कर्नाटक कांग्रेस में नेतृत्व परिवर्तन की अटकलें एक बार फिर सिर उठाने लगी हैं। 20 नवंबर 2025 को उपमुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार के समर्थक एक समूह में आए दस कांग्रेस विधायक अचानक नई दिल्ली पहुंच गए। उन्होंने अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी (AICC) के अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे से मुलाकात की और 2023 के विधानसभा चुनाव से पहले हुए बिजली-साझेदारी (पावर-शेयरिंग) फॉर्मूले को लागू करने की मांग उठाई। इस पूरे घटनाक्रम ने राज्य की राजनीति में हलचल पैदा कर दी है और सियासी गलियारों में नवंबर क्रांति की बातें जोरों पर हैं।
- दिल्ली में शक्ति-समीकरण की तलाश
- खड़गे से अलग-अलग और सामूहिक मुलाकात
- शिवकुमार ने दूरी बनाई, कहा—गुटबाज़ी मेरे ख़ून में नहीं
- 21 नवंबर 2025 को उन्होंने एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर पोस्ट किया
- सिद्धारमैया का दो-टूक बयान: पांच साल का कार्यकाल पूरा करूंगा
- इस पर शिवकुमार ने सार्वजनिक रूप से सिद्धारमैया का समर्थन किया
- असंतोष की पुरानी परतें फिर खुलीं
- मंत्रिमंडल पुनर्गठन पर अटकलें जारी
- राजनीतिक पारा चढ़ा, पर सरकार स्थिर
दिल्ली में शक्ति-समीकरण की तलाश
नई दिल्ली पहुंचे विधायकों में मंत्री एन. चेलुवरायस्वामी, इकबाल हुसैन, एच.सी. बालकृष्ण, एस.आर. श्रीनिवास और टी.डी. राजेगौड़ा शामिल थे। इन नेताओं ने खड़गे के सामने यह आग्रह रखा कि चुनाव पूर्व तय फार्मूले के अनुसार मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के ढाई साल का कार्यकाल पूरा होते ही डी.के. शिवकुमार को सत्ता सौंपी जाए। उल्लेखनीय है कि कांग्रेस ने मई 2023 के विधानसभा चुनाव में 135 सीटें जीतकर स्पष्ट बहुमत हासिल किया था।
स्रोत बताते हैं कि और भी विधायक सप्ताहांत तक दिल्ली पहुंच सकते हैं। विधायक इकबाल हुसैन ने साफ कहा, हम केवल शिवकुमार को मुख्यमंत्री बनाने की मांग कर रहे हैं।
खड़गे से अलग-अलग और सामूहिक मुलाकात
AICC अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने सभी विधायकों से पहले अलग-अलग और फिर सामूहिक बातचीत की। उन्होंने उनकी शिकायतें ध्यान से सुनीं, परंतु किसी प्रकार का तत्काल निर्देश जारी नहीं किया। पार्टी सूत्रों ने संकेत दिया कि उच्च नेतृत्व मामले को संभालने में जल्दबाजी नहीं दिखाना चाहता, ताकि हालात अनियंत्रित न हों।
शिवकुमार ने दूरी बनाई, कहा—गुटबाज़ी मेरे ख़ून में नहीं
दिल्ली पहुंचे विधायकों की गतिविधियों ने जब राजनीतिक तापमान बढ़ाया, तब उपमुख्यमंत्री शिवकुमार ने खुद को इससे अलग बताया। उन्होंने साफ कहा कि उन्हें विधायकों की यात्रा की जानकारी नहीं है। शिवकुमार ने यह भी कहा कि वे स्वास्थ्य कारणों के चलते घर पर थे और दिल्ली नहीं जा सके।
21 नवंबर 2025 को उन्होंने एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर पोस्ट किया
सभी 140 विधायक मेरे हैं। गुटबाजी मेरे खून में नहीं है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि विधायकों के दिल्ली जाने का असली कारण मंत्रिमंडल विस्तार में जगह पाने की इच्छा है, क्योंकि मुख्यमंत्री सिद्धारमैया पहले ही पुनर्गठन की घोषणा कर चुके हैं। उनकी पोस्ट में यह भी लिखा था, हर कोई मंत्री बनना चाहता है, यह उनका हक है, हम उन्हें नेतृत्व से मिलने से नहीं रोक सकते।
सिद्धारमैया का दो-टूक बयान: पांच साल का कार्यकाल पूरा करूंगा
21 नवंबर को मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने मीडिया से कहा कि वे अपना पूरा पांच साल का कार्यकाल पूरा करेंगे और अगला बजट भी वही प्रस्तुत करेंगे। उन्होंने यह भी कहा कि किसी भी तरह की रोटेशन व्यवस्था पर कभी सहमति नहीं हुई थी। उनके अनुसार, सरकार की पांच गारंटी योजनाएं पूरी हो चुकी हैं और सरकार स्थिर है।
इस पर शिवकुमार ने सार्वजनिक रूप से सिद्धारमैया का समर्थन किया
मुख्यमंत्री सिद्धारमैया अपना पांच साल का कार्यकाल पूरा करेंगे। मैं उन्हें शुभकामनाएं देता हूं। हमने बार-बार कहा है कि हम हाईकमान के फैसले का पालन करेंगे।
उन्होंने यह भी जोड़ा कि वे जल्द ही खड़गे से मिलकर 100 नए कांग्रेस कार्यालयों के उद्घाटन की तारीखें तय करेंगे।
असंतोष की पुरानी परतें फिर खुलीं
कर्नाटक कांग्रेस में सिद्धारमैया और शिवकुमार के बीच खींचतान कोई नई बात नहीं है। वर्षों से दोनों खेमों के बीच यह शक्ति-संघर्ष चलता रहा है। कांग्रेस के पास भले ही 135 विधायक हों और सरकार संख्याबल के लिहाज से सुरक्षित हो, लेकिन 20–25 विधायकों में असंतोष की खबरें लगातार उभर रही हैं।
21 नवंबर 2025 की शाम 5 बजे तक न तो किसी ने इस्तीफा दिया था और न ही कोई दल-बदल हुआ है। हाईकमान ने सभी नेताओं को सार्वजनिक बयानबाजी से परहेज़ करने की चेतावनी दी है।
मंत्रिमंडल पुनर्गठन पर अटकलें जारी
कर्नाटक मंत्रिमंडल का पुनर्गठन अभी लंबित है। यह सिद्धारमैया और खड़गे की बैठक के बाद ही तय होगा। शिवकुमार ने संकेत दिया है कि वे छह साल से संभाल रहे कर्नाटक प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष (KPCC) पद से इस्तीफा दे सकते हैं ताकि राज्य की राजनीति में फ्रंटलाइन भूमिका निभा सकें।
हालांकि अब तक किसी तरह के नेतृत्व परिवर्तन की कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है। पार्टी के वरिष्ठ सूत्रों का कहना है कि बातचीत जारी है ताकि मामला बढ़ने से पहले ही शांत कराया जा सके।
राजनीतिक पारा चढ़ा, पर सरकार स्थिर
सभी घटनाओं ने कर्नाटक की राजनीतिक जमीन को जरूर हिला दिया है, लेकिन सरकार पर तत्काल किसी खतरे के आसार नहीं दिखते। सत्ता-समीकरण भले ही उलझे हों, पर शीर्ष नेतृत्व स्थिति पर करीबी नजर बनाए हुए है।
कर्नाटक कांग्रेस में यह उथल-पुथल आगे किस दिशा में बढ़ेगी, यह आने वाले दिनों में स्पष्ट होगा। फिलहाल इतना तय है कि “नवंबर क्रांति” की चर्चाओं ने प्रदेश की सियासत को पूरी तरह गर्म कर दिया है।

