सौर ऊर्जा को आज पर्यावरण के लिए सबसे सुरक्षित और भरोसेमंद विकल्प माना जा रहा है। देश के कोने-कोने में सोलर पार्क बन रहे हैं, घरों की छतों पर पैनल लगाए जा रहे हैं और सरकारें इसे भविष्य की ऊर्जा बताकर बढ़ावा दे रही हैं। साफ हवा, कम प्रदूषण और ऊर्जा आत्मनिर्भरता जैसे फायदे अपनी जगह महत्वपूर्ण हैं, लेकिन इस उजले चित्र के पीछे एक ऐसा सवाल छुपा है, जिस पर अभी बहुत कम चर्चा हो रही है जब ये सोलर पैनल काम करना बंद कर देंगे, तब उनका क्या होगा?
- विशेषज्ञों की चेतावनी: केवल उत्पादन नहीं, निपटान की भी जिम्मेदारी
- सोलर पैनलों की उम्र और उनसे पैदा होने वाला संभावित खतरा
- भारत में बढ़ती सौर क्षमता और बढ़ती चुनौती
- समाधान नीति, जवाबदेही और तकनीक में निहित
- रीसाइक्लिंग: समस्या नहीं, एक बड़ा अवसर
- टिकाऊ ऊर्जा का अर्थ: उत्पादन से लेकर निपटान तक ज़िम्मेदारी
- नीति और नियम: ई-वेस्ट फ्रेमवर्क में सोलर पैनलों की स्थिति
विशेषज्ञों की चेतावनी: केवल उत्पादन नहीं, निपटान की भी जिम्मेदारी
पर्यावरण विशेषज्ञ इसी चिंता की ओर ध्यान आकर्षित करते हैं। उनका कहना है कि जो कंपनियां सौर ऊर्जा से मुनाफा कमा रही हैं, उनकी जिम्मेदारी केवल बिजली उत्पादन तक सीमित नहीं होनी चाहिए। पैनलों के उपयोग-काल के बाद उनके सुरक्षित निपटान और रीसाइक्लिंग की व्यवस्था भी उन्हीं की जवाबदेही बननी चाहिए। वे चेतावनी देते हैं कि यदि आज सही पुनर्चक्रण प्रणाली विकसित नहीं की गई, तो स्वच्छ ऊर्जा का यह विकल्प भविष्य में बड़े पैमाने पर कचरे और प्रदूषण का कारण बन सकता है।
सोलर पैनलों की उम्र और उनसे पैदा होने वाला संभावित खतरा
सोलर पैनलों की औसत उम्र लगभग 20-25 वर्ष मानी जाती है। इसके बाद उनकी क्षमता घटने लगती है और वे बेकार हो जाते हैं। देखने में भले ही ये कांच और धातु जैसे साधारण लगते हों, लेकिन इनके भीतर मौजूद रसायन और धातुएँ पर्यावरण के लिए हानिकारक हो सकती हैं। यदि इन्हें खुले में फेंका जाए या बिना वैज्ञानिक प्रक्रिया के तोड़ा जाए, तो इससे मिट्टी और भूमिगत जल प्रदूषित होने का खतरा बढ़ जाता है।
भारत में बढ़ती सौर क्षमता और बढ़ती चुनौती
भारत जैसे देश में, जहाँ सौर ऊर्जा का विस्तार तेज़ी से हो रहा है, आने वाले वर्षों में बड़ी संख्या में खराब और निष्क्रिय पैनल सामने आने वाले हैं। फिलहाल न तो इनके लिए ठोस संग्रहण व्यवस्था है और न पर्याप्त रीसाइक्लिंग यूनिट्स। अधिकतर जगहों पर ई-वेस्ट प्रबंधन की बात तो होती है, लेकिन सोलर पैनलों को अलग श्रेणी के कचरे के रूप में देखे जाने की आवश्यकता अब भी उपेक्षित है।
समाधान नीति, जवाबदेही और तकनीक में निहित
विशेषज्ञों का मानना है कि समाधान नीतिगत स्पष्टता और संस्थागत जिम्मेदारी में छुपा है। सोलर पैनल निर्माता कंपनियों और प्रोजेक्ट डेवलपर्स पर यह अनिवार्य किया जाना चाहिए कि वे उपयोग-के-बाद पैनलों को वापस लें और उनका सुरक्षित पुनर्चक्रण सुनिश्चित करें। इसके साथ ही सरकार को स्पष्ट नियम, ट्रैकिंग व्यवस्था और निगरानी तंत्र विकसित करना होगा, ताकि यह जिम्मेदारी केवल कागज़ों तक सीमित न रहे।
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रीसाइक्लिंग: समस्या नहीं, एक बड़ा अवसर
यह चुनौती केवल समस्या नहीं, बल्कि एक अवसर भी है। सोलर पैनल रीसाइक्लिंग से कांच, सिलिकॉन और धातुओं को दोबारा इस्तेमाल किया जा सकता है। इससे प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव कम होगा और नए रोजगार के रास्ते भी खुलेंगे। सही तकनीक और निवेश के साथ यह एक नया हरित उद्योग बन सकता है।
कुल मिलाकर, सौर ऊर्जा को सच में टिकाऊ बनाना है तो उसकी पूरी जीवन यात्रा पर ध्यान देना होगा। उत्पादन से लेकर उपयोग और उपयोग के बाद के चरण तक। समय रहते यदि संग्रहण और रीसाइक्लिंग को गंभीरता से नहीं अपनाया गया, तो आज की हरित ऊर्जा कल के लिए पर्यावरणीय बोझ बन सकती है। इसलिए जरूरी है कि सौर ऊर्जा की कहानी सिर्फ रोशनी तक न रुके, बल्कि जिम्मेदारी तक पहुंचे।

इमेज सोर्स : हिंदुस्तान टाइम्स
टिकाऊ ऊर्जा का अर्थ: उत्पादन से लेकर निपटान तक ज़िम्मेदारी
कुल मिलाकर, सौर ऊर्जा को वास्तव में टिकाऊ बनाना है तो उसकी पूरी जीवन यात्रा पर ध्यान देना होगा उत्पादन से लेकर उपयोग और उपयोग के बाद के चरण तक। यदि समय रहते संग्रहण और रीसाइक्लिंग को प्राथमिकता नहीं दी गई, तो आज की हरित ऊर्जा कल के लिए पर्यावरणीय बोझबन सकती है। इसलिए आवश्यक है कि सौर ऊर्जा की कहानी केवल रोशनी तक न रुके, बल्कि जिम्मेदारी तक पहुँचे।
असल में सोलर पैनलों की औसत उम्र करीब 20 से 25 साल होती है। इसके बाद उनकी क्षमता घटने लगती है और वे बेकार माने जाते हैं। देखने में भले ही ये साधारण कांच और धातु जैसे लगें, लेकिन इनके भीतर कई ऐसे रसायन और धातुएं होती हैं जो पर्यावरण के लिए नुकसानदायक हो सकती हैं। अगर इन्हें खुले में फेंका जाए या बिना वैज्ञानिक प्रक्रिया के तोड़ा जाए, तो इससे जमीन और पानी दोनों प्रदूषित हो सकते हैं।
भारत जैसे देश में, जहां सौर ऊर्जा का विस्तार तेज़ी से हो रहा है, आने वाले वर्षों में बड़ी संख्या में खराब पैनल सामने आएंगे। फिलहाल समस्या यह है कि इनके लिए न तो कोई ठोस संग्रहण व्यवस्था है और न ही पर्याप्त रीसाइक्लिंग यूनिट्स। अधिकतर जगहों पर ई-वेस्ट प्रबंधन की बात होती है, लेकिन सोलर पैनलों को अलग श्रेणी में रखकर देखने की जरूरत अभी भी नजरअंदाज की जा रही है।
नीति और नियम: ई-वेस्ट फ्रेमवर्क में सोलर पैनलों की स्थिति
भारत में ई-वेस्ट प्रबंधन नियमों के तहत इलेक्ट्रॉनिक कचरे के लिए स्पष्ट दिशानिर्देश मौजूद हैं, लेकिन सोलर पैनलों को अभी भी अलग श्रेणी के रूप में पर्याप्त स्पष्टता नहीं मिली है। विशेषज्ञ मानते हैं कि सौर उपकरणों को केवल सामान्य ई-वेस्ट की परिभाषा में रखना पर्याप्त नहीं है, क्योंकि इनका आकार, संरचना और रीसाइक्लिंग प्रक्रिया अलग प्रकृति की होती है।
इसी संदर्भ में Extended Producer Responsibility (EPR) का सिद्धांत महत्वपूर्ण हो जाता है, जिसके तहत निर्माता और प्रोजेक्ट डेवलपर्स पर यह जिम्मेदारी तय की जानी चाहिए कि पैनलों के उपयोग-चक्र पूरा होने के बाद वे उन्हें वापस लें, सुरक्षित रूप से संग्रहित करें और वैज्ञानिक तरीक़े से पुनर्चक्रण कराएं। यदि EPR को सोलर सेक्टर में प्रभावी ढंग से लागू किया जाए, तो यह न केवल पर्यावरणीय जोखिम को कम करेगा, बल्कि सौर उद्योग को जिम्मेदार और टिकाऊ ऊर्जा मॉडल की दिशा में आगे बढ़ाएगा।

