UGC के 2026 इक्विटी नियमों को लेकर जारी विवाद के बीच केंद्र सरकार ने इनकी समीक्षा के लिए एक समिति गठित करने के संकेत दिए हैं। सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियमों पर रोक लगाए जाने के बाद सरकार के इस रुख से इनमें संशोधन की संभावना बढ़ गई है।अब सरकार के सामने ऐसी व्यवस्था तैयार करने की चुनौती है, जो जातिगत भेदभाव पर रोक लगाने के साथ-साथ सभी वर्गों के विद्यार्थियों को समान रूप से शिकायत दर्ज कराने का अधिकार दे सके।
मुख्य बिंदु:-
1. UGC के नए इक्विटी नियमों पर मचे घमासान के बीच सरकार का बड़ा कदम, समीक्षा के लिए बन सकती है समिति।
2. 13 जनवरी को लागू हुए UGC के नए नियमों पर विवाद गहराया, विनियमन 3(सी) बना टकराव की बड़ी वजह।
3. UGC इक्विटी नियमों पर सरकार के सामने दोहरी चुनौती, विरोध और मांगों के बीच संतुलन बनाने की तैयारी।
4. भेदभाव के खिलाफ सुरक्षा भी जरूरी और सभी को शिकायत का अधिकार भी, UGC नियमों पर बीच का रास्ता तलाश रही सरकार।
UGC इक्विटी नियमों की समीक्षा के लिए बन सकती है समिति
यूजीसी के 2026 इक्विटी रेगुलेशंस को लेकर जारी विवाद के बीच केंद्र सरकार ने इन नियमों की समीक्षा के लिए समिति गठित करने पर विचार करने की जानकारी सुप्रीम कोर्ट को दी है। गुरुवार को सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ को बताया कि सरकार ऐसी व्यवस्था पर विचार कर रही है, जिससे सभी छात्रों के हितों का ध्यान रखा जा सके और किसी भी वर्ग में असंतोष या आशंका की स्थिति न बने।
यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है, जब सुप्रीम कोर्ट जनवरी 2026 में ही इन नियमों पर अंतरिम रोक लगा चुका है। उस समय अदालत ने नियमों को प्रथम दृष्टया अस्पष्ट बताते हुए उनके दुरुपयोग की आशंका भी जताई थी।
13 जनवरी को अधिसूचित हुए थे नए नियम, विनियमन 3(सी) पर उठा था विवाद
यूजीसी (प्रमोशन ऑफ इक्विटी इन हायर एजुकेशन इंस्टिट्यूशंस) रेगुलेशंस, 2026 को 13 जनवरी को अधिसूचित किया गया था। इनका उद्देश्य उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव को रोकना था। इसके तहत संस्थानों में इक्वल अपॉर्चुनिटी सेंटर और इक्विटी कमेटी गठित करने का प्रावधान किया गया था। हालांकि, नियमों के विनियमन 3(सी) को लेकर विवाद खड़ा हो गया।
इसमें जाति आधारित भेदभाव की परिभाषा मुख्य रूप से अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के सदस्यों के खिलाफ होने वाले भेदभाव तक सीमित थी। याचिकाकर्ताओं ने दलील दी कि इस व्यवस्था के कारण सामान्य वर्ग के छात्र शिकायत निवारण तंत्र के दायरे से बाहर हो गए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने नियमों की भाषा को प्रथम दृष्टया अस्पष्ट बताते हुए आशंका जताई थी कि इनके व्यापक परिणाम हो सकते हैं और समाज में विभाजन की स्थिति पैदा हो सकती है। अदालत की अंतरिम रोक के बाद से वर्ष 2012 के पुराने नियम ही लागू हैं।
सरकार के सामने संतुलन बनाने की चुनौती, दोनों पक्षों की मांगों के बीच समिति का प्रस्ताव
गुरुवार को केंद्र सरकार की ओर से सुप्रीम कोर्ट में रखे गए रुख से संकेत मिलता है कि वह यूजीसी के नए नियमों को मौजूदा स्वरूप में बनाए रखने पर अड़ी नहीं है। अदालत के सामने यह कहना कि हर छात्र के हितों का ध्यान रखा जाना चाहिए और किसी भी वर्ग को असंतुष्ट महसूस नहीं होना चाहिए, नियमों में संभावित असंतुलन को लेकर सरकार की चिंता को दर्शाता है। साथ ही, इस पूरे मामले में उस पर कानूनी, सामाजिक और राजनीतिक दबाव भी दिखाई दे रहा है।
एक ओर दलित और ओबीसी संगठनों की मांग है कि जातिगत भेदभाव रोकने के लिए कड़े प्रावधान बने रहें, वहीं दूसरी ओर सामान्य वर्ग के छात्रों और संगठनों ने मौजूदा नियमों को एकतरफा बताते हुए उनके दुरुपयोग की आशंका जताई है। इस मुद्दे पर सड़कों पर विरोध प्रदर्शन और सोशल मीडिया पर बहस लगातार जारी रही है। ऐसे हालात में नियमों की समीक्षा के लिए समिति गठित करने का सरकार का प्रस्ताव दोनों पक्षों की चिंताओं के बीच संतुलन बनाने की कोशिश के रूप में देखा जा सकता है।
भेदभाव से सुरक्षा जरूरी, लेकिन शिकायत का अधिकार सभी छात्रों को मिले
उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव की समस्या को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। रोहित वेमुला और पायल तडवी से जुड़े मामलों ने कैंपस में जातिगत उत्पीड़न के गंभीर प्रभावों को सामने रखा है। ऐसे में छात्रों की सुरक्षा के लिए प्रभावी शिकायत निवारण व्यवस्था होना जरूरी है। हालांकि, यह व्यवस्था किसी एक वर्ग तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि सभी विद्यार्थियों को समान संरक्षण और शिकायत दर्ज कराने का अधिकार मिलना चाहिए। संविधान सभी नागरिकों को समान संरक्षण का अधिकार देता है।
ऐसे में यदि नियमों के तहत कुछ वर्गों को ही शिकायत का अधिकार मिलता है और अन्य इससे बाहर रह जाते हैं, तो व्यवस्था की निष्पक्षता पर सवाल उठ सकते हैं। इसके अलावा, नियमों में अस्पष्ट भाषा शिकायतों के संभावित दुरुपयोग, संस्थागत दबाव या राजनीतिक इस्तेमाल की आशंकाओं को भी जन्म दे सकती है। इसी संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट ने नियमों की भाषा स्पष्ट करने और आवश्यक संशोधन की जरूरत पर ध्यान दिलाया था।

