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Aravali Mining Trouble: कैसे नष्ट हो रही हैं प्रकृति और जैव विविधता

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Last updated: May 28, 2025 2:26 pm
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Aravali Mining Trouble: कैसे नष्ट हो रही हैं प्रकृति और जैव विविधता
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अरावली पर्वत माला भारत की सबसे पुरानी पर्वतमालाओं में से एक है, जो ना केवल भौगोलिक दृष्टि से, बल्कि पारिस्थितिक, जलवायु और जैव विविधता के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह पर्वत श्रृंखला राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली और गुजरात जैसे राज्यों के पारिस्थितिक संतुलन की रक्षा करती है। परंतु, आज यह श्रृंखला अवैध और बेतरतीब खनन की चपेट में आ चुकी है।

Contents
  • खनन से होने वाले मुख्य पर्यावरणीय नुकसान
    • 1. वनस्पति और जीव-जंतुओं का विनाश
    • 2. जल स्रोतों का क्षरण
      • 3. वायु प्रदूषण
      • 4. भूकंपीय अस्थिरता
      • 5. प्राकृतिक सौंदर्य और पर्यटन पर प्रभाव
  • जिम्मेदार कौन है?
      • 1. सरकारी लापरवाही
      • 2. खनन कंपनियां
      • 3. स्थानीय प्रशासन
      • 4. जनता की उदासीनता
  • प्राकृतिक असंतुलन के परिणाम
  • उपाय और समाधान
  • प्रकृति की रक्षा कौन कर सकता है?
  • FAQs

खनन से होने वाले मुख्य पर्यावरणीय नुकसान

1. वनस्पति और जीव-जंतुओं का विनाश

खनन से जंगलों का सफाया हो रहा है, जिससे जैव विविधता पर गहरा प्रभाव पड़ा है। कई पक्षी और जानवर जैसे चित्तीदार हिरण, नीलगाय, बघेरा, पेंटेड स्टॉर्क, स्लेटी जंगली मुर्गा आदि या तो विलुप्त हो चुके हैं या विलुप्तप्राय हैं।

2. जल स्रोतों का क्षरण

गहरे गड्ढों और विस्फोटों के कारण भूजल स्तर अत्यधिक नीचे चला गया है। जल संचयन की क्षमता घट गई है और जल संकट दिन-प्रतिदिन गहराता जा रहा है।

3. वायु प्रदूषण

खनन के दौरान उड़ती धूल, डीजल मशीनों से निकलती गैसें और विस्फोट से वायु में विषैले रसायन मिल रहे हैं, जिससे वह जहरीली हो रही है। इसका सीधा असर स्थानीय लोगों के स्वास्थ्य पर पड़ रहा है।

4. भूकंपीय अस्थिरता

भारी विस्फोट और भू-तल से लगातार खनन से अरावली क्षेत्र भूकंपीय रूप से अस्थिर हो गया है। छोटे झटकों की आवृत्ति बढ़ी है और भविष्य में बड़ी आपदाएं संभव हैं।

5. प्राकृतिक सौंदर्य और पर्यटन पर प्रभाव

अरावली का नैसर्गिक सौंदर्य खनन से नष्ट हो गया है, जिससे पर्यटन उद्योग और उससे जुड़े स्थानीय रोजगार पर गहरा प्रभाव पड़ा है।

जिम्मेदार कौन है?

1. सरकारी लापरवाही

नियमन की कमी, भ्रष्टाचार और लचर पर्यावरणीय मूल्यांकन प्रणाली ने अवैध खनन को बढ़ावा दिया है।

2. खनन कंपनियां

लाभ के लोभ में कंपनियां पर्यावरणीय नियमों को ताक पर रखकर अंधाधुंध खनन करती हैं।

3. स्थानीय प्रशासन

स्थानीय निकायों की निष्क्रियता और मिलीभगत से खनन माफिया फल-फूल रहा है।

4. जनता की उदासीनता

जन-जागरूकता की कमी और पर्यावरण के प्रति असंवेदनशीलता से जनभागीदारी कमजोर है।

प्राकृतिक असंतुलन के परिणाम

  • वर्षा में गिरावट: वनस्पति का विनाश और जल चक्र में असंतुलन से क्षेत्र में वर्षा अनियमित हो गई है।
  • सूखा और बाढ़ का खतरा: मिट्टी का क्षरण और जल संचयन की कमी से कभी बाढ़, तो कभी सूखा अब आम हो गया है।
  • मानव-वन्यजीव संघर्ष: जानवरों का आवास नष्ट होने से वे अब इंसानी बस्तियों की ओर रुख कर रहे हैं, जिससे हिंसक घटनाएं बढ़ रही हैं।

Also Read: अरावली पर्वतमाला का खनन और प्रकृति का विनाश

उपाय और समाधान

  • खनन पर पूर्ण प्रतिबंध: संवेदनशील क्षेत्रों में खनन पूरी तरह प्रतिबंधित किया जाए।
  • पुनर्वनीकरण अभियान: नष्ट हुए जंगलों में बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण हो।
  • जन-जागरूकता और शिक्षा: पर्यावरण संरक्षण की शिक्षा को स्कूलों और ग्राम स्तर पर पहुंचाया जाए।
  • संतुलित नीति निर्माण: संतुलित और पारदर्शी पर्यावरणीय नीतियां लागू हों।
  • आध्यात्मिक जागरूकता: जैसे संत रामपाल जी महाराज बताते हैं, प्रकृति केवल संसाधन नहीं, ईश्वर की रचना है—उसकी रक्षा करना हमारा धर्म है।

प्रकृति की रक्षा कौन कर सकता है?

जिसने इस सृष्टि की रचना की—वही इसका सच्चा रक्षक है। संत रामपाल जी महाराज बताते हैं कि “कबीर परमेश्वर” ही वह शक्ति हैं जो संतुलन बहाल कर सकते हैं। अधिक जानकारी के लिए देखें: www.jagatgururampalji.org

FAQs

Q1. अरावली खनन से क्या मुख्य नुकसान हो रहा है?

Ans: जैव विविधता नष्ट हो रही है, जल स्रोत सूख रहे हैं और पर्यावरण असंतुलन बढ़ रहा है।

Q2. किन प्रजातियों पर सबसे ज्यादा असर पड़ा है?

Ans: चीतल, नीलगाय, पेंटेड स्टॉर्क और गुलाबी सिर वाला बतख जैसे जीव विलुप्तप्राय हो चुके हैं।

Q3. जल संकट कैसे उत्पन्न हुआ?

Ans: खनन से भूगर्भीय जलस्तर नीचे चला गया है और वर्षा कम हो रही है।

Q4. इसका जिम्मेदार कौन है?

Ans: सरकार, खनन कंपनियां, स्थानीय निकाय और समाज सभी इसमें भागीदार हैं।

Q5. समाधान क्या हैं?

Ans: अवैध खनन पर रोक, पुनर्वनीकरण, नीति में पारदर्शिता और आध्यात्मिक जागरूकता।

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