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Home » धरती की धड़कन तेज होने से इंसान परेशान? क्या आपके कान में भी बज रही है रहस्यमयी घंटी?

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धरती की धड़कन तेज होने से इंसान परेशान? क्या आपके कान में भी बज रही है रहस्यमयी घंटी?

SA News
Last updated: February 23, 2026 11:48 am
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धरती की धड़कन तेज Schumann Resonance Spike का सच क्या है
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डिजिटल युग में सूचनाएँ जितनी तेजी से फैलती हैं, उतनी ही तेजी से भ्रम भी फैलता है। हाल के दिनों में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स, वीडियो चैनलों और कई ब्लॉग वेबसाइटों पर यह दावा वायरल हुआ कि पृथ्वी की प्राकृतिक आवृत्ति—जिसे Schumann Resonance कहा जाता है—अचानक बढ़ गई है। कुछ पोस्टों में इसे “धरती की धड़कन तेज होना” बताया गया और यह भी दावा किया गया कि इसी कारण लोगों को कानों में घंटी या रहस्यमयी ध्वनि सुनाई दे रही है।

Contents
  • Schumann Resonance क्या है?
  • क्या पृथ्वी की फ्रीक्वेंसी सच में बढ़ रही है?
  • कानों में घंटी बजने का वास्तविक कारण
  • सोशल मीडिया बनाम वैज्ञानिक सत्य
  • आध्यात्मिक दृष्टिकोण: वास्तविक धुन क्या है?
  • निष्कर्ष

लेकिन क्या यह वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित तथ्य है? क्या सचमुच पृथ्वी की फ्रीक्वेंसी बदल रही है? और यदि लोगों को ध्वनि सुनाई देती है, तो उसका वास्तविक कारण क्या है? इस लेख में हम इस विषय को वैज्ञानिक, तार्किक और आध्यात्मिक तीनों दृष्टियों से समझने का प्रयास करेंगे।

Schumann Resonance क्या है?

Schumann Resonance पृथ्वी और उसके आयनमंडल (ionosphere) के बीच बनने वाली प्राकृतिक विद्युत-चुंबकीय तरंगों का समूह है। जब बिजली (lightning) पृथ्वी पर गिरती है, तो वह अत्यंत निम्न आवृत्ति (Extremely Low Frequency – ELF) की तरंगें उत्पन्न करती है। ये तरंगें पृथ्वी और आयनमंडल के बीच गूंजती रहती हैं।

इसकी मूल या आधार आवृत्ति लगभग 7.83 हर्ट्ज (Hz) मानी जाती है। यही कारण है कि इसे कभी-कभी पृथ्वी की “प्राकृतिक धड़कन” भी कहा जाता है। हालांकि “धड़कन” शब्द एक रूपक है, कोई जैविक वास्तविकता नहीं।

महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि Schumann Resonance दशकों से मापी जा रही एक स्थिर भौतिक घटना है। यह अचानक उत्पन्न हुई नई प्रक्रिया नहीं है।

क्या पृथ्वी की फ्रीक्वेंसी सच में बढ़ रही है?

सोशल मीडिया पर अक्सर ऐसे ग्राफ साझा किए जाते हैं जिनमें ऊँचे-ऊँचे स्पाइक्स दिखाई देते हैं। इन स्पाइक्स को देखकर कुछ लोग यह निष्कर्ष निकाल लेते हैं कि पृथ्वी की फ्रीक्वेंसी तेजी से बढ़ रही है।

वास्तविकता यह है:

  • Schumann Resonance की आधार आवृत्ति 7.83 Hz स्थिर रहती है।
  • ग्राफ में दिखने वाले स्पाइक्स अस्थायी ऊर्जा उतार-चढ़ाव होते हैं।
  • ये सौर गतिविधि, बिजली गिरने की अधिकता, या आयनमंडल में परिवर्तन के कारण हो सकते हैं।

NASA सहित अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक संस्थानों ने पृथ्वी की आधार आवृत्ति में किसी स्थायी वृद्धि की पुष्टि नहीं की है। उपलब्ध डेटा यह नहीं दर्शाता कि पृथ्वी की “धड़कन” तेज हो गई है।

इसलिए “धरती की फ्रीक्वेंसी बढ़ गई” का दावा वैज्ञानिक रूप से सिद्ध नहीं है। यह अधिकतर गलत व्याख्या या आधा-अधूरा ज्ञान प्रतीत होता है।

कानों में घंटी बजने का वास्तविक कारण

अब उस दूसरे दावे पर आते हैं—लोगों को कानों में रहस्यमयी आवाज या घंटी सुनाई देना।

चिकित्सा विज्ञान इस स्थिति को प्रायः Tinnitus कहता है। टिनिटस में व्यक्ति को बिना बाहरी स्रोत के कानों में सीटी, भनभनाहट या घंटी जैसी ध्वनि सुनाई देती है।

इसके सामान्य कारण हैं:

  • कान में मैल (earwax) जमा होना
  • तेज ध्वनि के संपर्क में रहना
  • मानसिक तनाव और चिंता
  • उच्च रक्तचाप
  • उम्र संबंधी परिवर्तन
  • कुछ दवाओं के दुष्प्रभाव

चिकित्सकों के अनुसार, अधिकांश मामलों में यह एक व्यक्तिगत स्वास्थ्य समस्या होती है, न कि बाहरी कॉस्मिक या ग्रह-स्तरीय घटना का परिणाम।

यदि किसी व्यक्ति को लगातार कानों में आवाज सुनाई दे रही है, तो उसे ईएनटी (ENT) विशेषज्ञ से परामर्श लेना चाहिए।

सोशल मीडिया बनाम वैज्ञानिक सत्य

आज के समय में सूचना की विश्वसनीयता सबसे बड़ी चुनौती है। कई बार आध्यात्मिकता, विज्ञान और रहस्यवाद को मिलाकर सनसनीखेज कथाएँ बना दी जाती हैं।

“पृथ्वी की धड़कन तेज हो गई”, “मानव चेतना बदल रही है”, “कॉस्मिक अपग्रेड हो रहा है”—ऐसे वाक्य आकर्षक जरूर हैं, परंतु इनका वैज्ञानिक आधार स्पष्ट नहीं है।

विज्ञान प्रमाण और पुनरावृत्ति (reproducibility) पर आधारित होता है। जब तक कोई स्थायी, मापने योग्य और सत्यापित परिवर्तन दर्ज न हो, तब तक उसे तथ्य नहीं माना जा सकता।

आध्यात्मिक दृष्टिकोण: वास्तविक धुन क्या है?

आध्यात्मिक दृष्टि से ध्वनि या “नाद” की अवधारणा नई नहीं है। जगतगुरु तत्वदर्शी संत Sant Rampal Ji Maharaj के अनुसार, यह भौतिक ब्रह्मांड काललोक का हिस्सा है और यहाँ की ध्वनियाँ मायिक हैं।

संत रामपाल जी महाराज बताते हैं कि वास्तविक दिव्य धुन, जिसे “अनहद नाद” कहा जाता है, बाहरी उपकरणों या पृथ्वी की फ्रीक्वेंसी से संबंधित नहीं है। वह आंतरिक आध्यात्मिक साधना का अनुभव है, जो शास्त्रसम्मत भक्ति और पूर्ण गुरु से नाम दीक्षा लेने के पश्चात प्राप्त होता है।

उनके अनुसार:

  • काललोक में जीव जन्म-मरण के चक्र में बंधा है।
  • सतलोक परम शांति और अमरता का धाम है।
  • सही साधना से साधक को आंतरिक शांति और दिव्य अनुभव प्राप्त होता है।

अर्थात, कानों में सुनाई देने वाली सामान्य ध्वनि को दिव्य संकेत समझ लेना उचित नहीं है। आध्यात्मिक अनुभव और चिकित्सीय स्थिति में अंतर समझना आवश्यक है।

निष्कर्ष

Schumann Resonance पृथ्वी और आयनमंडल के बीच की एक स्थिर प्राकृतिक विद्युत-चुंबकीय घटना है, जिसकी मूल आवृत्ति में किसी स्थायी वृद्धि का वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है।

कानों में घंटी बजने की समस्या अधिकतर मामलों में टिनिटस या अन्य स्वास्थ्य कारणों से जुड़ी होती है, न कि पृथ्वी की फ्रीक्वेंसी में बदलाव से।

जहाँ विज्ञान हमें तथ्यात्मक समझ प्रदान करता है, वहीं आध्यात्मिक ज्ञान हमें आंतरिक सत्य की ओर ले जाता है। दोनों को संतुलित दृष्टिकोण से समझना आवश्यक है।

अफवाहों से बचें, स्वास्थ्य समस्याओं के लिए चिकित्सक से परामर्श लें, और आध्यात्मिक उन्नति के लिए शास्त्रसम्मत मार्ग को अपनाएँ—यही विवेकपूर्ण और जिम्मेदार दृष्टिकोण है।

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