क्या आप अपना फोन चलाते हैं या फोन आपको चला रहा है? आज मोबाइल सिर्फ एक सुविधा नहीं, बल्कि एक ऐसी लत बन चुका है जिसने हमारी नींद, रिश्तों और सुकून पर कब्जा कर लिया है। जानिए कैसे यह ‘चमकती स्क्रीन’ चुपके से आपकी असली दुनिया को धुंधला कर रही है और कैसे आप इस डिजिटल जाल से अपनी आज़ादी वापस पा सकते हैं।
मोबाईल की लत: सुविधा से मजबूरी तक का सफर
आज के समय मोबाईल फोन हमरी जिंदगी का एक बहुत अहम हिस्सा बन गया है l सुबह उठने से लेकर रात को सोने तक, हम हर वक्त फोन का इस्तेमाल करते हैं l शुरुआत मे यह केवल बात करने ओर मैसेज भेजने के काम आता था, लेकिन अब यह हमारी आदत और जरूरत बन गया है l मोबाईल का हम पर इतना गहरा असर हो गया है की कई बार हमें पता नहीं चलता की हम मोबाईल का इस्तेमाल कर रहे हैं या मोबाईल हमे अपने हिसाब से चला रहा है l आसान शब्दों मे कहे तो यह मोबाईल पहले सिर्फ एक सुविधा थी, अब मजबूरी बन गया है l
नॉटिफिकेशन और अलगोरीदम: ध्यान पर कब्जा
जब भी फोन की लाइट जलती है यानि नॉटिफिकेशन आता है, तो हमारा ध्यान तुरंत फोन की तरफ चला जाता है l सोशल मीडिया और गेम वाले अप्प्स जानबूझकर हमे ऐसी चीजें दिखाते हैं जिससे हम ज्यादा समय फोन पर बिताएं l उनका बस एक ही मकसद होता है – हमें फोन से चिपकाए रखना l धीरे-धीरे हमें इसकी आदत पद जाती है l इसका नुकसान यह है की हब हम गहराई से सोच नहीं पाते, हमारा सब्र काम हो गया है और किसी एक काम पर देर यक ध्यान लगाना हमरे लिए दिन व दिन मुस्किल होता जा रहा है l
सोशल मीडिया और तुलना का जाल
सोशल मीडिया पर लोग अपनी जिंदगी को बहुत अच्छा और चमकदार दिखते है, लेकिन असलियत मे अक्सर इससे अलग ही होता है l हम यह समझ नहीं पाते ओर दूसरों की खुशिया ओर रहन-सहन देखकर अपनी तुलना उनसे करने लगते हैं l इससे आत्म-संतोष कम होता है और बेचैनी बढ़ती है l मोबाईल के जरिए यह तुलना 24*7 चलती रहती है, जिससे आमविश्वास पर असर पड़ता है l कई बार लोग अपनी असली जिंदगी से ज्यादा डिजिटल पहचान को असलियत से ज्यादा अहमियत देने लगते है, जो मानसिक दबाव और तनाव को जन्म देता है l
रिश्तों पर असर: साथ होते हुए भी दूर
मोबाईल का असली काम तो लोगों को एक-दूसरे से जोड़ना था, लेकिन असलियत मे इसने लोगों के बीच दूरियाँ बढ़ा दी हैं l अब परिवार के साथ बेठे होने पर भी सब अपने-अपने फोन मे ही खोए रहते है l इससे आपस मे बातचीत और दिलों का जुड़ाव कम होता जा रहा है l दोस्तों से मिलने पर भी उस पल का मजा लेने के बजाय फोटो खिचने और स्टैटस/स्टोरी लगाने को ज्यादा जरूरी समझते हैं l फोन मे हर वक्त बीजी रहने की बजह से अब रिश्तों मे वो पहले जैसी गहराई और समझ नहीं बची है l
काम, पढ़ाई और प्रोडक्टिविटी पर प्रभाव
मोबाईल ने काम और पढ़ाई को आसान तो बनाया है, लेकिन इसका बोहट ज्यादा इस्तेमाल उलट नुसकसान भी करता है l बार-बार फोन चेक करने की आदत से हमारा ध्यान काम से हट जाता है और काम करने की रफ्तार कम हो जाती है l हम सोचते है एक समय पर कई काम का लेंगे, लेकिन इससे काम न तो पूरा होता है और न ही अच्छा l स्टूडेंट्स के लिए तो यह ध्यान भटकाने वाली सबसे बड़ी चीज है, क्योंकि पढ़ाई के वक्त वे सोशल मीडिया और गेम्स मे अपना समय बर्बाद कर देते है l
नींद, स्वास्थ्य और जीवनशैली मे बदलाव
आजकल रात को सोने से पहले फोन देखना सबकी आदत बन गई है l फोन की स्क्रीन से ब्लू लाइट निकलती है, वह हमारी नींद खराब करती है। जिससे हमें ठीक से नींद नहीं आती और दिन भर थकान रहती है l लगातार फोन देखने से आँखों मे जलन, सिरदर्द और गर्दन मे दर्द जैसी परेशानियाँ होने लगती हैं l फोन के चक्कर मे हम चलना-फिरना कम कर देते हैं, जिससे मोटापा ने हमरे रहन-सहन को इतना बदल दिया है की अब हम अपनी सेहत और आराम पर ध्यान ही नहीं देते l
डिजिटल आदतों और नियंत्रण की जरूरत
मोबाईल खुद खराब चीज नहीं है, लेकिन इसका हद से ज्यादा उपयोग हमारी जिंदगी को अपने काबू मे कर लेता है l आज से समय मे यह जरूरी है की हम फोन का सही और ओर जरूरत पर ही इस्तेमाल करें, फालतू नॉटिफिकेशन बंद रखें और बीच-बीच में फोन से दूरी (Digital Break) बनाए रखें। हमें यह समझना होगा कि मोबाइल हमारी मदद के लिए बना एक साधन (Tool) है, हमारा मालिक नहीं। जब हम यह बात समझ जाएंगे, तभी हम अपने समय, रिश्तों और मानसिक शांति को वापस पा सकेंगे।”
आसान शब्दों में: मोबाइल एक मशीन है, इसे हमें चलाना चाहिए, न कि इसे हमें। जब हम फोन पर कंट्रोल पा लेंगे, तभी हमारी ज़िंदगी फिर से सुलझ पाएगी।
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अध्यात्म और तकनीक: परमात्मा की देन का सही उपयोग
संत रामपाल जी महाराज अपने सत्संगों में बताते हैं कि विज्ञान और तकनीक (जैसे मोबाइल, कंप्यूटर, इंटरनेट) परमात्मा की ही देन है। भगवान ने ही वैज्ञानिकों को बुद्धि दी है ताकि वे ऐसी सुविधाएँ बना सकें जिससे इंसान का शारीरिक परिश्रम कम हो और उसके काम जल्दी पूरे हो जाएं।
इसका मुख्य उद्देश्य यह था कि काम से जो समय बचे, उस समय को इंसान अपने मनुष्य जीवन के मूल उद्देश्य यानी परमात्मा की भक्ति और सत्संग सुनने में लगा सके। लेकिन आज इंसान इसका उल्टा कर रहा है। जिस कीमती समय को भक्ति में लगाकर मोक्ष पाना था, उसे लोग मोबाइल पर सिनेमा, रील और गेम में बर्बाद कर रहे हैं। यह एक तरह से “काल का जाल” है। हमें यह समझना होगा कि यह तकनीक हमें सत्संग सुनने और ज्ञान का प्रचार करने के लिए मिली है, न कि विषय-विकारों में फंसकर अपना अनमोल जीवन नष्ट करने के लिए।
इसलिए, मोबाइल का सदुपयोग (Good Use) करें, दुरुपयोग नहीं। अधिक जानकारी के लिए Google Play Store से Sant Rampal Ji Maharaj App Downlaod करें l

