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Home » दिल्ली की ज़हरीली हवा का किडनी पर भी असर, 12 हजार से ज्यादा लोगों की रिसर्च में सामने आया चौंकाने वाला कनेक्शन

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दिल्ली की ज़हरीली हवा का किडनी पर भी असर, 12 हजार से ज्यादा लोगों की रिसर्च में सामने आया चौंकाने वाला कनेक्शन

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Last updated: September 28, 2026 3:05 pm
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दिल्ली की ज़हरीली हवा का किडनी पर भी असर
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दिल्ली में बढ़ते वायु प्रदूषण को आमतौर पर फेफड़ों, सांस और दिल से जुड़ी समस्याओं के लिए बड़ा खतरा माना जा रहा है। लेकिन अब सामने आई एक भारतीय रिसर्च ने प्रदूषण के एक और गंभीर पहलू पर  आकर्षित किया है। अध्ययन के अनुसार, लंबे समय तक हवा में मौजूद बेहद महीन प्रदूषक कण PM2.5 के संपर्क में रहने का संबंध किडनी की कार्यक्षमता में गिरावट से भी पाया गया है। खास बात यह है कि यह संबंध केवल बुजुर्ग या पहले से बीमार लोगों तक सीमित नहीं था। 

Contents
  • दिल्ली की ज़हरीली हवा का किडनी पर भी असर, से संबंधित मुख्य बिंदु:
  • दिल्ली और चेन्नई के 12,271 लोगों पर हुई स्टडी
  • दिल्ली में PM2.5 का स्तर चेन्नई से काफी अधिक मिला
  • PM2.5 बढ़ने के साथ eGFR में गिरावट देखी गई
  • डायबिटीज़ और हाई ब्लड प्रेशर को भी ध्यान में रखा गया
  • सिर्फ फेफड़ों तक सीमित नहीं है PM2.5 का खतरा
  • दिल्ली वालों के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह रिसर्च?
  • दिल्ली के वायु प्रदूषण और किडनी पर असर से जुड़े मुख्य FAQs

दिल्ली की ज़हरीली हवा का किडनी पर भी असर, से संबंधित मुख्य बिंदु:

1. लंबे समय तक PM2.5 का संपर्क किडनी की कार्यक्षमता में गिरावट से जुड़ा पाया गया है।

2. दिल्ली और चेन्नई के 12,271 वयस्कों पर किए गए अध्ययन में वायु प्रदूषण और किडनी फंक्शन के बीच संबंध सामने आया।

3. अध्ययन के दौरान दिल्ली में PM2.5 का वार्षिक औसत स्तर चेन्नई की तुलना में काफी अधिक दर्ज किया गया।

4. PM2.5 में हर 5 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर की वृद्धि के साथ eGFR में गिरावट का संबंध पाया गया।

5. डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर जैसे किडनी से जुड़े अन्य जोखिम कारकों को ध्यान में रखने के बाद भी यह संबंध देखा गया।

6. रिसर्च के अनुसार वायु प्रदूषण के स्वास्थ्य प्रभाव केवल फेफड़ों और हृदय तक सीमित नहीं हैं, बल्कि किडनी पर इसके संभावित प्रभावों को भी समझना जरूरी है।

यह भी पढ़ें  : गुर्दे की सूजन (नेफ्राइटिस): चिकित्सीय कारण, लक्षण, नैदानिक परीक्षण और उपचार

दिल्ली और चेन्नई के 12,271 लोगों पर हुई स्टडी

यह अध्ययन Kidney International Reports में प्रकाशित हुआ है। इसमें दिल्ली और चेन्नई के कुल 12,271 वयस्कों को शामिल किया गया। शोधकर्ताओं ने 2010 से 2016 के दौरान प्रतिभागियों की किडनी की कार्यक्षमता और उनके आसपास के वातावरण में मौजूद PM2.5 के स्तर का अध्ययन किया। प्रतिभागियों की उम्र 20 वर्ष या उससे अधिक थी। 

शोधकर्ताओं ने लोगों के घर के आसपास PM2.5 के वार्षिक औसत एक्सपोजर का अनुमान लगाने के लिए उच्च-रिजॉल्यूशन वाले वायु प्रदूषण मॉडल का इस्तेमाल किया। इसके साथ ही किडनी की फिल्ट्रेशन क्षमता को eGFR यानी estimated glomerular filtration rate के ज़रिए मापा गया। यह एक महत्वपूर्ण पैमाना है, जिससे पता लगाया जाता है कि किडनी खून को कितनी प्रभावी तरीके से फिल्टर कर रही है। 

दिल्ली में PM2.5 का स्तर चेन्नई से काफी अधिक मिला

रिसर्च में दोनों शहरों के प्रदूषण स्तर में बड़ा अंतर दिखाई दिया। अध्ययन की शुरुआत में चेन्नई में वार्षिक औसत PM2.5 करीब 33 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर था, जबकि दिल्ली में यह 118 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर दर्ज किया गया। बाद के आकलनों में चेन्नई का स्तर 37 और 30 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर रहा, जबकि दिल्ली में यह 123 और 130 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर तक पहुंचा। 

इससे अध्ययन में शामिल दोनों शहरों के बीच लंबे समय तक प्रदूषण के संपर्क में रहने का स्पष्ट अंतर दिखाई देता है। हालांकि, शोध का उद्देश्य केवल दोनों शहरों की तुलना करना नहीं था, बल्कि PM2.5 के संपर्क और किडनी की कार्यक्षमता में समय के साथ होने वाले बदलाव के बीच संबंध को समझना था।

PM2.5 बढ़ने के साथ eGFR में गिरावट देखी गई

रिसर्च के सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्षों में से एक यह था कि वार्षिक औसत PM2.5 में प्रत्येक 5 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर की वृद्धि के साथ eGFR में गिरावट का संबंध पाया गया।

दिल्ली में यह गिरावट 0.42 ml/min/1.73 m² और चेन्नई में 0.32 ml/min/1.73 m² थी। शोधकर्ताओं ने दोनों शहरों के आंकड़ों में यह संबंध सांख्यिकीय रूप से महत्वपूर्ण पाया। 

सरल भाषा में समझें तो लंबे समय तक PM2.5 का ज्यादा संपर्क किडनी की खून को फिल्टर करने वाली क्षमता में धीरे-धीरे कमी से जुड़ा पाया गया।

डायबिटीज़ और हाई ब्लड प्रेशर को भी ध्यान में रखा गया

किडनी की खराब कार्यक्षमता के पीछे केवल प्रदूषण ही ज़िम्मेदार नहीं होता। डायबिटीज़ और हाई ब्लड प्रेशर जैसी बीमारियां भी किडनी को नुकसान पहुंचा सकती हैं। इसलिए अध्ययन में इन जैसे जोखिम कारकों को भी ध्यान में रखा गया।

इसके बावजूद PM2.5 एक्सपोजर और eGFR में गिरावट के बीच संबंध बना रहा। यही वजह है कि शोधकर्ताओं ने लंबे समय तक वायु प्रदूषण के संपर्क को किडनी की सेहत के लिए महत्वपूर्ण पर्यावरणीय जोखिम के तौर पर आगे अध्ययन करने की ज़रूरत बताई है। 

सिर्फ फेफड़ों तक सीमित नहीं है PM2.5 का खतरा

PM2.5 ऐसे बेहद छोटे कण होते हैं, जो सांस के साथ शरीर में प्रवेश कर सकते हैं। वायु प्रदूषण पर होने वाली चर्चाओं में इनका संबंध आमतौर पर सांस की बीमारी और हृदय संबंधी समस्याओं से जोड़ा जाता रहा है। नई भारतीय स्टडी ने इसी प्रदूषण के किडनी फंक्शन से संबंध पर भी ध्यान केंद्रित किया है। 

हालांकि, इस अध्ययन से यह साबित नहीं होता कि हर व्यक्ति में प्रदूषण के कारण किडनी की बीमारी ज़रूर विकसित होगी। रिसर्च में मुख्य रूप से लंबे समय तक PM2.5 एक्सपोजर और eGFR में बदलाव के बीच संबंध पाया गया है। शोधकर्ताओं ने भी किडनी और हृदय पर लंबे समय तक प्रदूषण के प्रभावों को समझने के लिए आगे और अध्ययन की आवश्यकता बताई है। 

दिल्ली वालों के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह रिसर्च?

दिल्ली में अध्ययन के दौरान PM2.5 का वार्षिक औसत स्तर चेन्नई की तुलना में काफी अधिक था। ऐसे में लंबे समय तक दिल्ली जैसे प्रदूषित शहरी वातावरण में रहने वाले लोगों के लिए यह रिसर्च वायु प्रदूषण के स्वास्थ्य प्रभावों को केवल सांस संबंधी समस्याओं तक सीमित करके न देखने की ओर इशारा करती है। 

रिपोर्टों के अनुसार, विशेषज्ञों ने भी प्रदूषण को नियंत्रित करने के साथ-साथ व्यक्तिगत स्तर पर प्रदूषण से बचाव के उपायों पर ध्यान देने की जरूरत बताई है। हालांकि, किसी व्यक्ति की किडनी की स्थिति का आकलन केवल उसके शहर या प्रदूषण के स्तर से नहीं किया जा सकता और इसके लिए चिकित्सकीय जांच जरूरी होती है। 

इस अध्ययन ने वायु प्रदूषण और स्वास्थ्य के बीच संबंध को एक और दिशा में देखने का आधार दिया है। फेफड़ों और हृदय के साथ अब किडनी की कार्यक्षमता पर भी लंबे समय तक PM2.5 के संपर्क के संभावित प्रभावों पर शोध बढ़ रहा है। दिल्ली और चेन्नई के वयस्कों पर किए गए इस अध्ययन में प्रदूषण के बढ़ते स्तर के साथ eGFR में गिरावट का संबंध सामने आया, जिससे पर्यावरण और किडनी स्वास्थ्य के बीच संबंध को लेकर आगे शोध की जरूरत स्पष्ट होती है। 

 यह भी पढ़ें  : Medical Milestone: Patient With Rare Motor Neuron Disease Shows Marked Improvement Following Novel RNA Therapy

दिल्ली के वायु प्रदूषण और किडनी पर असर से जुड़े मुख्य FAQs

1. क्या दिल्ली का वायु प्रदूषण किडनी को नुकसान पहुंचा सकता है?

लंबे समय तक वायु प्रदूषण के संपर्क में रहने का संबंध किडनी की कार्यक्षमता में कमी से पाया गया है। एक भारतीय अध्ययन में PM2.5 प्रदूषण और किडनी की फिल्ट्रेशन क्षमता में गिरावट के बीच संबंध सामने आया। हालांकि, इससे यह साबित नहीं होता कि प्रदूषण हर व्यक्ति में किडनी की बीमारी का कारण बनेगा।

 2. PM2.5 क्या है और यह किडनी को कैसे प्रभावित करता है?

PM2.5 हवा में मौजूद बेहद छोटे प्रदूषक कण होते हैं, जिनका व्यास 2.5 माइक्रोमीटर या उससे कम होता है। ये सांस के जरिए शरीर में प्रवेश कर सकते हैं। इनके संपर्क से शरीर में सूजन और ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस जैसी प्रक्रियाएं प्रभावित हो सकती हैं, जो किडनी के स्वास्थ्य पर असर डालने वाले संभावित तंत्र माने जाते हैं।

3. दिल्ली और चेन्नई के लोगों पर हुई रिसर्च में क्या सामने आया?

दिल्ली और चेन्नई के 12,271 वयस्कों पर किए गए अध्ययन में लंबे समय तक PM2.5 के संपर्क और eGFR में गिरावट के बीच संबंध पाया गया। eGFR किडनी की खून को फिल्टर करने की क्षमता का एक महत्वपूर्ण माप है। अध्ययन में दिल्ली में PM2.5 का औसत स्तर चेन्नई की तुलना में अधिक था।

4 क्या वायु प्रदूषण से किडनी फेल हो सकती है?

वायु प्रदूषण और किडनी की कार्यक्षमता में कमी के बीच संबंध पाया गया है, लेकिन उपलब्ध इस अध्ययन से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि प्रदूषण सीधे किडनी फेल होने का कारण बनता है। किडनी फेलियर के पीछे डायबिटीज़, हाई ब्लड प्रेशर और अन्य कारण भी हो सकते हैं। इस विषय पर और शोध की ज़रूरत है।

5. दिल्ली में रहने वाले लोग प्रदूषण से अपनी किडनी को कैसे बचा सकते हैं?

प्रदूषण से बचाव के लिए AQI की जानकारी लेते रहें, प्रदूषण अधिक होने पर बाहर की गतिविधियां कम करें और जरूरत पड़ने पर अच्छी गुणवत्ता वाला, सही तरीके से फिट होने वाला मास्क इस्तेमाल करें। पर्याप्त पानी पिएं, धूम्रपान से बचें और डायबिटीज़ या हाई ब्लड प्रेशर होने पर नियमित जांच कराएं। किडनी से जुड़ी परेशानी या जोखिम होने पर डॉक्टर की सलाह लेना जरूरी है।

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GST पूरे UPI भुगतान की राशि पर नहीं लगेगा, बल्कि जहां MDR लागू होगा, वहां केवल MDR शुल्क पर 18% GST लगेगा। 5. GST-पंजीकृत पात्र व्यापारी MDR पर चुकाए गए GST का इनपुट टैक्स क्रेडिट ले सकते हैं, जिससे उनकी GST देनदारी में इसका समायोजन किया जा सकता है। 6. Person-to-Person यानी एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति को किए जाने वाले UPI भुगतान पर MDR लागू नहीं होगा, इसलिए ऐसे व्यक्तिगत UPI ट्रांसफर पहले की तरह शुल्क मुक्त रहेंगे। ₹2,000 तक के UPI भुगतान में नहीं लगेगा MDR नए नियम के अनुसार ₹2,000 तक के P2M UPI भुगतान पर MDR शून्य रहेगा। इसका सीधा मतलब है कि इस सीमा तक होने वाले मर्चेंट भुगतान पर MDR नहीं लगेगा और इसलिए MDR से जुड़ा GST भी नहीं बनेगा। सरकारी आंकड़ों के अनुसार UPI के मर्चेंट लेनदेन की मात्रा में 96 प्रतिशत से अधिक भुगतान ₹2,000 तक के हैं। इसलिए बड़ी संख्या में रोज़मर्रा के छोटे डिजिटल भुगतान इस व्यवस्था से बाहर रहेंगे। ₹1 लाख तक UPI प्राप्त करने वाले छोटे व्यापारी भी दायरे से बाहर NPCI ने छोटे व्यापारियों के लिए अलग सुरक्षा व्यवस्था भी बताई है। UPI QR के जरिए अपने बैंक खाते में हर महीने ₹1 लाख तक भुगतान प्राप्त करने वाले पात्र छोटे व्यापारियों पर MDR नहीं लगेगा। खास बात यह है कि ऐसे व्यापारी किसी एक लेनदेन में ₹2,000 से अधिक प्राप्त करें, तब भी निर्धारित शर्तों के अंतर्गत उन्हें MDR से छूट मिलेगी। इसका उद्देश्य छोटे दुकानदारों, स्थानीय कारोबारियों और स्ट्रीट वेंडर्स को अतिरिक्त भुगतान लागत से बचाना है। GST पूरे UPI भुगतान पर नहीं, सिर्फ MDR पर लगेगा MDR को लेकर सबसे बड़ी गलतफहमी यह है कि ₹2,000 से अधिक के UPI भुगतान की पूरी रकम पर 18 प्रतिशत GST लगेगा। NPCI के स्पष्टीकरण के अनुसार ऐसा नहीं है। GST UPI से भेजी गई पूरी रकम पर नहीं, बल्कि लागू होने वाले MDR यानी भुगतान सेवा शुल्क पर लगेगा। उदाहरण के तौर पर ₹10,000 के पात्र मर्चेंट भुगतान पर 0.4 प्रतिशत MDR के हिसाब से शुल्क ₹40 होगा। 18 प्रतिशत GST इसी ₹40 के सेवा शुल्क पर लगेगा, न कि पूरे ₹10,000 पर। ₹2,000 से ऊपर के चुनिंदा भुगतान पर 0.4 प्रतिशत MDR 15 अक्टूबर से निर्धारित पात्र P2M लेनदेन में ₹2,000 से अधिक के भुगतान पर 0.4 प्रतिशत MDR लागू होगा। हालांकि प्रति लेनदेन MDR की अधिकतम सीमा ₹300 रखी गई है। इसका मतलब है कि बड़े भुगतान में भी MDR अनिश्चित रूप से नहीं बढ़ेगा। कुछ आवश्यक और कम मार्जिन वाले क्षेत्रों के लिए अलग रियायती व्यवस्था रखी गई है, जिसमें रेलवे, टेलीकॉम, बीमा और ईंधन जैसी श्रेणियों में ₹2,000 से अधिक के पात्र भुगतान पर ₹5 का फ्लैट MDR निर्धारित किया गया है। GST-पंजीकृत व्यापारियों को इनपुट टैक्स क्रेडिट का लाभ NPCI की सफाई में एक और महत्वपूर्ण बात सामने आई है। जो व्यापारी GST के तहत पंजीकृत हैं और पात्रता पूरी करते हैं, वे MDR पर चुकाए गए GST का इनपुट टैक्स क्रेडिट ले सकते हैं। इसे उनकी बिक्री पर बनने वाली आउटपुट GST देनदारी के विरुद्ध समायोजित किया जा सकता है। हालांकि इनपुट टैक्स क्रेडिट का वास्तविक लाभ व्यापारी की GST स्थिति और उसके कारोबार की प्रकृति पर निर्भर करेगा। इसलिए हर व्यापारी के लिए इसका प्रभाव एक जैसा नहीं होगा। आम ग्राहक से MDR वसूलने की अनुमति नहीं MDR का ढांचा व्यापारी भुगतान के पीछे काम करने वाले पेमेंट इकोसिस्टम से जुड़ा है। सरकार के अनुसार यह ग्राहक से UPI भुगतान करने के लिए अलग से वसूला जाने वाला शुल्क नहीं है। बैंकों को यह सुनिश्चित करने के लिए कहा गया है कि व्यापारी MDR का बोझ ग्राहक पर न डालें। साथ ही UPI ऐप प्रदाताओं को भी छिपे हुए प्लेटफॉर्म शुल्क लगाने से रोकने की व्यवस्था बताई गई है। Person-to-Person UPI पहले की तरह मुफ्त रहेगा नए MDR ढांचे का असर Person-to-Person यानी P2P UPI ट्रांसफर पर नहीं पड़ेगा। दो व्यक्तियों के बीच पैसे भेजने या प्राप्त करने वाले UPI लेनदेन किसी भी राशि के हों, वे MDR के दायरे में नहीं आएंगे। यानी किसी व्यक्ति द्वारा दूसरे व्यक्ति को UPI से पैसे भेजने पर इस नए मर्चेंट शुल्क की व्यवस्था लागू नहीं होगी। NPCI ने छोटे कारोबारियों पर अतिरिक्त दबाव की आशंका को बताया गलत MDR पर GST को लेकर सामने आई चिंताओं पर NPCI ने कहा है कि छोटे व्यापारियों पर व्यापक अतिरिक्त बोझ पड़ने की आशंका सही नहीं है। इसका आधार यह है कि ₹2,000 तक के अधिकांश मर्चेंट भुगतान MDR से बाहर हैं और ₹1 लाख तक की मासिक UPI प्राप्ति वाले पात्र छोटे व्यापारी भी MDR छूट में आते हैं। इसके अलावा पात्र GST-पंजीकृत व्यापारी MDR पर दिए गए GST का इनपुट टैक्स क्रेडिट ले सकते हैं। नए नियम का मकसद UPI व्यवस्था को लंबे समय तक चलाने की तैयारी सरकार ने नए MDR ढांचे को UPI के डिजिटल पेमेंट इकोसिस्टम की दीर्घकालिक स्थिरता से जोड़ा है। सरकार के अनुसार MDR से प्राप्त राशि पेमेंट इकोसिस्टम में शामिल बैंकों, पेमेंट सर्विस प्रोवाइडर्स और UPI ऐप प्रदाताओं के बीच वितरित होगी। साथ ही MDR संग्रह का 5 प्रतिशत हिस्सा छोटे व्यापारियों और UPI के विस्तार से जुड़े फंड में देने का प्रावधान भी बताया गया है। कुल मिलाकर, 15 अक्टूबर 2026 से लागू होने वाला बदलाव हर UPI भुगतान पर शुल्क लगाने की व्यवस्था नहीं है। ₹2,000 तक के P2M भुगतान, पात्र छोटे व्यापारियों के भुगतान और सभी P2P लेनदेन MDR से बाहर रहेंगे। ₹2,000 से अधिक के पात्र मर्चेंट भुगतान पर MDR लागू होगा, लेकिन GST पूरे UPI भुगतान पर नहीं बल्कि MDR सेवा शुल्क पर लगेगा। इसी आधार पर NPCI ने छोटे व्यापारियों पर व्यापक अतिरिक्त GST बोझ की आशंका को गलत बताया है। UPI MDR पर GST को लेकर NPCI की सफाई से संबंधित मुख्य FAQs 1. क्या UPI से पेमेंट करने पर अब 18% GST लगेगा? नहीं। 18% GST पूरे UPI भुगतान की राशि पर नहीं लगेगा। जहां MDR लागू होगा, वहां GST केवल MDR शुल्क पर लगेगा। 2. क्या ₹2,000 तक के UPI भुगतान पर MDR लगेगा? अधिकतर पात्र ₹2,000 तक के मर्चेंट UPI भुगतान MDR से बाहर रहेंगे। इसलिए इन लेनदेन पर MDR से जुड़ा GST भी नहीं लगेगा। 3. छोटे दुकानदारों के लिए UPI MDR का नया नियम क्या है? ₹1 लाख तक मासिक UPI प्राप्त करने वाले पात्र छोटे व्यापारियों को MDR से छूट दी जाएगी। इसका उद्देश्य छोटे कारोबारियों पर अतिरिक्त भुगतान लागत का बोझ कम रखना है। 4. ₹2,000 से ज़्यादा UPI पेमेंट करने पर कितना MDR लगेगा? निर्धारित पात्र P2M लेनदेन में ₹2,000 से अधिक के भुगतान पर 0.4% MDR लागू होगा। प्रति लेनदेन MDR की अधिकतम सीमा ₹300 रखी गई है। 5. क्या UPI से पैसे भेजने वाले ग्राहक को MDR देना होगा? MDR व्यापारी भुगतान से जुड़ा शुल्क है। इसे ग्राहक से अलग से वसूलने की अनुमति नहीं है। 6. क्या एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति को UPI भेजने पर MDR लगेगा? नहीं। Person-to-Person यानी P2P UPI लेनदेन नए MDR ढांचे के दायरे में नहीं आते। UPI MDR पर GST को लेकर NPCI की सफाई, छोटे दुकानदारों को राहत; जानिए 15 अक्टूबर से क्या बदलेगा
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