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Home » असम की खतरनाक कोयला खदानें: गरीबी और जोखिम के बीच फंसी जिंदगी

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असम की खतरनाक कोयला खदानें: गरीबी और जोखिम के बीच फंसी जिंदगी

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Last updated: January 13, 2025 1:44 pm
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असम की खतरनाक कोयला खदानें: गरीबी और जोखिम के बीच फंसी जिंदगी
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खतरनाक खदानें: गरीबी और मजबूरी के बीच झूलती मज़दूरों की जिंदगी

Contents
  • कोयले की कीमत: मजदूरों की जान का सौदा
  • पांच दिनों की दुःस्वप्न: खदान में फंसे मज़दूर
  • पाँच दिनों की पीड़ा: बचाव प्रयास जारी
  • गरीबी के कारण जान जोखिम में डालते हैं मजदूर
  • पिछले हादसों से सबक नहीं, अवैध खनन जारी

असम के दीमा हसाओ ज़िले की कोयला खदानों में काम करने वाले मज़दूरों की जिंदगी हमेशा खतरे में रहती है। 2014 में रैट-होल खनन पर प्रतिबंध के बावजूद, अवैध खनन अभी भी जारी है। हाल ही में हुए कोयला खदान हादसे में सात मज़दूर फंस गए, और यह हादसा एक बार फिर से इन छुपी हुई खतरों को उजागर करता है। सेना, एनडीआरएफ़ और नौसेना की टीमों द्वारा बचाव कार्य जारी है, लेकिन यह घटना उन मज़दूरों की कठोर सच्चाई को सामने लाती है जो खतरनाक काम और अत्यधिक गरीबी के बीच फंसे हुए हैं।

कोयले की कीमत: मजदूरों की जान का सौदा

कोयला उद्योग में खतरनाक कार्य स्थितियां और अवैध खनन अक्सर मज़दूरों की जान की भारी कीमत पर आते हैं। हादसे के पांच दिन बाद भी फंसे हुए सात मज़दूरों का पता नहीं चल पाया है। ये लोग बेहतर आय की उम्मीद में अपनी जान जोखिम में डालते हैं, जबकि स्थितियां बेहद खतरनाक होती हैं।

पांच दिनों की दुःस्वप्न: खदान में फंसे मज़दूर

सोमवार की सुबह, 39 वर्षीय कोयला मज़दूर राजीव ने मौत का सामना किया। जब अचानक खदान में पानी भर गया, तो उनके खयाल अपने परिवार की ओर मुड़ गए—उनकी माँ, पत्नी और नौ वर्षीय बेटे की यादें उनकी आँखों के सामने तैरने लगीं। किसी तरह राजीव ने बचाव पाया, लेकिन उनके साथी उतने भाग्यशाली नहीं रहे। उनकी कहानी इन खतरनाक खदानों में काम करने वाले लोगों के सामने आने वाले जोखिमों का गवाही देती है।

राजीव याद करते हैं, “मैं सुबह साढ़े 4 बजे काम पर गया था। हम चार मज़दूर थे और सुरंग के अंदर कोयला निकाल रहे थे। अचानक पानी की तेज़ आवाज़ आई और हम डर गए। हम भागे, लेकिन सुरंग बहुत संकरी थी। मैंने अपने परिवार को याद किया और सोचा कि अब मेरा अंत आ गया है।” चमत्कारिक रूप से, राजीव ने पानी के बहाव के साथ खुद को बाहर की ओर लेटने का फैसला किया और बच गए। लेकिन उनके तीन साथी अभी भी अंदर फंसे हुए हैं।

पाँच दिनों की पीड़ा: बचाव प्रयास जारी

पिछले पांच दिनों से बचाव दल फंसे हुए मज़दूरों की तलाश में जुटे हुए हैं। सुरंगों में भरा पानी और मलबा इस कार्य को अत्यधिक कठिन बना रहा है। एनडीआरएफ़ के डिप्टी कमांडर एन.के. तिवारी बताते हैं, “खदान के अंदर जमा पानी के कारण गोताखोरों को सतह तक पहुँचने में कठिनाई हो रही है। उच्च क्षमता वाले पंपों का इस्तेमाल किया जा रहा है, लेकिन अंदर दिखाई नहीं देने के कारण यह काम और मुश्किल हो गया है।”

गरीबी के कारण जान जोखिम में डालते हैं मजदूर

जब राजीव से पूछा गया कि यह काम इतना जोखिमभरा होने के बावजूद वह क्यों करते हैं, तो उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा, “हम गरीब मजदूर हैं। हम यह जोखिमभरा काम इसलिए करते हैं क्योंकि यहां मजदूरी काफी अच्छी मिल जाती है। हर मजदूर रोजाना दो हज़ार रुपये कमा लेता है, कभी-कभी महीने में 80-90 हज़ार रुपये भी। अन्य कामों में केवल 400 रुपये ही मिलते हैं। मेरे पास परिवार है, जो इस आय पर निर्भर है।”

पिछले हादसों से सबक नहीं, अवैध खनन जारी

जनवरी 2024 में नागालैंड में रैट-होल कोयला खदान में आग लगने से छह श्रमिकों की मौत हो गई थी। 2018 में मेघालय में एक अवैध खदान में 15 लोग फंस गए थे, जब पास की एक नदी का पानी खदान में भर गया था। इन घटनाओं के बावजूद, अवैध खनन पर कठोर कार्रवाई अब तक नहीं हो पाई है।

संत रामपाल जी महाराज के अनुसार, जीवन की अनिश्चितता और आकस्मिक मृत्यु की वास्तविकता को स्वीकार करते हुए हमें अपने आध्यात्मिक विकास पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। संसारिक सुख और भौतिकवादी महत्वाकांक्षाएं अस्थायी हैं और हमें जीवन के वास्तविक उद्देश्य से भटका सकती हैं। सच्चे भक्ति मार्ग का अनुसरण कर और परमात्मा की शरण में जाकर, हम मृत्यु के भय को दूर कर सकते हैं और सच्ची शांति प्राप्त कर सकते हैं।

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