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Home » Save Aravalli विवाद: सुप्रीम कोर्ट की नई परिभाषा पर देशव्यापी पर्यावरण बहस

Nature

Save Aravalli विवाद: सुप्रीम कोर्ट की नई परिभाषा पर देशव्यापी पर्यावरण बहस

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Last updated: February 3, 2026 11:43 am
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Save Aravalli विवाद: सुप्रीम कोर्ट की नई परिभाषा पर देशव्यापी पर्यावरण बहस
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अरावली पर्वतमाला को लेकर सुप्रीम कोर्ट की नई कानूनी परिभाषा आने के पश्चात खड़े हुए विवाद ने पूरे देश में पर्यावरणीय चर्चा को तेज कर दिया है। नवंबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्वीकृत नई परिभाषा के अनुसार केवल 100 मीटर या उससे अधिक ऊँचाई वाली पहाड़ियों को अरावली माना गया है, जिस पर पर्यावरण विशेषज्ञों ने गंभीर चिंता जताई है। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे छोटी और मध्यम पहाड़ियाँ संरक्षण से बाहर हो सकती हैं, जिससे अवैध खनन, निर्माण गतिविधियाँ, जल संकट और ह प्रदूषण बढ़ने का खतरा है। अरावली थार रेगिस्तान के फैलाव को रोकने, भूजल संरक्षण और जैव विविधता बनाए रखने में अहम भूमिका निभाती है।

Contents
  • अरावली पर्वतमाला: सुप्रीम कोर्ट का फैसला और नई परिभाषा 
  • अरावली पर्वतमाला: नई परिभाषा को लेकर विवाद
  • अरावली पर्वतमाला का पर्यावरणीय महत्व
  •  सोशल मीडिया पर #SaveAravalli अभियान
  • राजनीतिक बहस
  • अरावली पर्वतमाला का महत्व और भविष्य 

सोशल मीडिया अभियान, #SaveAravalli आंदोलन, राजनीतिक बहस और सुप्रीम कोर्ट की अस्थायी रोक ने इस मुद्दे को राष्ट्रीय चर्चा का केंद्र बना दिया है। अरावली का संरक्षण वर्तमान ही नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।

अरावली पर्वतमाला: सुप्रीम कोर्ट का फैसला और नई परिभाषा 

अरावली पर्वतमाला की नई कानूनी परिभाषा को नवंबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने स्वीकार किया। सुप्रीम कोर्ट की नई परिभाषा के अनुसार, केवल वह ही पहाड़ियाँ अरावली हिल्स मानी जाएँगी। जिनकी ऊँचाई लगभग 100 मीटर या इससे अधिक हो। अगर दो या अधिक पहाड़ियाँ 500 मीटर के दायरे में हों और उनके बीच जमीन हो, तो उन्हें ‘अरावली रेंज’ में गिना किया जाएगा।

कोर्ट का फैसला आने से पहले, राज्यों में अरावली की परिभाषा अलग अलग थी, जिससे खनन और निर्माण नियमों में भ्रम था। कोर्ट ने कहा कि यह कदम पारदर्शी और स्थायी संरक्षण के लिए आवश्यक है।

अरावली पर्वतमाला: नई परिभाषा को लेकर विवाद

नई परिभाषा लागू होने के बाद, पर्यावरण विशेषज्ञों ने चेतावनी दी कि लगभग 90% छोटी और मध्यम ऊँचाई वाली पहाड़ियाँ संरक्षण के दायरे से बाहर हो सकती हैं।  इससे निर्माण गतिविधियों और अवैध खनन का खतरा बढ़ जाएगा। 

विशेषज्ञों के अनुसार अरावली केवल पहाड़ नहीं, बल्कि यह हवा, पानी, और जैव विविधता का जीवनदायनी आधार है। यदि इसे संरक्षित नहीं किया गया, तो दिल्ली NCR और निकटतम क्षेत्रों में जल संकट बढ़ जाएगा और हवा की गुणवत्ता भी गिर सकती है।

इस विवाद ने अरावली पर राष्ट्रीय स्तर पर्यावरणीय चर्चा को तेज कर दिया है।

अरावली पर्वतमाला का पर्यावरणीय महत्व

अरावली पर्वतमाला थार रेगिस्तान के फैलाव को रोकने के साथ-साथ, वर्षा जल को जमीन में सोखकर भूजल स्तर बनाए रखने में भी मदद करती है। यह झरनों और नदियों का स्रोत भी है और आसपास के जैव विविधता केंद्रों को बनाएं रखने में भी मदद करती है  तापमान संतुलन बनाए रखने, दिल्ली-NCR की हवा को साफ रखने और वन्यजीवन को संरक्षित करने में अरावली की महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। अरावली के बिना तेज़ गर्मी और सूखे की समस्या बढ़ सकती है। साथ ही छोटे और मध्यम ऊँचाई वाली पहाड़ियों का नुकसान पर्यावरणीय असंतुलन पैदा कर सकता है।

 सोशल मीडिया पर #SaveAravalli अभियान

दिसंबर 2025 से सोशल मीडिया पर #SaveAravalli अभियान तेज़ी से वायरल हो गए। छात्र संगठनों और युवाओं ने इसे राष्ट्रीय स्तर पर फैलाने के लिए फोटो, वीडियो, पोस्ट मेटर और ग्राफिक्स बनाए गए। जिन्हें सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर पोस्ट कर लोगो में जागरूकता अभियान चलाया। राजस्थान के कई शहरों में रैलियाँ, धरना प्रदर्शन और पैदल मार्च आयोजित किए गए। इन आंदोलनों का उद्देश्य सरकार और प्रशासन पर दबाव बनाना था, ताकि अरावली के संरक्षण और विकास में संतुलन सुनिश्चित किया जा सके। जनता की बढ़ती भागीदारी ने अरावली के इस मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर ध्यान केंद्रित कर दिया।

विश्व शाकाहार दिवस 2025 : करुणा, स्वास्थ्य और पर्यावरण बचाने का संदेश

राजनीतिक बहस

राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने “अरावली बचाओ अभियान” की अगुवाई करते हुए राष्ट्रीय स्तर पर समर्थन जुटाया। इस मुद्दे पर राजनीतिक दलों में बहस और तेज हो गई हैं। सत्ता पक्ष रोजगार और इन्फ्रास्ट्रक्चर की जरूरतों को तर्क के रूप में पेश कर रहा है, जबकि विपक्ष विकास और निर्माण के नाम पर संरक्षण पर सवाल उठा रह है।

युवा, छात्र संगठन, स्थानीय लोग और आम जनता इस आंदोलन में सक्रिय रूप से शामिल हैं। इस बहस ने अरावली संरक्षण को केवल राजनीतिक नहीं बल्कि पर्यावरणीय और सामाजिक मुद्दा भी बना दिया। विवाद बढ़ने पर सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले पर दिसंबर 2025 को अस्थायी रोक लगा दी। इसके साथ ही एकउच्च स्तरीय विशेषज्ञ पैनल बनाने के निर्देश दिए 

केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने हाल ही में अरावली संरक्षण और माइनिंग के बारे में स्पष्ट किया कि नई वैज्ञानिक परिभाषा का उद्देश्य पारदर्शिता को सुनिश्चित करना और अवैध खनन पर रोक लगाना है।

नए खनन पट्टों पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया है। कुल क्षेत्र का केवल 0.19% हिस्सा ही खनन के लिए योग्य माना गया है।

अवैध खनन के मामले में सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट ने इसे “प्राकृतिक संसाधनों की लूट” कहा।

अरावली पर्वतमाला का महत्व और भविष्य 

अरावली पर्वतमाला अब केवल पहाड़ों का मामला नहीं रह गया है, बल्कि भूजल, झरनों, नदियों, वायु और जीवन से जुड़ा राष्ट्रीय मुद्दा बन चुका है। 

#SaveAravalli आंदोलन ने अरावली मुद्दे को राष्ट्रीय चर्चा का केंद्र और सामाजिक जागरूकता का मुख्य विषय बना दिया है। 

पर्यावरण विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि यदि अरावली पर्वतमाला को संरक्षित नहीं किया गया, तो भूजल स्तर घटेगा। उसके कारण भूजल संकट, हवा की गुणवत्ता और जैव विविधता पर लम्बे समय तक गहरा प्रभाव पड़ सकते हैं। 

इसलिए नई परिभाषा और नियमों को लागू करना न केवल वर्तमान के लिए बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।

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