आज के दौर में देश बहुत तेजी से विकास कर रहा है। इसके साथ-साथ सभी प्रकार की तकनीकों में भी निरंतर उन्नति देखने को मिली है। हर क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है और इस बढ़ती प्रतिस्पर्धा का सबसे बड़ा असर छात्रों पर पड़ रहा है।
आज के समय में बच्चों को यही सिखाया जाता है कि उन्हें हर जगह सर्वप्रथम आना है, चाहे वह स्कूल हो या कोई अन्य क्षेत्र। हर जगह प्रतिस्पर्धा की दौड़ लगी हुई है। इस लेख में हम जानेंगे कि भाग-दौड़ भरी इस जिंदगी में बच्चों पर इस प्रतिस्पर्धा का कितना गहरा प्रभाव पड़ता है।
प्रतिस्पर्धा का बढ़ता माहौल:
1.आज की शिक्षा व्यवस्था पहले जितनी सहज नहीं रही। हर जगह तुलना की संस्कृति विकसित हो चुकी है।
2. यदि कोई बच्चा 90% लाता है, तो उसकी तुलना 95% लाने वाले से की जाती है।
3. यदि कोई बच्चे खेल में अच्छा है, तो उसकी तुलना उससे की जाती है जो उससे भी बेहतर खेलता है।
4. सोशल मीडिया पर बच्चों की उपलब्धियाँ दिखाए जाने से यह दबाव और बढ़ गया है।
इन सब परिस्थितियों ने बच्चों की मानसिक दुनिया को इस तरह प्रभावित किया है कि वे पढ़ाई को ज्ञान के रूप में नहीं, बल्कि एक दौड़ के रूप में देखने लगे हैं। कई बार यह दबाव इतना बढ़ जाता है कि बच्चा स्वयं को असफल महसूस करने लगता है।
माता-पिता की अपने बच्चों से अपेक्षाएँ:
बच्चों पर दबाव बढ़ने का सबसे बड़ा कारण माता-पिता की अत्यधिक उच्च अपेक्षाएँ भी हैं।
अधिकांश माता-पिता चाहते हैं कि उनका बच्चा पढ़ाई में सबसे आगे हो, प्रतियोगी परीक्षाओं में सफल हो, और एक शानदार करियर बनाए।

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निश्चित रूप से यह चाहत गलत नहीं है, लेकिन कई बार अत्यधिक अपेक्षाएँ बच्चों पर मानसिक बोझ बन जाती हैं। जैसे कि:
- उन्हें लगता है कि यदि वे टॉप नहीं करेंगे, तो वे माता-पिता का विश्वास खो देंगे।
- कई बार बच्चों को अपनी रुचियों के विरुद्ध जाकर भी पढ़ाई या गतिविधि अपनानी पड़ती है।
- यह दबाव बच्चों को धीरे-धीरे तनाव, चिंता और आत्मविश्वास की कमी की ओर ले जाता है।
बच्चों पर बढ़ते दबाव के दुष्परिणाम:
अत्यधिक दबाव बच्चों के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य दोनों को प्रभावित करता है। जैसे कि:
1. तनाव और चिंता: लगातार आगे बढ़ने की चिंता बच्चे के मन में तनाव पैदा करती है।
2. आत्मविश्वास में कमी: लगातार तुलना होने से बच्चा खुद को दूसरों से कमतर समझने लगता है।
3. रुचियों का खो जाना: पढ़ाई का बोझ बढ़ने से बच्चों की रुचियाँ समाप्त होने लगती हैं।
4. परिवार से दूरी: दबाव के कारण बच्चा भावनात्मक रूप से माता-पिता और परिवार से दूर होने लगता है।
5. शारीरिक स्वास्थ्य समस्याएँ: सिरदर्द, नींद की कमी, थकान, भूख कम लगना ये दबाव के प्रमुख परिणाम हैं।
दबाव कम करने में माता-पिता की अहम भूमिका:
बच्चों को प्रतिस्पर्धा की दौड़ से बचाने में माता-पिता की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है।
1. बच्चे की क्षमता को समझें: हर बच्चा अलग होता है। उसकी क्षमता, रुचि और समझ को ध्यान में रखें।
2. तुलना न करें: किसी भी बच्चे की तुलना दूसरे बच्चे से नहीं करनी चाहिए। तुलना केवल तनाव बढ़ाती है।
3. बच्चे को प्रेरित करें, मजबूर नहीं: बच्चे को सीखने के लिए प्रेरित करें, लेकिन उसकी रुचि के खिलाफ जबरदस्ती कुछ न थोपें।
4. समय प्रबंधन में मदद करें: पढ़ाई के साथ-साथ खेल, आराम, और परिवार के लिए समय देना बेहद जरूरी है।
5. बातचीत करें: बच्चे से हर दिन थोड़ी देर जरूर बात करें।
उसकी समस्याएँ, डर और चिंताएँ जानें और उन्हें समाधान दें।
स्कूल और समाज की भूमिका अहम:
स्कूलों को भी शिक्षा को प्रतिस्पर्धा नहीं बल्कि सीखने का माध्यम बनाने की जरूरत है। शिक्षक बच्चों को प्रोत्साहन दें और उन्हें हर गतिविधि में सहयोग प्रदान करें।
समाज के स्तर पर भी एक समझ विकसित करनी होगी कि हर बच्चा अलग है और हर किसी का लक्ष्य टॉप करना नहीं होता।
बच्चों के जीवन की सही दिशा: संत रामपाल जी महाराज का संदेश
संत रामपाल जी महाराज बताते हैं कि मानव जीवन सीखने, संस्कारों और सही दिशा अपनाने का अवसर है, लेकिन आज माता-पिता और समाज की अपेक्षाओं ने बच्चों को भी एक अंतहीन दौड़ में धकेल दिया है। संत रामपाल जी महाराज कहते हैं कि बच्चों को ज्ञान, सरलता और सतभक्ति की राह दिखाना ही सच्ची परवरिश है।
यदि बचपन से ही उन्हें संत की वाणी, सही विचार और नाम-सुमिरन की शिक्षा मिले, तो वे प्रतिस्पर्धा के तनाव से दूर रहकर शांति, बुद्धि और सफलता दोनों प्राप्त कर सकते हैं। अधिक जानकारी हेतु देखिए संत रामपाल जी महाराज के सत्संग साधना टीवी पर शाम 7: 30 बजे से।

