India Crude Import: पश्चिम एशिया में लगातार बढ़ रहे भू-राजनीतिक तनाव ने पूरी दुनिया को चिंता में डाल दिया है। खासतौर पर होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर हाल के दिनों में कई तरह की आशंकाएं सामने आईं। यह समुद्री मार्ग दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल व्यापार मार्गों में गिना जाता है, जहां से रोजाना लाखों बैरल कच्चा तेल अलग-अलग देशों तक पहुंचता है। भारत भी लंबे समय से अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए इस मार्ग पर काफी हद तक निर्भर रहा है। ऐसे में जब इस क्षेत्र में तनाव बढ़ा तो लोगों के मन में यह सवाल उठने लगा कि क्या भारत में पेट्रोल और डीजल की भारी कमी हो सकती है।
भारत ने तेजी से बदली अपनी रणनीति
संकट की आशंका बढ़ते ही भारत सरकार और तेल कंपनियों ने तेजी से नई रणनीति पर काम शुरू कर दिया। पहले भारत का बड़ा हिस्सा मध्य-पूर्व के देशों से आने वाले तेल पर निर्भर था, लेकिन अब सरकार ने वैकल्पिक स्रोतों पर ज्यादा ध्यान देना शुरू किया। यही वजह है कि हाल के महीनों में रूस, वेनेजुएला और अफ्रीका के कुछ देशों से तेल आयात में तेजी आई है। इससे भारत को यह फायदा हुआ कि अगर किसी एक क्षेत्र में सप्लाई प्रभावित होती है तो दूसरे देशों से तेल की व्यवस्था की जा सके।
मई में केवल 5 प्रतिशत रही कमी
हालिया आंकड़ों ने भारत के लिए राहत की तस्वीर पेश की है। मई 2026 में भारत की कच्चे तेल की सप्लाई फरवरी के मुकाबले केवल करीब 5 प्रतिशत कम रही। पहले यह अनुमान लगाया जा रहा था कि होर्मुज संकट के कारण आयात में भारी गिरावट देखने को मिल सकती है, लेकिन वास्तविक स्थिति उतनी खराब नहीं रही। यह आंकड़ा दिखाता है कि भारत ने समय रहते वैकल्पिक व्यवस्थाएं तैयार कर ली थीं और संकट का असर सीमित रखने में सफलता हासिल की।
रूस बना भारत का बड़ा ऊर्जा साझेदार
पिछले कुछ वर्षों में रूस भारत के लिए सबसे बड़े तेल आपूर्तिकर्ताओं में शामिल हो गया है। पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों के बाद रूस रियायती दरों पर तेल बेच रहा है, जिसका फायदा भारत को मिला। भारतीय रिफाइनरियों ने रूसी तेल की खरीद बढ़ाई, जिससे देश की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में मदद मिली। कम कीमत पर तेल मिलने से भारत को आर्थिक राहत भी मिली और ईंधन की उपलब्धता बनाए रखना आसान हुआ।
वेनेजुएला से भी बढ़ी तेल खरीद
रूस के अलावा भारत ने वेनेजुएला से भी तेल आयात बढ़ाया है। पहले वेनेजुएला से सीमित मात्रा में तेल आता था, लेकिन अब यह देश भारत के प्रमुख सप्लायरों में शामिल होता जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की यह नीति भविष्य में ऊर्जा सुरक्षा को और मजबूत करेगी। अलग-अलग देशों से आयात बढ़ाने से किसी एक क्षेत्र पर निर्भरता कम हो जाती है और संकट के समय सप्लाई चेन ज्यादा स्थिर रहती है।
रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार ने दी ताकत
भारत ने पिछले कुछ वर्षों में रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार तैयार करने पर काफी जोर दिया है। इन भंडारों का उद्देश्य यही है कि अगर अचानक आयात प्रभावित हो जाए तो कुछ समय तक देश की जरूरतें पूरी की जा सकें। सरकार के मुताबिक फिलहाल भारत के पास पर्याप्त तेल स्टॉक मौजूद है। यही कारण है कि अंतरराष्ट्रीय तनाव बढ़ने के बावजूद देश में पेट्रोल-डीजल की सप्लाई सामान्य बनी हुई है और बाजार में घबराहट की स्थिति नहीं बनी।
तेल कंपनियां लगातार कर रही निगरानी
सरकारी और निजी तेल कंपनियां लगातार वैश्विक बाजार पर नजर बनाए हुए हैं। आयात, स्टॉक और रिफाइनरी संचालन की रोजाना समीक्षा की जा रही है। जरूरत पड़ने पर कंपनियां स्पॉट मार्केट से भी तेल खरीद रही हैं ताकि सप्लाई में किसी तरह की रुकावट न आए। इस सक्रिय रणनीति का फायदा यह हुआ कि भारत में ईंधन की उपलब्धता बनी रही और आम लोगों को किसी बड़ी परेशानी का सामना नहीं करना पड़ा।
तेल की कीमतें अभी भी बढ़ा सकती हैं चिंता
हालांकि फिलहाल स्थिति नियंत्रण में है, लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि खतरा पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। अगर पश्चिम एशिया में तनाव और बढ़ता है या होर्मुज मार्ग लंबे समय तक प्रभावित रहता है तो वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतें तेजी से बढ़ सकती हैं। इसका सीधा असर भारत की अर्थव्यवस्था, महंगाई और परिवहन खर्च पर पड़ सकता है। इसलिए सरकार और तेल कंपनियां लगातार वैकल्पिक योजनाओं पर काम कर रही हैं।
भारत की ऊर्जा सुरक्षा नीति हुई मजबूत
इस पूरे घटनाक्रम ने यह साफ कर दिया है कि भारत अब केवल एक क्षेत्र पर निर्भर रहने की नीति से आगे बढ़ चुका है। सरकार ने ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने के लिए बहुस्तरीय रणनीति अपनाई है। अलग-अलग देशों से आयात, रणनीतिक भंडार और नए सप्लाई मार्गों की वजह से भारत अब पहले की तुलना में कहीं ज्यादा तैयार दिखाई दे रहा है।

