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डार्क वेब एक गुप्त जानकारी

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Last updated: November 26, 2024 12:55 pm
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डार्क वेब एक गुप्त जानकारी
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डार्क वेब वास्तव में इंटरनेट का वो हिस्सा है जिसे गूगल, बिंग जैसे सर्च इंजन एक्सेस नहीं कर सकते। यह सामान्य ब्राउज़िंग के दायरे से परे होती है। डार्क वेब को क्रोम या सफ़ारी इंटरनेट वेब ब्राउज़र से एक्सेस नहीं किया जा सकता। एक विशेष प्रकार का सॉफ़्टवेयर जिसे TOR (The Onion Router) या I2P (Invisible Internet Project) जैसे सॉफ़्टवेयर की मदद से एक्सेस किया जाता है।

Contents
  • डार्क वेब का इस्तेमाल क्यों किया जाता है?
  • डार्क वेब और डीप वेब के बीच का अंतर
  • सतही वेब क्या है?
  • क्या डार्क वेब अवैध है? 
  • डार्क वेब को लेकर चिंताएं
  • निम्न सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म पर हमारे साथ जुड़िए

डार्क वेब की वेबसाइट्स तक चुनिंदा लोगों की ही पहुँच होती है। विशेष ऑथोराइजेशन और विशेष सॉफ्टवेयर के माध्यम से ही इस तक पहुंचा जा सकता है।

डार्क वेब का इस्तेमाल क्यों किया जाता है?

डार्क वेब का उपयोग गोपनीय जानकारी शेयर करने और अपनी पहचान गुप्त रखने के लिए किया जाता है। इसका प्रयोग अच्छे उद्देश्य से गोपनीय कार्य करने के लिए किया जाता है। कई मामलों में सरकारी एजेंसियां भी डार्क वेब का ही इस्तेमाल करती हैं।

डार्क वेब को अधिकांशतः गैर कानूनी गतिविधियों से भी जोड़कर देखा जाता है जहां डेटा का गलत इस्तेमाल होता है। अत्यधिक नियंत्रण और सेंसरशिप का सामना करने वाले लोग डार्क वेब का इस्तेमाल करते हैं। यह मुखबिरों और पत्रकारों के लिए जानकारी की गोपनीयता बनाए रखते हुए उसके स्थानांतरण में मददगार साबित होता है। 

डार्क वेब और डीप वेब के बीच का अंतर

डार्क वेब और डीप वेब दोनों अलग अलग हैं। डीप वेब को गूगल जैसे सर्च इंजन की मदद से एक्सेस नहीं किया जा सकता। डीप वेब वर्ल्ड वाइड वेब का वह हिस्सा है जो गूगल जैसे सर्च इंजन से अनुक्रमित नहीं किया जा सकता। डीप वेब में किसी डॉक्यूमेंट के एक्सेस के लिए आपको  यूज़र नेम और पासवर्ड के ज़रिए रजिस्टर करना होता है।

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उदाहरण के लिए जीमेल अकाउंट, सरकारी प्रकाशन, वैज्ञानिक अनुसंधान की वेबसाइट्स आदि ऐसी ही वेबसाइट्स हैं जहां पहुंचने के लिए एडमिन के अप्रूवल की आवश्यकता होती है।

इंटरनेट का 90 प्रतिशत काम डीप वेब के जरिए होता है जबकि 0.001 प्रतिशत काम डार्क वेब के जरिए होता है।

सतही वेब क्या है?

सतही वेब इंटरनेट का वह हिस्सा है जो हमारे सामने है। इसे ही हम विज़िबल वेब, इंडेक्स वेब या लाइटनेट कहते हैं। क्रोम, सफ़ारी जैसे ब्राउजर से इसे एक्सेस किया जा सकता है। जैसे गूगल, याहू, बिंग पर जब हम सर्च करते हैं तो इसके लिए हमें किसी विशेष अनुमति की आवश्यकता नहीं होती और न ही एनक्रिप्शन की। यही सतही वेब है। इसके बात आता है डीप वेब और डार्क वेब। डीप वेब सतही वेब से लगभग पांच सौ गुना बड़ा है।

क्या डार्क वेब अवैध है? 

डार्क वेब अवैध नहीं है किंतु यहां पर अवैध कार्य होते हैं जैसे सट्टेबाजी और कालाबाजारी, ड्रग्स सप्लाई से लेकर लाइव मर्डर तक। यहां शैक्षणिक डेटाबेस से लेकर लोगों की निजी जानकारी भी लीक होती रहती है। अब सवाल ये उठता है कि यदि डार्क वेब पर अवैध कार्य हो रहे हैं तो कार्यवाही क्यों नहीं होती। असल में डार्क वेब का इस्तेमाल करने के लिए लोग कई तरह की कोडिंग के माध्यम से कनेक्ट होते हैं।

डार्क वेब का इस्तेमाल हो लोग अपनी जानकारी छुपाते हुए करते है। परत दर परत डेटा के एनक्रिप्शन के वजह से उपयोगकर्ता को ट्रेस करना लगभग नामुमकिन सा हो जाता है। डार्क वेब में अवैध कार्य तो होते हैं किंतु डार्क वेब अवैध नहीं है। मज़ेदार बात यह है कि पूरे इंटरनेट का 96 प्रतिशत भाग डार्क वेब से संबंधित है और मात्र 4 प्रतिशत है सतही वेब।

डार्क वेब को लेकर चिंताएं

डार्क वेब चूंकि गोपनीयता बनाए रखता है इस कारण वहां यूज़र्स की पहचान करना और उन्हें ट्रेस करना मुश्किल है। साथ ही डार्क वेब पर लगातार अवैध और गैरकानूनी कार्यों से इसके उपयोग को लेकर चिंताएं हैं जिन पर शीघ्र कार्यवाही की आवश्यकता है। डार्क वेब पर निजी डेटा लीक होता है। यहां मानव तस्करी, चाइल्ड पोर्नोग्राफी, ड्रग्स सप्लाई, विस्फोटक सामग्री और हथियारों का क्रय विक्रय जैसी अवैध और गैरकानूनी चीजों को धड़ल्ले से किया जा रहा है।

आतंकवादियों द्वारा डार्क वेब का उपयोग अपनी सूचनाओं के प्रसार और धन जुटाने के लिए किया जाता है। इसके लिए सरकार को साइबर सुरक्षा की दिशा में प्रशिक्षण, क्षमता के विकास और निवेश की आवश्यकता है। केवल भारत ही नहीं बल्कि विश्व भर की सरकारों को साइबर सुरक्षा के ढांचे को मजबूत करने, साइबर स्पेस की सुरक्षा के लिए अन्य सरकारों के साथ खुफिया जानकारी, तकनीक आदि को साझा करते हुए एक दूसरे का सहयोग करना चाहिए।

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