की प्रेरणा देते हैं।

​FAQs

​1. क्या हम असली डायनासोर देख पाएंगे?

नहीं, मौजूदा विज्ञान के अनुसार डायनासोर का DNA इतना पुराना हो चुका है कि उसे रिकवर करना असंभव है। हम केवल उनकी तरह दिखने वाले जीव (जैसे पक्षियों के DNA में बदलाव कर) बना सकते हैं।

​2. मैमथ को वापस लाने का क्या फायदा है?

वैज्ञानिकों का मानना है कि मैमथ आर्कटिक की घास के मैदानों को फिर से जीवित करेंगे, जिससे जमीन के नीचे जमी कार्बन बाहर नहीं आएगी और जलवायु परिवर्तन की रफ्तार कम होगी।

​3. पहला मैमथ कब तक पैदा हो सकता है?

कुछ कंपनियों ने 2027-2028 तक मैमथ-जैसे बछड़े विकसित करने का लक्ष्य रखा है। 

​4. क्या यह नैतिक रूप से सही है?

इस पर बहस जारी है। कुछ इसे जैव विविधता (Biodiversity) के लिए अच्छा मानते हैं, जबकि कुछ का मानना है कि यह प्रकृति के नियमों के खिलाफ है।

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