SA NewsSA NewsSA News
  • Home
  • Business
  • Educational
  • Events
  • Fact Check
  • Health
  • History
  • Politics
  • Sports
  • Tech
Notification Show More
Font ResizerAa
Font ResizerAa
SA NewsSA News
  • Home
  • Business
  • Politics
  • Educational
  • Tech
  • History
  • Events
  • Home
  • Business
  • Educational
  • Events
  • Fact Check
  • Health
  • History
  • Politics
  • Sports
  • Tech
Follow US
© 2024 SA News. All Rights Reserved.

Home » भारतीय शिक्षा नीति का विकास: अतीत से वर्तमान तक

Educational

भारतीय शिक्षा नीति का विकास: अतीत से वर्तमान तक

SA News
Last updated: December 30, 2025 2:21 pm
SA News
Share
भारतीय शिक्षा नीति का विकास: अतीत से वर्तमान तक
SHARE

शिक्षा किसी भी राष्ट्र के सर्वांगीण विकास की आधारशिला होती है। यह न केवल ज्ञान अर्जन का माध्यम है, बल्कि व्यक्ति के चरित्र, सोच, नैतिक मूल्यों और सामाजिक चेतना के निर्माण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। भारत जैसी प्राचीन और समृद्ध सभ्यता में शिक्षा को सदैव उच्च स्थान प्राप्त रहा है। यहाँ शिक्षा का उद्देश्य केवल जीविकोपार्जन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि जीवन को सार्थक बनाने, आत्मबोध विकसित करने और समाज के प्रति उत्तरदायित्व निभाने की प्रेरणा देना भी रहा है।

Contents
  • प्राचीन भारत में शिक्षा व्यवस्था 
  • मध्यकालीन भारत में शिक्षा प्रणाली:
  • ब्रिटिश काल में शिक्षा नीति का विकास:
  • 1986 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति: समावेशी सुधारों की नई दिशा
  • वर्तमान शिक्षा नीतियाँ और उनका प्रभाव
  • ज्ञान से आत्मा तक: शिक्षा का सर्वोच्च योगदान

बदलते वैश्विक परिदृश्य, वैज्ञानिक प्रगति, तकनीकी विकास और सामाजिक आवश्यकताओं ने भारतीय शिक्षा नीतियों को समय-समय पर पुनःपरिभाषित करने की आवश्यकता उत्पन्न की। इसी क्रम में विभिन्न शिक्षा आयोगों और राष्ट्रीय शिक्षा नीतियों का निर्माण हुआ, जिनका उद्देश्य गुणवत्तापूर्ण, समावेशी और व्यावहारिक शिक्षा प्रदान कर मानव संसाधन का विकास करना रहा है। आज के युग में भारतीय शिक्षा नीति पारंपरिक मूल्यों और आधुनिक तकनीक के समन्वय के माध्यम से एक ऐसी शिक्षा व्यवस्था स्थापित करने की दिशा में अग्रसर है, जो विद्यार्थियों को न केवल ज्ञानवान बल्कि सक्षम, संवेदनशील और आत्मनिर्भर नागरिक बना सके।

इस प्रकार, भारतीय शिक्षा नीति का विकास अतीत की गौरवशाली परंपराओं से लेकर वर्तमान की आधुनिक, नवाचार-प्रधान और तकनीक-आधारित शिक्षा व्यवस्था तक की एक निरंतर और गतिशील यात्रा को प्रतिबिंबित करता है।

मुख्य बिंदु:

  • शिक्षा राष्ट्र के विकास की आधारशिला है और यह ज्ञान, चरित्र और सामाजिक चेतना विकसित करती है।
  •  प्राचीन भारत में गुरुकुल प्रणाली के माध्यम से सर्वांगीण विकास और जीवन मूल्यों की शिक्षा दी जाती थी।
  • मध्यकाल में मकतब और मदरसे अरबी, फ़ारसी, धर्मशास्त्र और विज्ञान पढ़ाते थे, लेकिन केवल सीमित वर्ग के लिए।
  •  ब्रिटिश काल में मैकाले मिनट और वुड्स डिस्पैच ने अंग्रेज़ी और पाश्चात्य शिक्षा को बढ़ावा दिया।
  • स्वतंत्र भारत में राधाकृष्णन आयोग (1948–49) और 1968 की नीति ने समान अवसर और वैज्ञानिक दृष्टिकोण पर जोर दिया।
  • 1986 की शिक्षा नीति ने समावेशी, रोजगारोन्मुख और महिला व वंचित वर्गों की शिक्षा पर ध्यान दिया।
  • नई शिक्षा नीति 2020 ने 5+3+3+4 संरचना, मातृभाषा शिक्षा, कौशल और डिजिटल शिक्षा अपनाई।
  •  इन नीतियों ने शिक्षा को ज्ञान के साथ सामाजिक न्याय और भविष्य-उन्मुख सोच से जोड़ा।
  • प्रभावी क्रियान्वयन से शिक्षा भारत को ज्ञान-आधारित और आत्मनिर्भर राष्ट्र बनाने में मदद करेगी।
  • आध्यात्मिक विकास के लिए शिक्षा बहुत अनमोल रत्न है।शिक्षा को हम आत्मिक ऊंचाइयों की कुंजी भी कह सकते हैं।

प्राचीन भारत में शिक्षा व्यवस्था 

प्राचीन भारत में शिक्षा व्यवस्था का मुख्य आधार गुरुकुल प्रणाली थी। इस प्रणाली में विद्यार्थी अपने गुरु के आश्रम में रहकर शिक्षा प्राप्त करते थे। गुरु केवल शिक्षक ही नहीं होते थे, बल्कि शिष्य के मार्गदर्शक और आदर्श भी होते थे। गुरुकुल में शिक्षा का उद्देश्य केवल रोज़गार प्राप्त करना नहीं था, बल्कि विद्यार्थियों का चरित्र निर्माण, आत्मअनुशासन, नैतिक मूल्यों का विकास और आध्यात्मिक उन्नति करना था।

इस शिक्षा प्रणाली में अध्ययन के साथ-साथ सेवा, श्रम और अनुशासित जीवन पर विशेष बल दिया जाता था। विद्यार्थी गुरु और आश्रम की सेवा करते हुए विनम्रता, सहनशीलता और जिम्मेदारी जैसे गुण सीखते थे। शिक्षा को जीवन से जोड़कर देखा जाता था, जिससे विद्यार्थी व्यवहारिक और आत्मनिर्भर बन सकें।

गुरुकुलों में वेद, उपनिषद, ब्राह्मण और आरण्यक जैसे धार्मिक एवं दार्शनिक ग्रंथों के साथ-साथ गणित, खगोल विज्ञान, व्याकरण, दर्शन और चिकित्सा विज्ञान (आयुर्वेद) जैसे विषय भी पढ़ाए जाते थे। इससे स्पष्ट होता है कि प्राचीन भारत की शिक्षा केवल धार्मिक ही नहीं, बल्कि वैज्ञानिक और तर्कपूर्ण भी थी।

इस काल में शिक्षा सामान्यतः निःशुल्क होती थी। विद्यार्थी शिक्षा पूर्ण होने पर गुरु-दक्षिणा के रूप में अपनी क्षमता के अनुसार सेवा या धन अर्पित करते थे। समाज की सेवा और मानव कल्याण को जीवन का प्रमुख उद्देश्य माना जाता था। सीमित संसाधनों के बावजूद यह शिक्षा व्यवस्था विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास पर आधारित थी, जिसने भारत को ज्ञान और संस्कृति की दृष्टि से समृद्ध बनाया।

मध्यकालीन भारत में शिक्षा प्रणाली:

मध्यकालीन भारत में भारतीय शिक्षा व्यवस्था पर इस्लामी शिक्षा परंपरा का गहरा और स्पष्ट प्रभाव देखने को मिलता है। इस काल में शिक्षा के प्रमुख केंद्र के रूप में मकतब और मदरसे विकसित हुए, जहाँ व्यवस्थित रूप से अध्ययन कराया जाता था। इन संस्थानों में अरबी और फ़ारसी भाषाओं के साथ-साथ धर्मशास्त्र, इतिहास, गणित तथा विज्ञान जैसे विषय पढ़ाए जाते थे। इस शिक्षा प्रणाली ने ज्ञान के संरक्षण, संकलन और उसके प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यद्यपि शिक्षा का विकास हुआ, फिर भी यह व्यवस्था समाज के केवल सीमित और विशेष वर्गों तक ही सीमित रह गई। इस समय शिक्षा का मुख्य उद्देश्य प्रशासनिक कार्यों के लिए योग्य व्यक्तियों का निर्माण और धार्मिक आवश्यकताओं की पूर्ति करना था।

image 49

Image source: education exclusive 

ब्रिटिश काल में शिक्षा नीति का विकास:

ब्रिटिश शासन के दौरान भारतीय शिक्षा व्यवस्था में व्यापक और महत्वपूर्ण परिवर्तन देखने को मिले। सन् 1835 में प्रस्तुत मैकाले का मिनट और 1854 का वुड्स डिस्पैच आधुनिक भारतीय शिक्षा नीति की आधारशिला बने और इन्हीं नीतियों के आधार पर अंग्रेज़ी भाषा तथा पाश्चात्य शिक्षा प्रणाली को विशेष रूप से बढ़ावा दिया गया। शिक्षा के प्रसार के लिए कलकत्ता, बॉम्बे और मद्रास जैसे प्रमुख शहरों में विश्वविद्यालयों की स्थापना की गई।

इस शिक्षा व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य ब्रिटिश प्रशासन के लिए ऐसा शिक्षित वर्ग तैयार करना था, जो अंग्रेज़ी भाषा, पाश्चात्य विचारधारा और प्रशासनिक कार्यों में दक्ष हो तथा औपनिवेशिक शासन के तंत्र को समर्थन दे सके। यद्यपि इस व्यवस्था से आधुनिक शिक्षा और नई बौद्धिक चेतना का विस्तार हुआ, परंतु इसके साथ ही भारतीय संस्कृति, स्वदेशी भाषाओं और पारंपरिक मूल्यों की उपेक्षा भी हुई, जिसका दीर्घकालिक प्रभाव भारतीय समाज और शिक्षा संरचना पर पड़ा।

1986 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति: समावेशी सुधारों की नई दिशा

सन् 1986 में लागू की गई राष्ट्रीय शिक्षा नीति (जिसे 1992 में संशोधित किया गया) भारतीय शिक्षा व्यवस्था में एक ऐतिहासिक और निर्णायक परिवर्तन लेकर आई। इस नीति का उद्देश्य शिक्षा को अधिक समावेशी, व्यावहारिक और रोजगारोन्मुख बनाना था, ताकि समाज के प्रत्येक वर्ग को विकास के समान अवसर प्राप्त हो सकें।

इस नीति के अंतर्गत प्रारंभिक शिक्षा के सार्वभौमीकरण पर विशेष बल दिया गया, जिससे सभी बच्चों को अनिवार्य और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराई जा सके। महिला शिक्षा को बढ़ावा देने हेतु अनेक विशेष कार्यक्रम प्रारंभ किए गए, ताकि लैंगिक असमानता को कम किया जा सके। इसके साथ ही अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य वंचित वर्गों के लिए विशेष प्रावधान किए गए, जिससे सामाजिक समानता को सुदृढ़ किया जा सके।

नीति में शिक्षक प्रशिक्षण को शिक्षा की गुणवत्ता का आधार मानते हुए उसमें सुधार पर जोर दिया गया। साथ ही व्यावसायिक शिक्षा को प्रोत्साहित कर युवाओं को आत्मनिर्भर और रोजगार के योग्य बनाने का प्रयास किया गया। इस प्रकार 1986 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति ने शिक्षा को केवल ज्ञान तक सीमित न रखकर उसे सामाजिक न्याय, आर्थिक विकास और मानव संसाधन निर्माण से जोड़ने का सार्थक प्रयास किया।

वर्तमान शिक्षा प्रणाली और चुनौतियाँ 

वर्तमान शिक्षा नीतियाँ और उनका प्रभाव

वर्तमान समय में भारत की शिक्षा व्यवस्था मुख्य रूप से नई शिक्षा नीति 2020 के मार्गदर्शन में आगे बढ़ रही है, जिसका उद्देश्य शिक्षा को अधिक व्यावहारिक, समावेशी और छात्र-केंद्रित बनाना है। इस नीति के अंतर्गत रटंत प्रणाली के स्थान पर समझ-आधारित अध्ययन, कौशल विकास और आलोचनात्मक सोच को प्राथमिकता दी गई है।

डिजिटल शिक्षा, ऑनलाइन लर्निंग प्लेटफॉर्म, स्मार्ट कक्षाएँ और ई-सामग्री के माध्यम से शिक्षा को तकनीक-आधारित बनाया जा रहा है, जिससे दूरस्थ और वंचित क्षेत्रों तक शिक्षा की पहुँच बढ़ी है। साथ ही, मातृभाषा और क्षेत्रीय भाषाओं में प्रारंभिक शिक्षा को बढ़ावा देकर बच्चों की बुनियादी समझ को सशक्त करने का प्रयास किया जा रहा है।

वर्तमान शिक्षा नीतियाँ छात्रों को केवल परीक्षा-उत्तीर्ण करने तक सीमित न रखकर उन्हें रोजगार, नवाचार और आत्मनिर्भरता के लिए तैयार करने पर केंद्रित हैं। इस प्रकार आज की शिक्षा नीति भारत को ज्ञान-आधारित अर्थव्यवस्था और वैश्विक प्रतिस्पर्धा के योग्य बनाने की दिशा में कार्य कर रही है।

डिजिटल शिक्षा: आशा और चुनौतियों की यात्रा

ज्ञान से आत्मा तक: शिक्षा का सर्वोच्च योगदान

संत रामपाल जी महाराज के अनुसार मानव को शिक्षा केवल बाहरी ज्ञान, व्यावसायिक कौशल या सामाजिक प्रतिष्ठा के लिए नहीं अर्जित करनी चाहिए, बल्कि इसका सर्वोच्च उद्देश्य आध्यात्मिक ज्ञान और आत्मबोध प्राप्त करना होना चाहिए। शिक्षा का वास्तविक महत्व तब है जब वह व्यक्ति को सत्य, ईमानदारी, नैतिकता और परमात्मा के नियमों के अनुसार जीवन जीना सिखाए।

किसी भी प्रकार की शिक्षा, चाहे वह विज्ञान, गणित या भाषा का ज्ञान हो, तब तक सार्थक नहीं है जब तक वह मनुष्य को धर्म, सत्य और भक्ति के मार्ग से जोड़कर परमात्मा की पहचान और मुक्ति की प्राप्ति में मार्गदर्शन नहीं करती। संत रामपाल जी महाराज बताते हैं कि शिक्षा का सही उपयोग व्यक्ति को अहंकार, लोभ, मोह और अंधविश्वास से मुक्त कर, उसे आत्मज्ञान, विवेक और आत्मअनुशासन की ओर अग्रसर करता है।

इसलिए मानव को शिक्षा इस दृष्टि से अर्जित करनी चाहिए कि वह न केवल समाज में ज्ञानवान और सक्षम बने, बल्कि आध्यात्मिक दृष्टि से परिपूर्ण होकर सत्य की ओर बढ़े और अपने जीवन का परम उद्देश्य- मोक्ष और ईश्वर की सेवा- प्राप्त करें।

Share This Article
Email Copy Link Print
What do you think?
Love0
Sad0
Happy0
Sleepy0
Angry0
Dead0
Wink0
BySA News
Follow:
Welcome to SA News, your trusted source for the latest news and updates from India and around the world. Our mission is to provide comprehensive, unbiased, and accurate reporting across various categories including Business, Education, Events, Health, History, Viral, Politics, Science, Sports, Fact Check, and Tech.
Previous Article ई-नाम (e-NAM) क्या है? किसानों के लिए डिजिटल कृषि बाज़ार की सम्पूर्ण जानकारी ई-नाम (e-NAM) क्या है? किसानों के लिए डिजिटल कृषि बाज़ार की सम्पूर्ण जानकारी
Next Article देश में सौर ऊर्जा की चमक के पीछे छुपा सवाल पैनल खराब होने के बाद क्या देश में सौर ऊर्जा की चमक के पीछे छुपा सवाल: पैनल खराब होने के बाद क्या?
Leave a Comment

Leave a Reply Cancel reply

You must be logged in to post a comment.

Popular Posts

Big News! LIC Smart Pension Plan Launched: Secure Your Future With Ease

On February 18, 2025, the Life Insurance Corporation of India (LIC) introduced ‘LIC Smart Pension…

By SA News

Cabinet Approves Rail Cum Road Bridge Across Ganga River In Varanasi Worth INR 2642 Crores

(Official Press Release) 

By SA News

UP Police Constable Vacancy 2026: Complete Details on 32,679 Posts

The Uttar Pradesh Police Recruitment and Promotion Board (UPPRPB) has officially announced the UP Police…

By Aditi Parab

You Might Also Like

SBI Clerk Mains Result 2025 Declared: Check Merit List Here!
Educational

SBI Clerk Mains Result 2025 Declared: Check Merit List Here!

By SA News
CBSE का बड़ा फैसला: अब स्कूलों में हर कोने पर लगेगा CCTV कैमरा
Educational

CBSE का बड़ा फैसला: अब स्कूलों में हर कोने पर लगेगा CCTV कैमरा

By SA News
SSC-CHSL-Tier-1-Exam-Date-2025
Educational

SSC CHSL Tier-1 2025 परीक्षा की तिथि घोषित, इन दिनों से करें चयन

By Bharti
तृतीय श्रेणी शिक्षक भर्ती की योग्यता परीक्षा (REET): एक सुनहरा मौका
Educational

तृतीय श्रेणी शिक्षक भर्ती की योग्यता परीक्षा (REET): एक सुनहरा मौका

By SA News
SA NEWS LOGO SA NEWS LOGO
748kLike
340kFollow
13kPin
216kFollow
1.75MSubscribe
3kFollow

About US


Welcome to SA News, your trusted source for the latest news and updates from India and around the world. Our mission is to provide comprehensive, unbiased, and accurate reporting across various categories including Business, Education, Events, Health, History, Viral, Politics, Science, Sports, Fact Check, and Tech.

Top Categories
  • Politics
  • Health
  • Tech
  • Business
  • World
Useful Links
  • About Us
  • Disclaimer
  • Privacy Policy
  • Terms & Conditions
  • Copyright Notice
  • Contact Us
  • Official Website (Jagatguru Sant Rampal Ji Maharaj)

© SA News 2025 | All rights reserved.