Delhi Transportation 2026: राजधानी दिल्ली में पब्लिक ट्रांसपोर्ट की रीढ़ मानी जाने वाली बस सेवा 2026 में सबसे नाजुक दौर से गुज़र रही है। ब्लू लाइन बसों का अंत, सीएनजी (CNG) का आगमन और अब इलेक्ट्रिक बसों का दौर। लेकिन 2026 की शुरुआत जिस तरह की चुनौतियों के साथ हुई है, वह चिंताजनक है। ईटीवी भारत और अन्य रिपोर्ट्स बताती हैं कि DIMTS संचालित क्लस्टर बसों का भविष्य, बेड़े में बसों की भारी कमी और इलेक्ट्रिक ट्रांजिशन के दबाव ने सरकार के माथे पर चिंता की लकीरें खींच दी हैं।

Delhi Transportation 2026 से जुड़े मुख्य बिंदु:
- DIMTS के तहत चलने वाली ऑरेंज बसों के कॉन्ट्रैक्ट हो रहे, समाप्त।
- सरकार का पूरा ज़ोर ई-बसों पर है, लेकिन डिपो और चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर बहरहाल तैयार नहीं।
- बस स्टॉप पर भीड़ और बसों की फ्रीक्वेंसी में आई कमी से बढ़ रही यात्रियों की परेशानी।
- मुफ्त बस यात्रा और सब्सिडी के कारण परिवहन विभाग पर बढ़ रहा है आर्थिक दबाव।
DIMTS का भविष्य और कॉन्ट्रैक्ट की समाप्ति
दिल्ली सरकार ने दिसंबर 2025 में हुई कैबिनेट की बैठक में DIMTS को समाप्त करने का बड़ा फैसला लिया है। दिल्ली में सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था दो पहियों पर चलती है, डीटीसी (DTC) और डिम्ट्स (DIMTS) द्वारा संचालित क्लस्टर बसें। 2026 में क्लस्टर स्कीम के तहत चलने वाली कई बसों के परमिट और कॉन्ट्रैक्ट की अवधि समाप्त हो रही है।
मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता की अध्यक्षता में दिल्ली सचिवालय में हुई कैबिनेट के फैसले के मुताबिक, 1 अप्रैल 2026 से DIMTS द्वारा संचालित सभी बस सेवाएं समाप्त कर दी जाएंगी।
आंकड़ों की बाज़ीगरी: मांग 11,000 की, उपलब्धता सीमित
सुप्रीम कोर्ट और दिल्ली हाईकोर्ट ने कई बार स्पष्ट किया है कि दिल्ली की विशाल आबादी को सुचारू रूप से चलाने के लिए कम से कम 11,000 से 15,000 बसों की आवश्यकता है। लेकिन ज़मीनी हकीकत कुछ और ही बयां करती है। 2026 की शुरुआत में भी दिल्ली का बस बेड़ा DTC और क्लस्टर मिलाकर लगभग 7,500 से 8,000 बसों के बीच संघर्ष कर रहा है।
चिंता की बात यह है कि जितनी नई बसें आ रही हैं, उससे कहीं ज़्यादा रफ़्तार से पुरानी सीएनजी (CNG) बसें अपनी 15 साल की उम्र पूरी कर कबाड़ हो रही हैं। यह ‘इनकमिंग’ और ‘आउटगोइंग’ का असंतुलन सरकार के लिए सबसे बड़ी समस्या बन गया है।
इलेक्ट्रिक ट्रांजिशन: सपना बड़ा, लेकिन धरातल पर चुनौतियां
दिल्ली सरकार ने “ग्रीन दिल्ली” के तहत बेड़े को 80% तक इलेक्ट्रिक करने का लक्ष्य रखा है। नीतिगत रूप से यह शानदार है, लेकिन व्यावहारिक रूप से इसमें दो बड़ी बाधाएं हैं:
- मैन्युफैक्चरिंग में देरी: बस निर्माता कंपनियां उतनी तेज़ी से ई-बसों की डिलीवरी नहीं कर पा रही हैं जितनी तेज़ी से सरकार ऑर्डर दे रही है।
- तकनीकी खामियां: कई बार नई तकनीक वाली बसों के रखरखाव और ब्रेकडाउन की समस्याएं भी सामने आ रही हैं, जिससे परिचालन प्रभावित होता है।
डिपो और ज़मीन का संकट
इलेक्ट्रिक बसों को चार्ज करने के लिए हाई-टेक डिपो और चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर की ज़रूरत होती है। दिल्ली में ज़मीन की भारी किल्लत है। सरकार के पास नई बसें खरीदने का बजट तो हो सकता है, लेकिन उन्हें पार्क करने और चार्ज करने के लिए डिपो बनाने की जगह नहीं मिल रही है। बिना डिपो स्पेस के नई बसों का रजिस्ट्रेशन और सड़क पर उतारना असंभव है। बसों की फ्रीक्वेंसी कम होने के कारण स्टॉप्स पर भीड़ बढ़ रही है। इसका सीधा असर आम आदमी पर पड़ रहा है, जिसे मेट्रो में महंगी यात्रा करनी पड़ती है या ऑटो-कैब का सहारा लेना पड़ता है।
FAQs about Delhi Transportation 2026
DIMTS क्लस्टर बसें क्या हैं?
ये दिल्ली में चलने वाली नारंगी रंग की बसें हैं, जो कॉर्पोरेट मॉडल पर निजी ऑपरेटरों द्वारा चलाई जाती हैं लेकिन निगरानी सरकार करती है।
दिल्ली को कितनी बसों की ज़रूरत है?
सुप्रीम कोर्ट के मानकों के अनुसार, दिल्ली को सुचारू यातायात के लिए लगभग 11,000 बसों की आवश्यकता है।
क्या सीएनजी बसें पूरी तरह बंद हो जाएंगी?
नहीं, लेकिन सरकार अब नई सीएनजी बसें नहीं खरीद रही है; फोकस केवल इलेक्ट्रिक बसों पर है।
इलेक्ट्रिक बसों को लेकर क्या समस्या है?
सबसे बड़ी समस्या बसों की डिलीवरी में देरी और चार्जिंग स्टेशनों (डिपो) के लिए ज़मीन की कमी है।
सरकार का अगला कदम क्या है?
सरकार मल्टी-लेवल बस पार्किंग और नए इलेक्ट्रिक बस डिपो बनाकर बेड़े को बढ़ाने की कोशिश कर रही है।

