राजधानी दिल्ली में गरीब और आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्ग (EWS) के बच्चों का अच्छे प्राइवेट स्कूलों में दाखिला करवाना हमेशा से ही एक लंबी और पेचीदा प्रक्रिया रही है। लेकिन, हाल ही में दिल्ली हाईकोर्ट ने एक ऐसा अहम फैसला सुनाया है, जो हजारों माता-पिता के लिए एक बड़ी राहत बनकर आया है। दरअसल, एक 7 साल के बच्चे का नाम ईडब्ल्यूएस कोटे के तहत दूसरी ड्रॉ लिस्ट में आ गया था, लेकिन परिवार को शिक्षा निदेशालय (DoE) की तरफ से कोई एसएमएस या सूचना नहीं मिली। जब तक परिवार को पता चला, तब तक दाखिले की आखिरी तारीख निकल चुकी थी।
- Delhi High Court Order on EWS Admission से जुड़े मुख्य बिंदु:
- क्या था पूरा मामला? कैसे छूटा बच्चे का एडमिशन?
- सितंबर में पोर्टल चेक करने पर खुला राज़
- कोर्ट में वकील की दलीलें और सिस्टम की नाकामी पर सवाल
- 5 किमी के दायरे में एडमिशन: जस्टिस जसमीत सिंह का अहम फैसला
- इस फैसले के क्या हैं मायने?
- FAQs about Delhi High Court Order on EWS Admission
इस गंभीर मामले पर सुनवाई करते हुए, हाईकोर्ट की एकल पीठ ने ‘शिक्षा के अधिकार अधिनियम 2009’ (RTE Act) का हवाला देते हुए शिक्षा निदेशालय को सख्त निर्देश दिए हैं कि बच्चे को तुरंत या तो उसी आवंटित स्कूल में दाखिला दिया जाए, या फिर उसके घर से 5 किलोमीटर के दायरे में किसी दूसरे मान्यता प्राप्त प्राइवेट स्कूल में उसकी सीट पक्की की जाए।
Delhi High Court Order on EWS Admission से जुड़े मुख्य बिंदु:
- दिल्ली हाईकोर्ट ने EWS/DG कोटे के तहत पहली कक्षा में एडमिशन से जुड़े एक अहम मामले में शिक्षा निदेशालय (DoE) को सख्त निर्देश दिए हैं।
- बच्चे का नाम दूसरी ड्रॉ सूची में ‘नवीन भारती प्रिपरेटरी स्कूल’ के लिए आवंटित हुआ था, लेकिन पेरेंट्स को SMS नहीं मिला।
- जानकारी के अभाव में बच्चा तय समय सीमा में एडमिशन नहीं ले पाया और तीसरी लिस्ट से भी उसका नाम हटा दिया गया।
- अदालत ने इसे संविधान के अनुच्छेद 14, 21-ए और RTE एक्ट का सीधा उल्लंघन माना है।
क्या था पूरा मामला? कैसे छूटा बच्चे का एडमिशन?
याचिका के अनुसार, बच्चे के पिता ने शैक्षणिक सत्र 2026-27 में पहली कक्षा में दाखिले के लिए शिक्षा निदेशालय (DoE) की ईडब्ल्यूएस/डीजी (EWS/DG) श्रेणी के तहत ऑनलाइन आवेदन किया था। यह आवेदन शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 की धारा 12(1)(c) के तहत 25 प्रतिशत आरक्षित सीटों के लिए था। 6 अप्रैल 2026 को जारी पहली कंप्यूटरीकृत लॉटरी (लकी ड्रॉ) में बच्चे का नाम नहीं आया।
10 जुलाई 2026 को जारी की गई दूसरी लिस्ट में उसे ‘नवीन भारती प्रिपरेटरी स्कूल’ में सीट मिल गई। लेकिन समस्या यहीं से शुरू हुई। याचिका में दावा किया गया कि परिवार को इस आवंटन की कोई जानकारी नहीं मिली। शिक्षा निदेशालय की तरफ से न कोई एसएमएस आया और न ही कोई मेल। पिता का कहना था कि जब उन्होंने अपनी बेटी का एडमिशन करवाया था, तब उन्हें हर अपडेट का मैसेज मिला था, इसलिए इस बार भी वे मैसेज का इंतज़ार करते रहे।
सितंबर में पोर्टल चेक करने पर खुला राज़
महीनों बीत जाने के बाद, जब पिता ने उच्च कक्षाओं में दाखिले की जानकारी के लिए सितंबर 2026 में शिक्षा निदेशालय के पोर्टल पर लॉग-इन किया, तब जाकर उन्हें पता चला कि उनके बेटे को तो जुलाई में ही स्कूल अलॉट हो चुका था। घबराए हुए परिवार ने तुरंत स्कूल, नगर निगम और शिक्षा निदेशालय के चक्कर काटने शुरू कर दिए।
उन्होंने 23 सितंबर को लिखित शिकायतें भी दीं, लेकिन अधिकारियों ने समय सीमा समाप्त होने का हवाला देकर बच्चे को दाखिला देने से साफ इनकार कर दिया। हद तो तब हो गई जब 24 सितंबर को जारी हुई ईडब्ल्यूएस की तीसरी आवंटन सूची में भी उस बच्चे का नाम पूरी तरह से गायब था। थक-हारकर परिवार को दिल्ली हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा।
कोर्ट में वकील की दलीलें और सिस्टम की नाकामी पर सवाल
अदालत में बच्चे की तरफ से पेश हुए वरिष्ठ वकीलों ने एक बहुत ही मज़बूत तर्क रखा। उन्होंने कहा कि “माता-पिता को कोई सूचना प्राप्त नहीं हुई। आवंटन की सूचना न देने से लेकर प्रवेश से अचानक इनकार करने और बिना कोई कारण बताए सिस्टम से नाम हटाने तक, सरकारी अधिकारियों का यह रवैया बेहद मनमाना है।”
वकील ने कोर्ट को समझाया कि शिक्षा निदेशालय का यह आचरण सीधे तौर पर संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), अनुच्छेद 21-ए (शिक्षा का मौलिक अधिकार) और RTE एक्ट के वैधानिक जनादेश का खुला उल्लंघन है। एक सरकारी पोर्टल की तकनीकी खामी या संदेश न भेजने की लापरवाही के कारण किसी भी गरीब बच्चे से उसकी पढ़ाई का अधिकार नहीं छीना जा सकता।
5 किमी के दायरे में एडमिशन: जस्टिस जसमीत सिंह का अहम फैसला
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद, जस्टिस जसमीत सिंह ने बच्चे की शिक्षा के नुकसान (Loss of Academic Year) को बेहद गंभीरता से लिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि ‘शिक्षा का अधिकार’ केवल कागजों पर नहीं, बल्कि व्यवहारिक रूप से लागू होना चाहिए। अदालत ने शिक्षा निदेशालय (DoE) और नवीन भारती प्रिपरेटरी स्कूल को निर्देश दिया कि वे चालू शैक्षणिक सत्र (2026-27) के लिए बच्चे को उसी स्कूल में दाखिला देने पर विचार करें।
इसके बाद कोर्ट ने एक बहुत ही महत्वपूर्ण विकल्प भी दिया। कोर्ट ने कहा, “यदि उस स्कूल में अब सीटें भर चुकी हैं या प्रवेश देना संभव न हो, तो शिक्षा निदेशालय तुरंत उस बच्चे को उसके घर के 5 किलोमीटर के दायरे में स्थित किसी अन्य मान्यता प्राप्त प्राइवेट स्कूल में ईडब्ल्यूएस कोटे के तहत सीट आवंटित करे।” इस स्पष्ट और मानवीय आदेश के साथ, कोर्ट ने रिट याचिका को स्वीकार करते हुए मामले का निपटारा कर दिया।
इस फैसले के क्या हैं मायने?
यह फैसला उन तमाम माता-पिता के लिए एक बड़ी नजीर है, जो सिस्टम की तकनीकी खामियों के कारण अपने बच्चों का ईडब्ल्यूएस एडमिशन खो देते हैं। हालांकि, कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि ‘घर से 5 किमी के दायरे’ वाला निर्देश इस विशेष मामले की परिस्थितियों को देखते हुए दिया गया है। इसका मतलब यह नहीं है कि अब हर कोई ईडब्ल्यूएस दाखिले में अपनी पसंद का स्कूल मांग सकता है।
FAQs about Delhi High Court Order on EWS Admission
1. दिल्ली हाईकोर्ट ने ईडब्ल्यूएस एडमिशन को लेकर क्या नया आदेश दिया है?
हाईकोर्ट ने शिक्षा निदेशालय को निर्देश दिया है कि जिस बच्चे का एडमिशन समय पर सूचना न मिलने के कारण छूट गया था, उसे घर से 5 किमी के दायरे में किसी अन्य स्कूल में सीट दी जाए।
2. बच्चे का ईडब्ल्यूएस (EWS) के तहत एडमिशन क्यों छूट गया था?
बच्चे का नाम 10 जुलाई 2026 की दूसरी लिस्ट में आ गया था, लेकिन परिवार को शिक्षा निदेशालय की तरफ से कोई SMS अलर्ट या सूचना नहीं मिली।
3. यह मामला किस स्कूल से जुड़ा हुआ था?
बच्चे को ईडब्ल्यूएस/डीजी (EWS/DG) कोटे के तहत ‘नवीन भारती प्रिपरेटरी स्कूल’ (Navin Bharti Preparatory School) में पहली कक्षा के लिए सीट आवंटित की गई थी।
4. क्या अब सभी ईडब्ल्यूएस छात्रों को 5 किमी के दायरे में मनपसंद स्कूल मिलेगा?
नहीं, कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार यह निर्देश विशेष रूप से इसी मामले के लिए दिया गया है, ताकि बच्चे का साल खराब न हो।
Q5. यह फैसला संविधान और कानून के किस अधिकार पर आधारित है?
यह फैसला मुख्य रूप से संविधान के अनुच्छेद 21-ए (शिक्षा का अधिकार) और शिक्षा का अधिकार अधिनियम (RTE Act), 2009 की धारा 12(1)(c) के वैधानिक जनादेश पर आधारित है।

