देश की अर्थव्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने के लिये सरकार हर साल बजट पेश करती है। इस बजट के जरिए सरकार यह तय करती है कि उसे कहाँ-कहाँ से कमाई होगी और विकास कार्यों या योजनाओं पर कितना पैसा खर्च होगा। जब सरकार का कुल खर्च, कुल कमाई(आय) से ज्यादा हो जाए तो उसे खर्च और कमाई के अंतर को राजकोषीय घाटा (Fiscal Deficit) कहते है। राजकोषीय घाटा किसी भी देश की आर्थिक स्थिति का एक महत्वपूर्ण संकेतक माना जाता है। यह बताता है कि सरकार को अपने खर्च पूरे करने के लिए कितनी अतिरिक्त धनराशि उधार लेनी पड़ेगी। आइए विस्तार से समझते है कि राजकोषीय घाटा क्या होता है, इसके कारण क्या हैं और इसका देश की अर्थव्यवस्था पर क्या प्रभाव पड़ता है।
राजकोषीय घाटा क्या है
राजकोषीय घाटा का मतलब है सरकार के खर्च और उसकी असली कमाई के बीच का अंतर। जब सरकार का कुल खर्च उसकी टैक्स और अन्य माध्यमों से होने वाली आय से ज्यादा हो जाता है, तो उस कमी को पूरा करने के लिए सरकार को खर्ज लेना पड़ता है।
इसे और अच्छे से एक उदाहरण से समझते है: मान लीजिए सरकार की कमाई 100 रुपये है और खर्च 120 रुपए हुए, तो बचे हुए 20 रुपए सरकार को उधार लेना पड़ेगा। यही उधार लो गई 20 रुपए की राशि राजकोषीय घाटा कहलाती है (इसमें सरकार की उधार की रकम को कमाई के नहीं गिना जाता) ।
विषय बात: राजकोषीय घाटा अक्सर बुरा नहीं होता है। अगर सरकार यह उधार लिया हुआ पैसा सड़कों, रेलवे, हॉस्पिटल और उद्योगों जैसे विकास कार्यों में लगती है तो इससे भविष्य में देश की अर्थव्यवस्था को तो बहुत फायदा होता हो है साथ में देश के नागरिकों को सुविधा भी प्राप्त होती है।
राजकोषीय घाटा होने के प्रमुख कारण
राजकोषीय घाटा में वृद्धि का कारण कई सारे है जैसे: इसका सबसे बड़ा कारण है कि सरकार की कमाई कम होती है और उसके खर्च ज्यादा होते है। जब सरकार बुनियादी ढांचे (इन्फ्रास्ट्रक्चर), जनकल्याणकारी योजनाओं, रक्षा, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे क्षेत्रों पर अधिक खर्च करती है तो बजट बिगड़ जाता है। दुसरे कारण जैसे किसी साल टैक्स की वसूली कम हो या देश में मंडी की वजह से सरकार की कमाई घट जाए, तब भी यह घाटा बढ़ जाता है।
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वहीं दूसरी ओर प्राकतिक आपदाएँ बाढ़-सुखा, महामारी या युद्ध जैसी आपातकालीन समय में सरकार को अचानक बहुत बड़ा अतिरिक्त खर्च करना पड़ता है, जिससे घाटे में भरी वृद्धि होती है। कभी-कभी सरकार देश की आर्थिक प्रगति को तेज करने के लिए खुद सोच-समझकर ज्यादा खर्च करने का फैसला लेती है। ऐसी स्थिति में थोड़े समय के लिए तो घाटा जरूर बढ़ता है, लेकिन अगर यह पैसा सही विकास कार्यों में लगे, तो आगे चलकर देश की अर्थव्यवस्था को इसका बड़ा फायदा मिलता है।
राजकोषीय घाटे का अर्थव्यवस्था पर प्रभाव
महंगाई पर असर
यही सरकार लगातार अधिक उधार लेती है या अतिरिक धन की व्यवस्था करती है तो बाजार में धन का प्रवाह बढ़ सकता है। इससे महंगाई बढ़ने की संभावना होती है और आम लोगों की क्रय शक्ति पर प्रभाव पड़ता है।
सरकारी कर्ज में वृद्धि
राजकोषीय घाटा बढ़ने पर सरकार को बाजार या अन्य संस्थाओं से अधिक ऋण लोन लेना पड़ता है। लगातार बढ़ता सरकारी कर्ज भविष्य में ब्याज भुगतान का बोझ बढ़ा सकता है।
विकास कार्यों पर प्रभाव
यदि उधार लिया गया धन राशि को शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, उद्योग और आधारभूत ढांचे के विकास में लगाया जाए, तो इससे रोजगार बढ़ सकता है और अर्थव्यवस्था को मजबूती मिल सकती है। इसीलिए राजकोषीय घाटे का प्रभाव इस बात पर भी निर्भर करता है कि धन का उपयोग किस उद्देश्य के लिए किया जा रहा है।
निवेशकों का विश्वास
जब राजकोषीय घाटा नियंत्रण (लिमिट) में रहता है, तो देश और विदेश के निवेशकों का भरोसा बना रहता है। लेकिन अगर यह घाटा बहुत बढ़ता रहे, तो निवेशकों का डर और चिंता बढ़ने लगती हैं जिसका सीधा बुरा असर देश में आने वाले निवेश और आर्थिक विकास पर पड़ता है।
राजकोषीय घाटे पर नियंत्रित
सरकार राजकोषीय घाटे को कम करने के लिए कई जरूरी और उपयोगी कदम उठाती है। सबसे पहले कर संग्रह बढ़ाने की कोशिश करती है जिससे सरकारी आय बढ़ सके। और अनावश्यक सरकारी खर्चों में कटौती की जाती है और योजनाओं को अधिक प्रभावी बनाया जाता है।
सरकार सार्वजनिक क्षेत्रों के उपक्रमों में विनिवेश करके भी अतिरिक्त आय प्राप्त करती है। आर्थिक विकास को बढ़ाती है जिससे रोजगार और व्यापार से भी कर संग्रह में बढ़ोत्तरी हो। ताकि राजकोषीय घाटा में नियंत्रण मिल सकें । इसके अलावा सरकार प्रबंधन के माध्यम से आय और व्यय के बीच संतुलन बनाए रखने का प्रयास करती है ताकि लंबे समय तक देश का आर्थिक सिस्टम स्थिर रहे।
राजकोषीय घाटा क्यों है महत्वपूर्ण
राजकोषीय घाटा सिर्फ एक नंबर, संख्या या आंकड़ा नहीं है, बल्कि यह बताता है कि सरकार अपने पैसों का प्रबंधन कितने सही तरीकों से कर रही है। इससे साफ पता चलता है कि सरकार को अपने काम और योजनाएं सुचारू रूप से चालू रखने के लिए कितना कर्ज(उधार) लेना पड़ रहा है। अगर यह घाटा एक तय सीमा के अंदर रहे और उधार का पैसा देश के विकास (जैसे सड़क, हॉस्पिटल, स्कूल और उद्योग) में लगे, तो इससे देश आगे बढ़ता है। लेकिन अगर कर्ज लगातार बढ़ता रहे तो यह आगे चलकर देश की अर्थव्यवस्था के लिए मुश्किले खड़ी कर सकता है। इसीलिए सरकार के लिए जरूरी है कि वह विकास के काम करने के साथ-साथ अपनी कमाई और खर्चे में सही संतुलन बनाकर रखें। इससे अर्थव्यवस्था मजबूत होगी, निवेश बढ़ेगा और देश की तरक्की टिकाऊ बनेगीं।
आर्थिक संतुलन के साथ जीवन का सही उद्देश्य
राजकोषीय घाटे में सरकार अपनी आय और खर्च के बीच संतुलन बनाने की कोशिश करती है। इसी तरह मनुष्य को भी अपने जीवन में सांसारिक जिम्मेदारियों के साथ आध्यात्मिक संतुलन बनाना चाहिए। संत रामपाल जी महाराज की शिक्षाओं के अनुसार मनुष्य जीवन का वास्तविक उद्देश्य केवल धन कमाना या भौतिक सुख प्राप्त करना नहीं, बल्कि शास्त्रों के अनुसार सतभक्ति करके मोक्ष प्राप्त करना है। उनके अनुसार संसार की सभी उपलब्धियां नाशवान हैं, जबकि परमात्मा की भक्ति मनुष्य को जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति दिलाने का मार्ग प्रदान करती है।
श्रीमद्भगवद्गीता में भी यही प्रमाण है कि जो परमात्मा की शरण में आते हैं, वे माया के बंधन से पार हो जाते हैं। संत रामपाल जी महाराज के अनुसार मनुष्य को शास्त्रसम्मत सतभक्ति अपनाकर अपने जीवन के परम उद्देश्य को समझना चाहिए। इससे सांसारिक जिम्मेदारियों को निभाते हुए आत्मिक कल्याण और मोक्ष की दिशा में आगे बढ़ने का मार्ग मिलता है। वर्तनमान मे शस्त्र अनुसार सत भक्ति केवल संत रामपाल जी महाराज जी के पास है उनसे नाम दीक्षा लेकर मोक्ष प्राप्त करना चाहिए। अधिक जानकारी के लिए गूगल प्ले स्टोर से Sant Rampal Ji Maharaj App डॉउनलोड करें।

