आज के आधुनिक दौर में जहां हम महिला सशक्तिकरण की बड़ी-बड़ी बातें करते हैं, वहीं दहेज प्रथा जैसी बुराई आज भी हमारे समाज को अंदर से खोखला कर रही है। शादी के नाम पर होने वाला यह सौदा किसी उपहार या परंपरा का हिस्सा नहीं, बल्कि एक मासूम बेटी की जिंदगी का कत्ल करने वाला हथियार बन चुका है। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़े बताते हैं कि आज भी भारत में हर साल हजारों बेटियां दहेज की भेंट चढ़ जाती हैं।
हालिया दिल दहलाने वाले मामले
पिछले कुछ समय में सामने आए तीन बड़े मामलों ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है, जो यह साबित करते हैं कि पढ़ी-लिखी और आत्मनिर्भर लड़की भी इस लालच से सुरक्षित नहीं है:
1. ट्विशा शर्मा केस (भोपाल, मई 2026): एक बड़ी कॉर्पोरेट कंपनी में काम करने वाली 33 साल की ट्विशा शर्मा की संदिग्ध हालत में मौत ने सभी को हैरान कर दिया। उनके परिवार का आरोप है कि उनके रसूखदार ससुराल वाले लगातार दहेज के लिए उन्हें प्रताड़ित कर रहे थे। ट्विशा का अपने भाई को भेजा आखिरी संदेश आई एम ट्रैप्ड ब्रो (मैं फंस गई हूं भाई) आज भी हर बेटी के दर्द को बयान करता है।
2. दीपिका नागर केस (ग्रेटर नोएडा, मई 2026): 25 साल की दीपिका नागर की मौत भी दहेज की बेरहमी का नया उदाहरण है। शादी के बाद से ही उन्हें लगातार दबावों और मानसिक प्रताड़ना का सामना करना पड़ रहा था, जिसका अंत उनकी मौत के रूप में हुआ। शादी में 1 करोड़ का खर्च और 50 लाख रुपए नगद दिए गए, उसके बाद भी लालची लोगों का मन नहीं भरा और दीपिका भी दहेज की वेदी पर बलि चढ़ गई।

3. पलक केस(ग्वालियर, मई 2026): पलक के मामले ने भी सोशल मीडिया पर काफी सुर्खियां बटोरीं, जहां एक हंसते-खेलते परिवार की बेटी को शादी के तुरंत बाद से ही गाड़ी, नकदी और महंगे तोहफों के लिए इस कदर परेशान किया गया कि उनकी जिंदगी तबाह हो गई। जिस बेटी ने शादी के बाद सपने संजोए होंगे, वह एक साल के भीतर ही दहेज रूपी दानव का शिकार हो गई।
माता-पिता की गलतियां और उनकी भूमिका
इस प्रथा को बढ़ावा देने में कहीं ना कहीं लड़का और लड़की दोनों के माता-पिता की गलतियां भी सामने आती हैं:
ससुराल वालों के माता-पिता अपने पढ़े-लिखे बेटे को एक बाजार की वस्तु की तरह देखते हैं और शादी के खर्चे या परिवार की संपत्ति बढ़ाने के लिए दहेज की मांग करते हैं। वहीं लड़की के माता-पिता समाज में अपनी झूठी शान दिखाने के लिए शादियों में पानी की तरह पैसा बहाते हैं और महंगे तोहफे देते हैं, जिससे इस प्रथा को बढ़ावा मिलता है।
सबसे बड़ी गलती तब होती है जब बेटी ससुराल में हो रहे अत्याचार या दहेज की मांग के खिलाफ आवाज उठाती है, तो अक्सर माता-पिता उसे समझौता करने और थोड़ा एडजस्ट करने की सलाह देते हैं। समाज के डर से बेटी को वापस ससुराल भेजना उसे मौत के कुएं में धकेलने जैसा है। माता-पिता बेटी को ‘पराया धन’ कहकर अनजाने में ही दहेज की नींव रखते हैं।
यह विरोधाभास बेहद पीड़ादायक है, शादी से पहले बेटी को शिक्षित और स्वतंत्र बताया जाता है, लेकिन शादी के बाद उससे अपेक्षा की जाती है कि वो मायके से धन-दौलत लाकर अपनी ‘कीमत’ साबित करे।
दहेज के खिलाफ कानूनी प्रावधान
भारतीय कानून में दहेज लेने और देने दोनों को अपराध माना गया है। नए भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस), 2023 के तहत इसके खिलाफ कड़े कानून हैं:
बीएनएस की धारा 80 के अनुसार, शादी के 7 साल के अंदर अगर किसी महिला की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत होती है और यह पाया जाता है कि उसे दहेज के लिए परेशान किया जा रहा था, तो इसे दहेज हत्या माना जाता है और दोषियों को कड़ी सजा मिलती है। वहीं धारा 85 पति या उसके रिश्तेदारों द्वारा महिला के साथ की जाने वाली किसी भी तरह के अत्याचार और हिंसा को दंडित करती है। इसके अलावा दहेज निषेध अधिनियम, 1961 देश में दहेज के लेनदेन को पूरी तरह प्रतिबंधित करता है।
इसका निपटारा कैसे होगा?
इस बीमारी को जड़ से खत्म करने के लिए सामाजिक और मानसिक बदलाव की जरूरत है। शादियों को बिल्कुल सादगी से किया जाना चाहिए, जहां ना कोई लेनदेन हो और ना ही फिजूलखर्ची। माता-पिता को अपनी बेटियों को सिर्फ पढ़ाना ही नहीं, बल्कि उन्हें इतना मजबूत बनाना होगा कि अगर उन पर अत्याचार हो, तो उनका पीहर उनके साथ ढाल बनकर खड़ा रहे, ना कि उन्हें दोबारा उसी जहन्नुम में भेजे।
आध्यात्मिक समाधान: संत रामपाल जी महाराज का ज्ञान
इस सामाजिक बुराई का एक मूल और सटीक समाधान आध्यात्मिकता में छिपा है। संत रामपाल जी महाराज बताते हैं कि दहेज और हिंसा जैसी बुराई इंसान के अंदर बैठे लालच और सच्चे ज्ञान के अभाव के कारण है। जो व्यक्ति दहेज लेता है, अगले जन्म में उसे कई गुना कर्ज़ चुकाना पड़ता है।
संत रामपाल जी महाराज ने इसका एक व्यावहारिक समाधान दिया है। उनके संयोजित समाज में हजारों शादियां बिना किसी दहेज, बिना किसी दिखावे और बिना किसी फिजूलखर्ची के होती हैं। इन शादियों को रमैनी कहा जाता है, जो मात्र 17 मिनट में पूरी सादगी से संपन्न हो जाती हैं। उनके अनुसार, पूर्ण परमात्मा कबीर साहेब की सच्ची भक्ति करने से व्यक्ति के अंदर के विकार और लालच खत्म हो जाते हैं। जब समाज इस सच्चे आध्यात्मिक ज्ञान को अपनाएगा, तभी एक सुरक्षित, निष्पक्ष और दहेज-मुक्त समाज का निर्माण संभव है।

