आधुनिक जीवनशैली ने जीवन को सुविधाजनक जरूर बनाया है, लेकिन इसका असर पर्यावरण पर भी साफ दिख रहा है। जंगलों की कटाई और संसाधनों का अत्यधिक उपयोग, बढ़ता प्रदूषण, प्रकृति के लिए गंभीर चुनौती बन गए क्या विकास और प्रकृति संरक्षण के बीच संतुलन संभव है, यह आज का बड़ा सवाल है। जानें हमारे इस ब्लॉग में
आधुनिक जीवनशैली क्या है और यह कैसे बदली है?
आधुनिक जीवनशैली का मतलब है विज्ञान द्वारा दी गई तकनीक और सुविधाओं पर आधारित जीवन। आज लोग डिजिटल उपकरणों, मोबाइल फोन और इंटरनेट, एयर कंडीशनर, वाहनों, जैसी सुविधाओं के बिना जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकते। इन सुविधाओं ने जीवन को आसान और सुखदायक बनाया है, लेकिन इनके बढ़ते उपयोग से ऊर्जा की खपत और प्रदूषण भी तेजी से बढ़ता जा रहा है।
उपभोक्तावाद और बढ़ती जरूरतें
आज की जीवनशैली में उपभोक्तावाद यानी लोगों को अधिक से अधिक चीजें खरीदने पर जोर देना बहुत बढ़ गया है। लोग अधिक से अधिक वस्तुएं खरीदने और इस्तेमाल करने की ओर आकर्षित हो रहे हैं। नए-नए उत्पादों की मांग के कारण फैक्ट्रियों का विस्तार हो रहा है, जिससे प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक उपयोग हो रहा है। यह पर्यावरण की गंभीर स्थिति बन सकती है।इस समय फ़ास्ट फैशन का चलन जोरों पर हैं और विभिन्न प्रकार से कपड़ा उद्योग प्रदूषण में योगदान दे रहे हैं। प्लास्टिक के बिना एक दिन का गुज़रना असंभव हो गया है।यह सब प्रकृति के दोहन के लिए जिम्मेदार है।
आधुनिक जीवनशैली का पर्यावरण पर प्रभाव
प्रदूषण में लगातार वृद्धि
आधुनिक जीवनशैली के कारण जलवायु और भूमि प्रदूषण तेजी से बढ़ रहा है। वाहनों की संख्या में बढ़ोतरी, फैक्ट्रियों का धुआं और केमिकल वाला कचरा पर्यावरण को नुकसान पहुंचा रहा है। इससे न केवल प्रकृति प्रभावित हो रही है बल्कि मानव समाज पर भी बुरा असर पड़ रहा है।
प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक दोहन
फैक्ट्रियों के विस्तार और शहरीकरण के कारण प्राकृतिक संसाधनों का तेजी से उपयोग हो रहा है। खनन, जंगलों की कटाई और जल संसाधनों का अत्यधिक उपयोग पर्यावरण के संतुलन को बिगाड़ता जा रहा है। यदि इसी तरह संसाधनों का उपयोग करते रहे तो हमारी आने वाली पीढ़ियों के लिए संसाधनों की कमी हो सकती है।
प्लास्टिक और कचरे की बढ़ती समस्या
प्लास्टिक का सामान आधुनिक जीवनशैली का एक बड़ा हिस्सा बन गया है। रोजमर्रा की चीजों में प्लास्टिक का उपयोग बहुत ज्यादा बढ़ गया है। लेकिन प्लास्टिक आसानी से नष्ट नहीं होता इस वजह से यह मिट्टी, जल और समुद्री जीवों के लिए गंभीर खतरा बनता जा रहा है।
प्रकृति संरक्षण क्यों जरूरी है?
पर्यावरण संतुलन बनाए रखने में प्रकृति की भूमिका
प्रकृति ही है जो पृथ्वी पर जीवन को बनाए रखने के लिए बेहद महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है। जंगल, पहाड़, नदियां और समुद्र मिलकर पर्यावरण का संतुलन बनाए रखते हैं। यदि इनका संतुलन बिगड़ गया तो इसका प्रभाव पूरे मानव समाज पर पड़ता है। प्रकृति केवल मनुष्यों के लिए ही नहीं बल्कि पृथ्वी पर निवास करने वाले सभी जीव-जंतुओं के लिए है। जैव विविधता का संरक्षण पृथ्वी के पारिस्थितिक संतुलन को बनाए रखने में प्रकृति महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यदि जीव-जंतुओं और वनस्पतियों की प्रजातियां नष्ट होने लगेंगी तो इसका बुरा असर हमारे पर्यावरण तंत्र पर पड़ेगा।
आज के समय में विकास (devolopment )और पर्यावरण के बीच संतुलन बराबर बनाए रखना सबसे बड़ी चुनौती बन गया है। विकास जरूरी है क्योंकि इससे आर्थिक प्रगति और जीवन स्तर में अच्छा सुधार होता है। लेकिन यदि विकास पर्यावरण को क्षति पहुंचाकर किया जाए तो यह आने वाले समय में मानव जीवन के लिए ही खतरा बन सकता है। इसलिए जरूरी है कि विकास और प्रकृति संरक्षण के बीच बराबर संतुलन बनाया जाए।
प्रकृति को बचाने के लिए जरूरी कदम
- सतत विकास (Sustainable Development) को अपनाना
सतत विकास का अर्थ है ऐसा विकास जो वर्तमान की मांग को पूरा करे और आने वाली की पीढ़ियों के लिए संसाधनों को सुरक्षित रखे। इसके लिए पर्यावरण अनुकूल तकनीकों और संसाधनों के कम उपयोग को बढ़ावा देना जरूरी है।
- पर्यावरण अनुकूल जीवनशैली को बढ़ावा देना
समाज के लोग यदि अपनी जीवनशैली में छोटे-छोटे बदलाव करें तो पर्यावरण संरक्षण में बड़ा योगदान होगा। जैसे प्राकृतिक संसाधनों का सीमित उपयोग करना। सार्वजनिक परिवहन का उपयोग करना। ऊर्जा की बचत करना और
- प्लास्टिक उपयोग को कम करना और पुनर्चक्रण करना।
प्लास्टिक कचरे पुनर्चक्रण (Recycling) करना पर्यावरण संरक्षण के लिए सबसे आवश्यक कदम है। इससे प्रदूषण कम किया जा सकता है और प्राकृतिक संसाधनों की बचत होगी।
- समाज और सरकार की भूमिका प्रकृति संरक्षण में
प्रकृति संरक्षण की जिम्मेदारी मात्र सरकार की नहीं है, बल्कि यह पूरे मानव समाज की है। सरकार को सख्त पर्यावरण नीतियां बनानी चाहिए और फैक्ट्रियों को पर्यावरण के अनुकूल तकनीकों के आधार पर बनाएं। और हमें भी पर्यावरण के प्रति जागरूक और जिम्मेदार बनना होगा। अब समय आ चुका है जागने का कब तक सोते रहोगे। सतर्क और सजक हो जाओ।
- शिक्षा और जागरूकता से बदल सकती है स्थिति
पर्यावरण संरक्षण के प्रति लोगों में जागरूकता बढ़ाना अति आवश्यक है। पर्यावरण शिक्षा को स्कूल और कॉलेजों में बढ़ावा देना चाहिए ताकि आने वाली पीढ़ियां प्रकृति के महत्व को समझ सकें। जब लोगों में जागरूकता बढ़ेगी तो लोग स्वयं पर्यावरण संरक्षण की दिशा में ही कदम उठाएंगे।
क्षण में प्रकृति बदलने वाला महापुरुष
दुनिया में जो आज आज इतनी समस्याएं आ चुकी हैं जिसका कोई अंत नहीं भले ही पहले के समय में विकास नहीं था लेकिन लोग सुखी थे और अब विकास है लेकिन लोग सुखी नहीं है पहले के लोग समझदार थे भगवान से डरने वाले थे उन्होंने कभी भी प्रकृति के साथ छेड़छाड़ नहीं की लेकिन वर्तमान के लोगों ने प्रकृति के साथ बहुत छेड़छाड़ कर चुके हैं और अब अंत की और जा चुके हैं क्योंकि प्रकृति बहुत बुरी स्थिति का सामान कर रही बुरी तरह स्थिति से जूझ रही हैं अब प्रकृति भी भगवान को पुकार रही है लोगों को भी भविष्य का डर सता रहा है कि प्रकृति के बिना आगे आने वाले समय में हमारा और हमारी पीढ़ियों का क्या होगा।
डरो नहीं लोगों खुद भगवान आ चुके हैं धरती पर अवतार लेके वो एक महापुरुषप के रूप विघमान हैं वो दुनिया का तारणहार । हमारी इस स्थिति को देखकर। दुनिया के हाहाकार को समाप्त करने आ चुके हैं जिनके विषय में विश्व की अनेकों भविष्यवक्ताओं की भविष्यवाणी हो रखी हैं लिखा है भगवान के भेजें हुए सायरन संत भगवान की शक्तियां प्राप्त होगा उनमें इतनी शक्ति है कि वो प्राकृतिक परिवर्तन भी कर सकते हैं एक पल में दुनिया बदल सकते हैं अर्थात् भगवान कुछ भी कर सकता है इसके विषय में गरीबदास जी महाराज ने कहा है कि
गरीब, चन्द सूर पानी पवन, धरनी धौल अकास। पांच तत्त हाजरि खड़े, खिजमतिदार खवास ।।78 ।।
गरीब, काल करम करै बदंगी, महाकाल अरदास। मन माया अरु धरमराय, सब सिर नाम उपास।।79।।
उस दुनिया के तारणहार धरती पर अवतार महापुरुष संत रामपाल जी महाराज जी को जानने के लिए देखें साधना टीवी चैनल प्रतिदिन शाम 7: 30 पर

