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Home » केरल से केरलम: एक राज्य के नामकरण के संवैधानिक, भाषाई और राजनीतिक आयाम

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केरल से केरलम: एक राज्य के नामकरण के संवैधानिक, भाषाई और राजनीतिक आयाम

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Last updated: February 25, 2026 11:50 am
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केरल से केरलम
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24 फरवरी 2026 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने एक ऐतिहासिक और संवैधानिक फैसला लिया। सरकार ने केरल राज्य का नाम आधिकारिक तौर पर बदलकर “केरलम” (Keralam) करने के प्रस्ताव को अपनी मंजूरी दे दी। सूचना एवं प्रसारण मंत्री अश्विनी वैष्णव ने एक प्रेस वार्ता में इस महत्वपूर्ण प्रशासनिक फैसले की घोषणा की। यह कदम केवल एक भौगोलिक नाम बदलने तक सीमित नहीं है; बल्कि यह एक गहरे ऐतिहासिक आंदोलन का परिणाम है, जो मलयालम भाषी लोगों की भाषाई पहचान और भारत के सहकारी संघवाद (cooperative federalism) को दर्शाता है। संविधान के अनुच्छेद 3 (Article 3) के तहत इस लंबी मांग को मानकर, केंद्र सरकार ने स्थानीय संस्कृति का सम्मान किया है।

Contents
  • राज्य का नाम बदलने की संवैधानिक प्रक्रिया
    • अनुच्छेद 3 के तहत काम का तरीका
  • विधानसभा के प्रस्तावों का इतिहास: 2023 से 2024 तक
  • इतिहास, भाषा विज्ञान और ‘केरलम’ की जड़ें
    • चेरा राजवंश और नाम की उत्पत्ति
  • अंग्रेजी शासन और व्याकरण की कटौती
  • प्रशासनिक बदलाव और भारी आर्थिक लागत
  • राजनीतिक मायने और रणनीतिक समय
  • नाम का महत्व 
  • FAQs

यह लेख इस नाम परिवर्तन की प्रक्रिया और इसके प्रभावों का विस्तार से विश्लेषण करता है। हम इस बदलाव के संवैधानिक नियमों, राज्य विधानसभा के प्रस्तावों के इतिहास, प्राचीन भाषाई जड़ों, और इसके भारी आर्थिक और प्रशासनिक खर्चों को समझेंगे।

राज्य का नाम बदलने की संवैधानिक प्रक्रिया

भारत में किसी भी राज्य का नाम बदलने की प्रक्रिया एक सख्त संवैधानिक ढांचे के तहत काम करती है। यह प्रक्रिया संविधान के अनुच्छेद 3 (Article 3) द्वारा संचालित होती है, जो संसद को नए राज्य बनाने या मौजूदा राज्यों के नाम, क्षेत्र और सीमाएं बदलने का अधिकार देता है।

अनुच्छेद 3 के तहत काम का तरीका

आम विधेयकों (bills) के विपरीत, राज्य का नाम बदलने वाला विधेयक संसद के किसी भी सदन में राष्ट्रपति की पूर्व सिफारिश के बिना पेश नहीं किया जा सकता। यदि विधेयक किसी राज्य के नाम या सीमा को प्रभावित करता है, तो राष्ट्रपति को पहले उस ड्राफ्ट को संबंधित राज्य की विधानसभा में भेजना होता है। राज्य को एक तय समय के भीतर इस पर अपने विचार देने होते हैं।

24 फरवरी 2026 को कैबिनेट की मंजूरी के बाद, राष्ट्रपति आधिकारिक तौर पर “केरल (नाम परिवर्तन) विधेयक, 2026” को केरल विधानसभा में भेजेंगे। राज्य की राय प्राप्त होने के बाद, राष्ट्रपति की सिफारिश के साथ विधेयक संसद में प्रस्तुत किया जाएगा। संसद इसे साधारण बहुमत (simple majority) से पारित कर सकती है। संसद से पास होने और राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद, संविधान की पहली अनुसूची (First Schedule) में “केरल” की जगह “केरलम” लिख दिया जाएगा।

संवैधानिक कदमजिम्मेदार प्राधिकरणअनुच्छेद 3 के तहत आवश्यक कार्रवाई
शुरुआती प्रस्तावराज्य सरकार / विधानसभाराज्य विधानसभा में एक प्रस्ताव पारित कर केंद्र से नाम बदलने का अनुरोध करना।
कार्यकारी मंजूरीकेंद्रीय मंत्रिमंडलगृह और कानून मंत्रालयों के परामर्श के बाद प्रस्ताव की समीक्षा और मंजूरी।
राष्ट्रपति का संदर्भभारत के राष्ट्रपतिड्राफ्ट बिल को राज्य विधानसभा में भेजना ताकि तय समय में उनके विचार जाने जा सकें।
राज्य का विचार-विमर्शराज्य विधानसभाबिल पर अपनी औपचारिक राय व्यक्त करना और उसे केंद्र सरकार को वापस भेजना।
राष्ट्रपति की सिफारिशभारत के राष्ट्रपतिसंसद में बिल पेश करने के लिए औपचारिक अनुमति देना।
संसदीय प्रक्रियासंसद (लोकसभा और राज्यसभा)साधारण बहुमत से बिल पर बहस और उसे पारित करना।
अंतिम सहमतिभारत के राष्ट्रपतिबिल पर हस्ताक्षर करना, जिससे वह कानून बन जाए और संविधान की पहली अनुसूची में संशोधन हो।

विधानसभा के प्रस्तावों का इतिहास: 2023 से 2024 तक

यह मंजूरी केरल राज्य विधानसभा के लगातार प्रयासों का परिणाम है। इस बदलाव को हासिल करने के लिए राज्य को दो अलग-अलग प्रस्ताव पारित करने पड़े, क्योंकि तकनीकी आवश्यकताओं को समझना एक सीखने की प्रक्रिया थी।

  • पहला प्रयास (अगस्त 2023): 9 अगस्त 2023 को मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन ने विधानसभा में पहला प्रस्ताव पेश किया। इस प्रस्ताव में मांग की गई कि संविधान की पहली अनुसूची के साथ-साथ आठवीं अनुसूची (Eighth Schedule) में शामिल सभी भाषाओं में राज्य का नाम “केरलम” कर दिया जाए। गृह मंत्रालय ने इस प्रस्ताव को वापस कर दिया, क्योंकि सभी भाषाओं में संशोधन की मांग कानूनी और तकनीकी रूप से गलत थी।
  • प्रक्रिया में सुधार (जून 2024): केंद्र के निर्देश के बाद, 24 जून 2024 को मुख्यमंत्री विजयन ने एक नया, सुधरा हुआ प्रस्ताव पेश किया। यह प्रस्ताव केवल अनुच्छेद 3 के तहत पहली अनुसूची में संशोधन की मांग पर केंद्रित था। इस दौरान, इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (IUML) के विधायक एन. शमसुद्दीन ने पिछली गलती के लिए सरकार की आलोचना की, लेकिन अंततः यह प्रस्ताव यूडीएफ विपक्ष के पूरे समर्थन के साथ सर्वसम्मति से पारित हो गया।

इतिहास, भाषा विज्ञान और ‘केरलम’ की जड़ें

“केरल” से “केरलम” में बदलने की मांग कोई आधुनिक राजनीतिक विचार नहीं है। यह क्षेत्र की भाषाई विरासत और ऐतिहासिक निरंतरता को बहाल करने का एक प्रयास है।

चेरा राजवंश और नाम की उत्पत्ति

इतिहासकारों और भाषाविदों का मानना है कि “केरलम” शब्द प्राचीन “चेरलम” (Cheralam) से निकला है। यहाँ “चेर” का अर्थ है ‘जुड़ना’ और “अलम” का अर्थ है ‘भूमि’। समय के साथ बोलचाल में यह शब्द ‘चेरलम’ से बदलकर ‘केरलम’ हो गया। प्रसिद्ध जर्मन विद्वान हरमन गुंडर्ट (Hermann Gundert) ने भी माना था कि “केरम” और “चेरम” शब्द एक ही हैं। सबसे पुराना लिखित प्रमाण मौर्य सम्राट अशोक के शिलालेख (257 ईसा पूर्व) में मिलता है, जहाँ उन्होंने एक शक्तिशाली दक्षिणी शासक को “केरलपुत्र” कहा था। लोककथाओं में अक्सर इसे नारियल के पेड़ (केरा) से जोड़ा जाता है, लेकिन इतिहासकार इसे वैज्ञानिक उत्पत्ति नहीं मानते।

Also Read: Kerala To Be Renamed ‘Keralam’: Union Cabinet Approves Proposal Ahead Of Assembly Polls

अंग्रेजी शासन और व्याकरण की कटौती

मलयालम और अन्य द्रविड़ भाषाओं में, भौगोलिक स्थानों के नाम आमतौर पर “-अम” (-am) प्रत्यय (suffix) के साथ समाप्त होते हैं, जो पूर्णता को दर्शाता है (जैसे: தமிழகம் – तमिलाकम, केरलम)। अंग्रेजों ने अपनी सुविधा के लिए इन शब्दों से अंतिम स्वर हटा दिया, जैसे ‘रामम’ को ‘राम’ कर दिया गया। इसी तरह ‘केरलम’ को छोटा करके ‘केरल’ (Kerala) कर दिया गया।

प्रशासनिक बदलाव और भारी आर्थिक लागत

यद्यपि यह बदलाव सांस्कृतिक रूप से समृद्ध है, लेकिन लगभग 3.4 करोड़ की आबादी वाले इस राज्य का नाम बदलना एक अत्यंत जटिल और महंगा काम है।

आर्थिक विशेषज्ञों के अनुसार, किसी बड़े राज्य का नाम बदलने में सरकारी और निजी क्षेत्रों को मिलाकर लगभग ₹200 करोड़ से ₹500 करोड़ तक का खर्च आ सकता है। उदाहरण के लिए, इलाहाबाद का नाम प्रयागराज करने में ही ₹300 करोड़ से अधिक का खर्च आया था।

प्रशासनिक बदलाव के मुख्य क्षेत्र:

  • कानूनी और संवैधानिक कागजात: सभी सरकारी राजपत्रों, उच्च न्यायालय के दस्तावेजों और कानूनों में नाम बदलना होगा।
  • नक्शे और भू-रिकॉर्ड: सर्वे ऑफ इंडिया और राज्य के योजना बोर्ड को अपने सभी नक्शों और डिजिटल डेटाबेस को अपडेट करना होगा।
  • सार्वजनिक बुनियादी ढांचा: राज्य भर में सड़क के साइनेज, हाईवे मार्कर और बस ट्रांसपोर्ट की ब्रांडिंग को बदलना एक बड़ा खर्च होगा।
  • रेलवे और विमानन: रेलवे स्टेशनों के बोर्ड, टिकट सॉफ्टवेयर और हवाई अड्डों की ब्रांडिंग बदलनी होगी।
  • नागरिक पहचान पत्र: आधार कार्ड, पासपोर्ट, वोटर आईडी और राशन कार्ड के डेटाबेस में बदलाव करना होगा।
  • निजी क्षेत्र: कंपनियों और छोटे व्यवसायों को अपनी ब्रांडिंग, वेबसाइट और बैंक डिटेल अपडेट करने में भारी खर्च उठाना पड़ेगा।

राजनीतिक मायने और रणनीतिक समय

2026 के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले कैबिनेट का यह फैसला एक बड़ी राजनीतिक रणनीति का हिस्सा है।

भाजपा की ‘एक्ट साउथ’ रणनीति:

भाजपा लंबे समय से केरल में अपना जनाधार बढ़ाने की कोशिश कर रही है। 2024 के आम चुनावों में राज्य में अपनी पहली लोकसभा सीट जीतने के बाद, भाजपा अब खुद को क्षेत्रीय संस्कृति के समर्थक के रूप में पेश कर रही है। इस मांग को मानकर केंद्र सरकार ने ‘हिंदी थोपने’ के आरोपों को कमजोर कर दिया है। गृह मंत्री अमित शाह अक्सर कहते हैं कि हिंदी और क्षेत्रीय भाषाओं को एक साथ चलना चाहिए।

द्विदलीय सर्वसम्मति:

इस मुद्दे ने राज्य के सभी दलों को एक मंच पर ला दिया है। मुख्यमंत्री की पहल को कांग्रेस का पूरा समर्थन मिला, और यहाँ तक कि राज्य भाजपा अध्यक्ष राजीव चंद्रशेखर ने भी पीएम मोदी को पत्र लिखकर इस कदम का स्वागत किया। चुनाव के दौरान, सभी दल इस सांस्कृतिक जीत का श्रेय लेने की कोशिश करेंगे।

नाम का महत्व 

केरल से ‘केरलम’ में नाम का बदलाव अपनी सही पहचान और सांस्कृतिक प्रतिनिधित्व की एक गहरी आवश्यकता को दर्शाता है। जिस तरह कोई भी राज्य या व्यक्ति अपने असली और सही नाम से पहचाना जाना चाहता है, ठीक यही नियम आध्यात्मिकता पर भी लागू होता है। इंसान कई अलग-अलग तरीकों से ईश्वर की पूजा करता है, लेकिन परमात्मा केवल उसी भक्ति को स्वीकार करता है जो उनके लिए सच्ची, प्रामाणिक और शाश्वत हो। इस पूरी धरती पर एक ‘तत्वदर्शी संत’ के अलावा कोई भी भगवान का सच्चा नाम नहीं दे सकता। आज के समय में संत रामपाल जी महाराज ही वह सच्चे तत्वदर्शी संत हैं, जो दुनिया को यह वास्तविक मार्ग दिखा रहे हैं।

इस जन्म-मृत्यु के चक्र और व्यवस्था से मुक्त होने का एकमात्र असली समाधान ‘पूर्ण परमात्मा कबीर’ की शरण लेना है। इस बात के पक्के और प्रामाणिक तथ्य आप ‘ज्ञान गंगा’ पुस्तक में खुद पढ़ सकते हैं। सच्चाई को गहराई से समझने के लिए आप jagatgururampalji.org पर जा सकते हैं, या आज ही ‘ज्ञान गंगा‘ और ‘जीने की राह‘ जैसी बेहतरीन पुस्तकें बिल्कुल मुफ्त (Free) घर बैठे ऑर्डर कर सकते हैं या पीडीएफ डाउनलोड कर सकते हैं।

FAQs

Q1. केंद्र सरकार ने केरल के नाम को लेकर क्या बड़ा फैसला लिया है? 

उत्तर: 24 फरवरी 2026 को केंद्र सरकार ने केरल का नाम आधिकारिक रूप से बदलकर “केरलम” (Keralam) करने के प्रस्ताव को अपनी मंजूरी दे दी है। यह सिर्फ एक नाम का बदलाव नहीं है, बल्कि मलयालम भाषी लोगों की अपनी भाषा और संस्कृति से जुड़ी एक बहुत पुरानी मांग का पूरा होना है।

Q2. भारत के संविधान में किसी राज्य का नाम बदलने की क्या प्रक्रिया है? 

उत्तर: किसी भी राज्य का नाम संविधान के अनुच्छेद 3 (Article 3) के तहत बदला जाता है। इसके लिए सबसे पहले राष्ट्रपति इस बदलाव के ड्राफ्ट बिल को राज्य की विधानसभा में उनकी राय जानने के लिए भेजते हैं। राज्य से जवाब आने के बाद, इस बिल को संसद में पेश किया जाता है। जब संसद इसे साधारण बहुमत (Simple Majority) से पास कर देती है और राष्ट्रपति उस पर हस्ताक्षर कर देते हैं, तब राज्य का नया नाम लागू हो जाता है।

Q3. केरल का नाम बदलकर ‘केरलम’ करने के पीछे क्या ऐतिहासिक कारण है? 

उत्तर: इतिहासकार मानते हैं कि “केरलम” शब्द प्राचीन चेरा राजवंश के “चेरलम” (Cheralam) शब्द से बना है, जिसका मतलब होता है ‘जुड़ी हुई भूमि’। मलयालम जैसी द्रविड़ भाषाओं में किसी जगह के नाम को पूरा करने के लिए अंत में “-अम” (-am) लगाया जाता है। अंग्रेजों ने अपनी सुविधा के लिए इस शब्द को छोटा करके “केरल” कर दिया था। अब उसी पुरानी और सही पहचान को वापस लाया जा रहा है।

Q4. केंद्र सरकार ने केरल विधानसभा का 2023 वाला पहला प्रस्ताव क्यों लौटा दिया था? 

उत्तर: अगस्त 2023 में पास किए गए पहले प्रस्ताव में राज्य ने मांग की थी कि संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल सभी भाषाओं में नाम बदला जाए। गृह मंत्रालय ने इसे लौटा दिया क्योंकि सभी भाषाओं में बदलाव मांगना तकनीकी और कानूनी रूप से गलत था। इसके बाद, जून 2024 में राज्य ने नया प्रस्ताव भेजा, जिसमें सिर्फ पहली अनुसूची (First Schedule) में बदलाव की सही मांग की गई थी।

Q5. राज्य का नाम बदलने से प्रशासन पर कितना आर्थिक बोझ पड़ेगा? उत्तर: 3.4 करोड़ की आबादी वाले इतने बड़े राज्य का नाम बदलना काफी महंगा काम है। विशेषज्ञों के अनुसार, इसमें ₹200 करोड़ से ₹500 करोड़ तक का भारी खर्च आ सकता है। यह पैसा सरकारी दस्तावेजों, आधार कार्ड, पासपोर्ट, रेलवे स्टेशनों, सड़क के साइनबोर्ड्स और सभी डिजिटल रिकॉर्ड्स में नया नाम अपडेट करने पर खर्च होगा।

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