आधुनिक डिजिटल युग में जहां स्मार्टफोन, टैबलेट और लैपटॉप पर लिखना आम हो गया है, वहीं रिसर्च बताती है कि कीबोर्ड पर टाइप करने की तुलना में हाथ से लिखने से दिमाग ज़्यादा एक्टिव होता है और चीज़ें लंबे समय तक याद रहती हैं। जब हम हाथ से लिखते हैं, तो दिमाग को एक साथ कई काम करने पड़ते हैं, अक्षर की शेप बनाना, पेन को कंट्रोल करना, आंखों से शब्द देखना और सोचकर लिखना।
- टाइपिंग की तुलना में हाथ से लिखना दिमाग को ज़्यादा एक्टिव रखता है, से संबंधित मुख्य बिंदु:
- डिजिटल दौर में क्यों छूटता जा रहा है हाथ से लिखना, और क्यों है यह दिमाग के लिए ज़रूरी
- हाथ से लिखना क्यों बनाता है दिमाग को ज़्यादा तेज? नॉर्वे में हुए शोध से पता चला
- हाथ से लिखना क्यों ज़रूरी है? रिसर्च बताती है दिमाग पर गहरा असर
- टाइपिंग की तुलना में हाथ से लिखना दिमाग को ज़्यादा एक्टिव रखता है से संबंधित मुख्य FAQs
इससे दिमाग के अलग-अलग हिस्से एक साथ काम करते हैं, जिससे याददाश्त मज़बूत होती है और समझने की क्षमता बढ़ती है। वहीं, कीबोर्ड पर टाइप करते समय उंगलियां बस बटन दबाती हैं। इसमें दिमाग की भागीदारी कम होती है, इसलिए जानकारी जल्दी भूलने की संभावना ज़्यादा रहती है। यही वजह है कि हाथ से नोट्स बनाने वाले छात्र चीजों को बेहतर समझते और ज़्यादा समय तक याद रखते हैं।
टाइपिंग की तुलना में हाथ से लिखना दिमाग को ज़्यादा एक्टिव रखता है, से संबंधित मुख्य बिंदु:
- हाथ से लिखते समय दिमाग के कई हिस्से एक साथ सक्रिय होते हैं
- टाइपिंग की तुलना में हाथ से लिखने में मेमोरी रिकॉल बेहतर होता है
- रिसर्च में EEG से मस्तिष्क कनेक्टिविटी मापी जाती है।
- हाथ से लिखने पर ब्रेन कनेक्टिविटी ज्यादा तेज होती है।
- टैबलेट पर पढ़ने वाले बच्चों को ‘B’ और ‘D’ जैसे अक्षरों में भ्रम हो सकता है
- सीखने और समझने के लिए हाथ से लिखना ज़्यादा असरदार होता है।
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डिजिटल दौर में क्यों छूटता जा रहा है हाथ से लिखना, और क्यों है यह दिमाग के लिए ज़रूरी
ऑनलाइन पढ़ाई के ज़माने में हाथ से लिखना जैसे लोग धीरे-धीरे भूलते जा रहे हैं। अब तक स्कूलों में ही लिखने की प्रक्रिया किसी तरह बची हुई है, क्योंकि वहाँ पढ़ाई का एक हिस्सा अभी भी कॉपी-किताब पर आधारित है। लेकिन स्कूलों में भी अब डिजिटल पढ़ाई पर ज़्यादा ध्यान दिया जा रहा है।
आम ज़िंदगी में लोग लिखने के बजाय मोबाइल पर टाइप करना या कीबोर्ड का इस्तेमाल करना ज़्यादा पसंद करने लगे हैं। नोट्स हों, मैसेज हों या काम से जुड़ी बातें सब कुछ अब स्क्रीन पर ही हो रहा है।
इसी बीच एक अध्ययन में यह खुलासा हुआ है कि दिमाग की कनेक्टिविटी कैसे बढ़ाई जा सकती है। अध्ययन के अनुसार, अगर आप मस्तिष्क की कनेक्टिविटी को बेहतर बनाना चाहते हैं, तो कीबोर्ड पर टाइप करने के बजाय हाथ से लिखने की आदत डालें।
हालाँकि कीबोर्ड का इस्तेमाल इसलिए ज़्यादा किया जाता है क्योंकि यह हाथ से लिखने की तुलना में तेज़ होता है। लेकिन शोध में यह भी पाया गया है कि हाथ से लिखने से स्पेलिंग की सटीकता बढ़ती है और याददाश्त (मेमोरी रिकॉल) बेहतर होती है। यही वजह है कि सीखने और समझने के लिए हाथ से लिखना आज भी बेहद फायदेमंद माना जाता है।

हाथ से लिखना क्यों बनाता है दिमाग को ज़्यादा तेज? नॉर्वे में हुए शोध से पता चला
नॉर्वे में शोधकर्ताओं ने यह पता लगाने के लिए अध्ययन किया कि क्या हाथ से अक्षर लिखने की प्रक्रिया से दिमाग में ज़्यादा कनेक्टिविटी बनती है। इसके लिए उन्होंने लेखन के दोनों तरीकों हाथ से लिखने और कीबोर्ड पर टाइप करने में शामिल अंतर्निहित तंत्रिका (नसों के) नेटवर्क की जांच की।
नॉर्वेजियन यूनिवर्सिटी ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी की मस्तिष्क शोधकर्ता प्रोफेसर ऑड्रे वैन डेर मीर ने कहा,
“हम देखते हैं कि हाथ से लिखते समय मस्तिष्क की कनेक्टिविटी के पैटर्न, कीबोर्ड पर टाइप करने की तुलना में कहीं अधिक जटिल होते हैं।”
“इस तरह की व्यापक मस्तिष्क कनेक्टिविटी को मेमोरी फॉर्मेशन और नई जानकारी को एन्कोड करने के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। इसलिए यह सीखने की प्रक्रिया के लिए ज़्यादा फायदेमंद है।”
फ्रंटियर्स इन साइकोलॉजी जर्नल में प्रकाशित इस अध्ययन में शोध टीम ने 36 विश्वविद्यालयी छात्रों से ईईजी डेटा एकत्र किया। इन छात्रों को स्क्रीन पर बार-बार दिखाई देने वाले शब्दों को कभी हाथ से लिखने और कभी कीबोर्ड पर टाइप करने के लिए कहा गया था।
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हाथ से लिखना क्यों ज़रूरी है? रिसर्च बताती है दिमाग पर गहरा असर
लिखते समय प्रतिभागी टचस्क्रीन पर सीधे कर्सिव में लिखने के लिए डिजिटल पेन का इस्तेमाल कर रहे थे। वहीं, टाइप करते समय वे कीबोर्ड की ‘की’ दबाने के लिए सिर्फ एक उंगली का उपयोग कर रहे थे।
इस अध्ययन में हाई-डेंसिटी ईईजी तकनीक का उपयोग किया गया। इसके तहत सिर पर जाल की तरह पहनाई गई कैप में लगे 256 छोटे सेंसरों के ज़रिए मस्तिष्क की विद्युत गतिविधि को मापा गया। हर संकेत को पाँच सेकंड तक रिकॉर्ड किया गया।
फ्रंटियर्स इन साइकोलॉजी जर्नल में प्रकाशित नतीजों से पता चला कि जब प्रतिभागियों ने हाथ से लिखा, तो मस्तिष्क के अलग-अलग हिस्सों के बीच कनेक्टिविटी बढ़ गई। लेकिन टाइप करने के दौरान ऐसा असर देखने को नहीं मिला।
शोध से यह भी संकेत मिलता है कि जो बच्चे टैबलेट पर लिखना और पढ़ना सीखते हैं, उन्हें उन अक्षरों में फर्क करने में परेशानी हो सकती है जो एक-दूसरे की दर्पण छवि जैसे होते हैं, जैसे ‘बी’ और ‘डी’।
मस्तिष्क शोधकर्ता प्रोफेसर ने कहा,
“बच्चों ने वास्तव में अपने शरीर के साथ यह महसूस ही नहीं किया कि इन अक्षरों को बनाना कैसा लगता है।”
टाइपिंग की तुलना में हाथ से लिखना दिमाग को ज़्यादा एक्टिव रखता है से संबंधित मुख्य FAQs
Q1. हाथ से लिखने से दिमाग ज़्यादा एक्टिव क्यों होता है?
हाथ से लिखते समय दिमाग को अक्षरों की बनावट, हाथ की मूवमेंट, आंखों का तालमेल और सोच सब कुछ एक साथ संभालना पड़ता है। इससे दिमाग के कई हिस्से एक साथ सक्रिय हो जाते हैं।
Q2. क्या कीबोर्ड पर टाइप करना सीखने के लिए नुकसानदेह है?
टाइपिंग में दिमाग की भागीदारी सीमित होती है। इसलिए सीखने और याद रखने के लिए हाथ से लिखने जितना प्रभावी नहीं माना जाता।
Q3. EEG क्या है और इसका उपयोग क्यों किया गया?
EEG एक तकनीक है जिससे दिमाग की विद्युत गतिविधि मापी जाती है। इसका उपयोग यह देखने के लिए किया गया कि लिखते समय दिमाग के कौन-कौन से हिस्से सक्रिय होते हैं।
Q4. रिसर्च में हाथ से लिखने पर क्या खास फर्क देखा गया?
हाथ से लिखने पर दिमाग के अलग-अलग हिस्सों के बीच कनेक्टिविटी बढ़ी, जबकि टाइप करने पर ऐसा स्पष्ट रूप से नहीं दिखा।
5. बच्चों के लिए हाथ से लिखना क्यों ज़्यादा ज़रूरी है?
क्योंकि इससे बच्चे अक्षरों की बनावट को बेहतर समझते हैं और ‘B’ व ‘D’ जैसे मिलते-जुलते अक्षरों में भ्रम कम होता है।

